बांदा में कुछ युवा अपनी पढ़ाई और काम के साथ सड़क किनारे पेड़ के नीचे गरीब और मजदूर परिवारों के बच्चों को मुफ्त में पढ़ा रहे हैं। अंबेडकर एजुकेशन ट्रस्ट के तहत चल रही इस पाठशाला में 100 से ज्यादा बच्चे पढ़ने आते हैं। शिक्षक दिवस के मौके पर जानिए उन युवाओं की कहानी, जो बिना किसी वेतन और बड़ी सुविधाओं के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
रिपोर्ट – कविता बुंदेलखंडी (संपादक खबर लहरिया) गीता देवी ब्यूरो चीफ, लेखन – रचना
शाम के वक्त जब बांदा की सड़क पर गाड़ियां तेज रफ्तार से गुजरती हैं, जब लोग काम के बाद अपने घरों की ओर लौटते हैं तो उसी सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे कुछ बच्चों की पाठशाला खुलती है। उनके लिए यही पेड़ आज का स्कूल है और सड़क का किनारा उनकी कक्षा। कोई पहाड़ा दोहरा रहा है कोई अंग्रेजी के शब्द याद कर रहा है।
इसी जगह अंकित अंबेडकर रोज शाम चार बजे से आठ बजे तक बच्चों के बीच पढ़ाने बैठते हैं। उनके पास न स्कूल की बड़ी इमारत है, न महंगी सुविधाएं। है तो कुछ किताबें, कॉपियां, पढ़ाने का समय और ये जिद भी कि गरीबी किसी बच्चे की पढ़ाई के रास्ते में दीवार न बने।
ये स्कूल बांदा के अवंती नगर मोहल्ले की मुख्य सड़क के किनारे पेड़ के नीचे चलता है। ये पाठशाला युवराज अंबेडकर एजुकेशन ट्रस्ट के तहत चलती है। करीब दो साल पहले शुरू हुई इस पाठशाला में अब 100 से ज्यादा बच्चे पढ़ने आते हैं।
आपने कभी सोचा है कि क्या कोई अपने सीमित संसाधनों के बावजूद बच्चों के भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं? लेकिन हां ऐसा हो सकता है। अंकित अंबेडकर, प्रिंस, बाबूलाल और उनके साथ जुड़े दूसरे युवा मिलकर चला रहे हैं। एक प्रेरणादायक पहल के जरिए बदलाव की कोशिश भी कर रहे हैं। ये टीम अपनी पढ़ाई जारी रखने के साथ-साथ पाठशाला भी चला रहे हैं जहां बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दे रहे हैं। इनका उद्देश्य है उन बच्चों तक शिक्षा पहुँचाना जो आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक कारणों से पढ़ाई में पीछे रह जाते हैं।
इस पाठशाला में आने वाले बच्चे ऐसे परिवारों से हैं जिनके लिए रोज की कमाई से घर चलाना ही सबसे बड़ी चिंता है। कई परिवार सड़क किनारे या झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं। आर्थिक तंगी के कारण वे अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा पाते। कुछ बच्चों को सामाजिक भेदभाव का भी सामना करना पड़ता है। कुछ रोजी मज़दूरी करने वालों के बच्चे हैं, और कुछ गरीब वर्ग के बच्चे हैं। ऐसे ही बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने और उन्हें बराबरी के साथ आगे बढ़ने का मौका देने के लिए अंबेडकर एजुकेशन ट्रस्ट के तहत यह पाठशाला शुरू की गई है।
यह एक खुला स्कूल है, जहां न कोई छत है और न ही स्कूल जैसी कोई सुविधा। बस है तो खुला आसमान। बारिश हो तो मिट्टी और कीचड़ से जूझना पड़ता है, धूप हो तो उसी पेड़ की छांव सहारा बनती है। लेकिन अंकित जैसे युवाओं में बच्चों को पढ़ाने की ललक है और उन बच्चों में पढ़ने की चाह। बस बच्चों को जो पढ़ाई से दूर करती है वो है एक वर्ग की गरीबी, आर्थिक कमजोरी और भ्रष्ट शिक्षा नीति व व्यवस्था।
