डाउन टू अर्थ द्वारा वन भूमि उपयोग से जुड़े अधिकारिक अभिलेखों के अध्ययन में सामने आया है कि जुलाई 2023 से मई 2026 के बीच देशभर में वन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी गई। छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग की केंटे एक्सटेंसन ओपनकास्ट कोयला खदान और कोयला वाशरी परियोजना के लिए चार लाख से अधिक पेड़ों की कटाई की अनुमती दी गई।
हालही में डाउन टू अर्थ (डीटीई) के तरह से आँकड़ा आया है जिसमें डाउन टू अर्थ द्वारा वन भूमि उपयोग से जुड़े अधिकारिक अभिलेखों के अध्ययन में सामने आया है कि जुलाई 2023 से मई 2026 के बीच देशभर में वन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी गई। यह अध्ययन केंद्रीय पर्यवारन, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की सलाहकार समिति की बैठकों के रिकॉर्ड पर आधारित है।
जांच में 288 अलग-अलग प्रस्तावों को शामिल किया गया जिनमें से 242 को स्वीकृति मिली। इन मनजूरियों के तहत 22 हजार हेक्टेयर से अधिक वन भूमि के खनन, जल विधुत परियोजनाओं और बिजली पारेषण लाइनों जैसे गैर-वन कार्यों के लिए उपयोग करने की अनुमती दी गई। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि कई परियोजनाओं में पेड़ों की कटाई का विवरण दर्ज नहीं था जबकि कुछ मामलों में पेड़ों की संख्या बताए बिना ही परियोजनाओं को आगे बढ़ाया गया।
सबसे ज़्यादा छत्तीसगढ़ में पेड़ों की कटाई की मंजूरी
इस आंकडे के अनुसार पेड़ों की कटाई के मामले में छत्तीसगढ़ राज्य सबसे आगे रहा। छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग की केंटे एक्सटेंसन ओपनकास्ट कोयला खदान और कोयला वाशरी परियोजना के लिए चार लाख से अधिक पेड़ों की कटाई की अनुमती दी गई। इस परियोजना का स्थानीय लोगों द्वारा पहले भी विरोध किया गया था और वन अधिकारों तथा जमीन से जुड़े मुद्दे उठाए थे।
डीटीई के विश्लेषण के अनुसार कम से कम 84 परियोजनाओं में पेड़ों की कटाई नहीं हुई जबकि 14 परियोजनाओं के रिकॉर्ड में कटने वाले पेड़ों की संख्या का उल्लेख ही नहीं था। इनमें ओड़िशा की सिजिमाली बॉक्साइट खनन परियोजना भी शामिल है जो लगभग 700 हेक्टेयर वन क्षेत्र में फैली है। दस्तावेजों में परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का जिक्र तो किया गया लेकिन कितने पेड़ प्रभावित होंगे इसकी स्पष्ट जानकारी दर्ज नहीं की गई।
पेड़ों की कटाई की खबरें
छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा उदाहरण है हसदेव अरण्य जंगल जिसे देश का फेफड़ा माना जाता है जहां पिछले कुछ सालों में ही लाखों पेड़ काटे गए हैं। इसके अलावा रायगढ़, कांकेर, बस्तर जिलों से भी लाखों की संख्या में पेड़ कटाई की गई है और हालही में हसदेव अरण्य में फिर से 4.48 लाख पेड़ काटने की मंजूरी मिल गई है।
इस पेड़ कटाई की लोगों द्वारा लगातार विरोध किया ज़रा है लेकिन कोई सुनवाई नहीं की जा रही है।
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इसमें खबर लहरिया द्वारा कुछ ग्राउंड रिपोर्ट भी किया गया है जैसे रायगढ़ जिले के तमनार तहसील के मुड़ागांव और सरायटोला गांवों में लोगों के लाख विरोध करने पर भी 26 और 27 जून 2025 को कम से कम 5,000 पेड़ काटे गए।
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इसके अलावा अन्य राज्यों से भी पेड़ों की कटाई की खबरें आईँ हैं।
इन पेड़ों के कटाई से सदियों से जंगल में रहने वाले आदिवासियों का जन जीवन तो खतरे में पड़ ही रहा है साथ ही इसके कारण जलवायु परिवर्तन में भी इसका प्रभाव देखने को मिल रहा है। जंगल में या आसपास के रहने वाले वालों का जीवन इस जंगल के साथ कटते नजर आ रहा है। लोग वहां के पेड़ों, जंगली फसल के सहारे रहते थे और अब वही कटता जा रहा है।
मध्य प्रदेश के ग्राम इटवा की रहने वाली हक्की बाई बताती हैं कि “अब तेंदू पत्