समाज में शिक्षा के लिए काम करना आसान नहीं है। बहुत से लोग अपनी व्यक्तिगत तरक्की के बारे में सोचते हैं, बहुत कम ऐसे सोचने वाले होते हैं जो अपने समय और संसाधनों का उपयोग दूसरों के भविष्य को बेहतर बनाने में लगाते हैं। अंकित अंबेडकर और उनकी टीम का यह प्रयास इसी सोच का उदाहरण है।
शिक्षक दिवस पर जब शिक्षकों की भूमिका और उनके योगदान की बात करते हैं, तो अंकित अंबेडकर और उनकी टीम जैसे युवाओं की कहानी और उनकी मेहनत को भी जानना जरुरी हो जाता है जो बिना किसी फ़ायदा और वेतन के बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं।
इस सोच को समझने के लिए इस विषय में खबर लहरिया टीम ने उन युवाओं से बात की। वे मानते हैं कि शिक्षा केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाकर पास होने या डिग्री लाने का साधन या ज़रिया नहीं है, शिक्षा आत्मविश्वास पैदा करने, सोच विकसित करने, जागरूकता और बेहतर भविष्य की नींव है। उनकी पाठशाला में बच्चों को पाठ्यक्रम के साथ-साथ संविधान की मूल बातें समाजिक समानता, अनुशासन, व्यवहार ज्ञान, सम्मानपूर्वक व्यवहार करना भी सिखाया जाता है।
खबर लहरिया टीम ने अंकित से बात की और उन शिक्षकों का विचार जानने की कोशिश की।
शिक्षक अंकित की खुद की पढ़ाई से पाठशाला तक सफर
अंकित अंबेडकर एजुकेशन ट्रस्ट जिसके तहत ये स्कूल खुला है के संस्थापक और अध्यक्ष अंकित ही हैं जो वहां पढ़ाने का भी काम करते हैं। अंकित अंबेडकर ने इलाहाबाद से ग्रेजुएशन किया है और अभी बीएड की पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने कंप्यूटर साइंस में डिप्लोमा और पीजीडीसीएम भी किया है। पढ़ाई के साथ अंकित अंबेडकर जोमैटो में फूड डिलीवरी का काम करते हैं। स्कूल और अपनी पढ़ाई के बाद जो समय बचता है, उसमें फूड डिलीवरी करते हैं और रोज करीब 200 से 300 रुपये तक कमा लेते हैं। इसी कमाई से अपना खर्च निकालने के साथ बच्चों की पढ़ाई में भी मदद करते हैं।
कवरेज के दौरान खबर लहरिया टीम द्वारा पूछा गया कि आपको ये सोच और विचार कहाँ से मिली तो इसका जवाब देते हुए उन्होंने बताया कि समाज में ऐसे बहुत से बच्चे हैं जिन्हें पढ़ने के लिए सिर्फ सही मार्गदर्शन और मौके की जरूरत है। गरीबी और आर्थिक तंगी के कारण ये बच्चे पढ़ नहीं पाते। ऐसे बच्चों को देखकर उन्होंने पहले अपने घर पर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। बाद में जब वह अवंती नगर आए तो सड़क किनारे रहने वाले कई बच्चे मिले, जो पढ़ना चाहते थे लेकिन पढ़ नहीं पा रहे थे। इसी के बाद उन्होंने यहां पाठशाला शुरू कर दी। करीब दो साल पहले शुरू हुई इस पाठशाला में पहले 20-30 बच्चे आते थे, अब 100 से ज्यादा बच्चे पढ़ने आते हैं।
बच्चों को किताब, कपड़े और आधार कार्ड बनवाने जैसे मदद भी की
शुरुआत में अंकित और उनकी टीम ने बच्चों के माता-पिता से बात की, उनकी स्थिति समझी और कई बच्चों के आधार कार्ड और दूसरे जरूरी सरकारी दस्तावेज बनवाने में मदद की। कुछ बच्चों का प्राथमिक स्कूल में दाखिला भी कराया गया है और जो बच्चे अभी रह गए हैं, उनका सितंबर के आखिर तक दाखिला कराने की कोशिश भी की जा रही है। इसी के साथ आरटीई (RTE) के तहत भी बच्चों के दाखिले के लिए फॉर्म भरवाए जा रहे हैं।
इस पाठशाला में प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा आठ तक के बच्चों को पढ़ाया जाता है और पूरी टीम बिना किसी पैसे के काम करती है। उन्होंने बताया कि बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए सोशल मीडिया के जरिए क्राउडफंडिंग कैंपेन भी चलाया गया है। हालांकि उनका ये भी कहना है कि अभी तक उन्हें सरकार की ओर से कोई आर्थिक मदद नहीं मिली है। वे कहते हैं “भगत सिंह जी अपने 23 साल के ऊम्र में देश के लिए बलिदान दे दिया आज अगर हम अपने देश के लिए इतना नहीं कर सकते हैं तो हमारे इस जवानी और देश के नागरिक होने का मतलब ही क्या है।”
पेड़ के नीचे पढ़ाई करते हैं पर आंखों में बड़े सपने भी हैं
सड़क के किनारे पढ़ाई के दौरान हो रही समस्या को लेकर कहते हैं कि “गौतम बुद्ध ने भी पेड़ के नीचे ज्ञान प्राप्त किया था।” बारिश के दिनों में यहां जमीन पर कीचड़ और दलदल हो जाता था, जिसकी वजह से चार-पांच दिन तक बच्चों को पढ़ाना मुश्किल हो जाता था। जिसके बाद बांदा सदर विधायक की मदद से वहां चबूतरा बनवा दिया गया है और जल्द ही शेड लगाने की बात भी कही गई है।
अंकित बताते हैं कि इस पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चों में अबतक कई बदलाव देखें हैं। रमजान नाम के एक बच्चे ने रॉकेट बनाया, जिसे टीम की मदद से लॉन्च भी कराया गया। एक बच्चा जो पहले कबाड़ बीनता था, अब दरोगा बनने का सपना देखता है। कुछ बच्चे प्राथमिक स्कूल भी पहुंच चुके हैं। “ये बदलाव ही हमारी असली कमाई है।” अंकित को इस काम की प्रेरणा डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों से मिली। उनका मानना है कि शिक्षा बहुत जरूरी है।“शिक्षा का मतलब सरकारी नौकरी नहीं है। डिसिप्लिन, बॉडी लैंग्वेज, बिहेवियर और तर्क शक्ति जैसी चीजों को भी बढ़ावा देना जरूरी है।”
अंकित का सपना एक ऐसा फ्री स्कूल बनाने का है, जहां उन बच्चों को भी पढ़ने का मौका मिले जिनके परिवार हजारों रुपये पढ़ाई पर खर्च नहीं कर सकते। “कुछ परिवार पीजी की कॉपियां और पढ़ाई का बाकी सामान खरीदने में पांच-पांच हजार रुपये खर्च कर सकते हैं, लेकिन गरीब परिवारों के बच्चे पढ़ना चाहते हुए भी यह खर्च नहीं उठा पाते।” अंकित कहते हैं कि वह इन्हीं बच्चों के लिए आगे भी काम करते रहना चाहते हैं।
आखिर बच्चों को पाठशाला कैसे लगता है?
रिपोर्टर द्वारा वहां के कुछ पढ़ते बच्चों से भी बात की गई। जिसमें से एक है लक्ष्मी जो करीब एक साल से यहां पढ़ रही हैं। पहले वह घर के पास एक कोचिंग में पढ़ती थीं, जहां चार बहनों के लिए 600 रुपये देने पड़ते थे। अब यहां पढ़ाई मुफ्त होती है और उन्हें पढ़ना भी अच्छा लगता है। “सर बहुत अच्छा पढ़ाते हैं।” वहीं गुलफ्शा बताती हैं कि उनके पापा मंडी में सब्जी बेचने जाते हैं और वो करीब एक साल से यहां पढ़ रही हैं। पहले उन्हें ज्यादा कुछ नहीं आता था, लेकिन अब राष्ट्रीय ध्वज, राजधानियों जैसी कई चीजों के बारे में जानती हैं। अब उन्हें 15 तक के पहाड़े याद हो गए हैं। यह कहते हुए वह खुशी से 15 का पहाड़ा सुनाने लगती हैं।
खेल-खेल में पढ़ाई का तरीक़ा
एक और युवक प्रिंस राजपुर जो मुरैनी बांदा के रहने वाले हैं। उन्होंने अंबेडकर एजुकेशन ट्रस्ट की चौथी शाखा अपने गांव में अपने घर से शुरू की है, जहां करीब 50 बच्चे पढ़ने आते हैं। इनमें अनाथ और गरीब परिवारों के बच्चे हैं, जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने का खर्च नहीं उठा सकते।
प्रिंस ने खबर लहरिया को बताया कि उन्होंने शुरुआत में कुछ बच्चों को खुद पढ़ाना शुरू किया था। बाद में सोशल मीडिया के जरिए उन्हें अंकित के बारे में पता चला और उन्होंने उनसे संपर्क किया। अब करीब सात महीने से वह अंकित के साथ मिलकर बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं। अकेले चलने में जो दिक्कत आती है, वो साथ चलने में नहीं आती।” इतना ही नहीं उनकी मां आशा कार्यकर्ताओं की सुपरवाइज़र हैं और वे ड्यूटी से लौटने के बाद बच्चों को पढ़ाने में मदद करती हैं।
प्रिंस के मुताबिक बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ खेल के माध्यम से पढ़ाई करवाते हैं। हर शनिवार को बच्चों के लिए खेल और दूसरी गतिविधियां कराई जाती हैं। जैसे राज्यों और उनकी राजधानियों का खेल करवाते हैं, ताकि बच्चे खेलते-खेलते कुछ जरुरी चीजें भी सीख सकें।
‘ऐसे टीचर मिलते नहीं हैं’
बच्चों के माता-पिता भी उन्हें यहां पढ़ने के लिए भेज रहे हैं। इन्हीं बच्चों में से एक बच्चे की मां रामबली बताती हैं कि उनके चार बच्चे पिछले छह महीने से यहां आ रहे हैं। बच्चे सरकारी स्कूल भी जाते हैं, लेकिन पढ़ाई कोचिंग की तरह यहां भी करते हैं। दूसरी महिला रामवती कहती हैं कि उनके बच्चे पहले सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उन्हें प्राइवेट स्कूल में पढ़ा सकें। जब उन्होंने यहां बच्चों को पढ़ते देखा तो उन्हें अच्छा लगा और तब से बच्चों को यहां भेजने लगीं। कहती हैं “जब तक हम जिंदा हैं, तब तक उनको कुछ न हो। ऐसे टीचर हमेशा रहें। ऐसे टीचर मिलते नहीं हैं।”
“गरीब बच्चों को सुविधा मिलते तो ये बच्चे भी कहीं और होते” शिक्षक बाबूलाल
उसी स्कूल में पढ़ा रहे बाबूलाल से रिपोर्टर कविता के द्वारा जब पूछा गया कि एक शिक्षक के बच्चे बेहतर स्कूलों में पढ़ते हैं, जबकि वही सुविधाएं झुग्गी-बस्ती और मजदूर परिवारों के बच्चों को नहीं मिल पातीं, तो वह कहते हैं “मेरी क्लास में 20 से 25 ऐसे बच्चे हैं जो होशियार और तेज हैं। अगर उन्हें भी वही सुविधाएं मिलें जो बाकी बच्चों को मिलती हैं तो आज वे कहीं और होते।” उनका कहना है कि देश की शिक्षा व्यवस्था में अभी भी बहुत अंतर है। वे मानते हैं कि अगर गरीब, पिछड़े, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक परिवारों के बच्चों को पढ़ने के बराबर मौके मिलें और वे आगे बढ़कर अधिकारी या नेता बनें, तो समाज में उनकी भागीदारी बढ़ेगी। देश को आगे बढ़ाने के लिए जात-पात, छुआछूत और अंधविश्वास जैसी चीजों से बाहर निकलना जरूरी है। “बच्चों में अब जब वह बदलाव देखते हैं तो उन्हें खुशी होती है।”
वह बताते हैं कि बच्चे अब पहाड़े, एबीसीडी, महीनों और हफ्ते के दिनों के नाम याद करके सुनाते हैं। वे कोशिश करते हैं कि बच्चों की पढ़ाई का एक भी दिन न छूटे क्योंकि उनके लिए हर दिन की अपनी कीमत है। “जब मैं देखता हूं कि हमने बच्चों को कुछ तो सिखाया है और अभी उन्हें बहुत कुछ सिखाना है तो मुझे खुद खुशी होती है।”
बाबूलाल अपने विचार के माध्यम से कहते हैं “उत्तर प्रदेश के हमारे जो विधायक हैं सभी का एक हाल है। मैं किसी एक का नाम नहीं लूंगा लेकिन सभी के बच्चे बाहर पढ़ते हैं। उन्हें मालूम है कि इंडिया का एजुकेशन सिस्टम क्या है। हमारे देश में जितनी भी यूनिवर्सिटी, मेडिकल इंस्टीट्यूट और आईआईटी हैं उनमें से किसी की भी वर्ल्ड में कोई रैंक नहीं आती। हम बहुत पीछे हैं।” उनका कहना है कि देश के नेता और अधिकारी नहीं चाहते कि आम लोगों का जीवन बेहतर हो और वे आगे बढ़ें। इसी लिए शिक्षा सभी के लिए बराबर तरीके से जरुरी हैं।
बता दें खबर लहरिया की टीम ने अपनी रिपोर्टिंग में कई ऐसे युवाओं की पहल को सामने लाया है, जो मजदूर और गरीब परिवारों के उन बच्चों को मुफ्त में पढ़ा रहे हैं, जो आर्थिक तंगी और दूसरी सामाजिक परिस्थितियों के कारण स्कूल नहीं जा पाते या अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाते।
बांदा जिले के रसिन गांव के दो युवा ओमप्रकाश और ऋषि कुमार बौद्ध द्वारा भी एक ऐसी ही बस्ती में स्कूल चलाया जाता है। जहां बच्चों को बिना किसी फीस या खर्च की शिक्षा दी जाती है। इसे और विस्तार से जानने के लिए आप नीचे दिए गए लिंक में क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।
इसी तरह प्रयागराज के शंकरगढ़ क्षेत्र के कपारी गांव में ‘एक पहल शिक्षा समिति’ द्वारा संचालित फ्री कोचिंग सेंटर गरीब, कमजोर और अशिक्षित बच्चों के लिए उम्मीद की नई किरण बन गया है। यहां खासतौर पर सपेरा समुदाय के वे बच्चे पढ़ने आते हैं जो पहले स्कूल नहीं जाते थे या पढ़ाई में काफी कमजोर थे। बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती है, जिससे अब वे ABCD, ककहरा और बुनियादी पढ़ाई सीख रहे हैं।
UP/Prayagraj: 95% सपेरा समुदाय के बच्चों को मिल रही फ्री शिक्षा
पटना जिले के ब्लॉक नौबतपुर के गांव अजवा में गरीब बच्चों के लिए निःशुल्क कोचिंग खोली गई। ये कोचिंग सेंटर यूनि सेवा फाउंडेशन के नाम से खोला गया। जिसमें पांचवीं तक के बच्चें आ कर मुफ्त में अपनी पढ़ाई करते।
पटना : गरीब बच्चों के लिए युवा ने खोला निःशुल्क कोचिंग सेंटर
शिक्षक दिवस पर जब शिक्षक की भूमिका की बात करते हैं, तो यह भी समझना जरूरी है कि शिक्षक सिर्फ वही नहीं है जो स्कूल की चारदीवारी के भीतर बच्चों को पढ़ाता है। बच्चों के प्रति शिक्षक की जिम्मेदारी उन्हें कहीं भी पढ़ने, सीखने और आगे बढ़ने का मौका देने की है। देश में शिक्षा की स्थिति को देखते हुए कुछ युवाओं ने खुद ही आने वाली पीढ़ी को शिक्षित करने की जिम्मेदारी उठाई है। पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ने वाले ये बच्चे शायद आज सुविधाओं से दूर हों लेकिन उनके सपने दूर नहीं हैं।
इस पहल की सबसे अच्छी बात ये है कि इसे चलाने वाले युवा स्वयं छात्र हैं। अपनी पढ़ाई और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारियों के बीच समय निकालकर वे समाज के बच्चों के लिए काम कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि बदलाव लाने के लिए बड़े संसाधनों की नहीं मजबूत सोंच कुछ कर पाने की चाह होनी चाहिए और सामाजिक जिम्मेदारी निभाने वाली सोच रखनी चाहिए। यह प्रयास बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के अलावा समाज में समान अवसर और सामाजिक समानता को भी मजबूत करते हैं।
यदि आप हमको सपोर्ट करना चाहते है तो हमारी ग्रामीण नारीवादी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करें और हमारे प्रोडक्ट KL हटके का सब्सक्रिप्शन लें’







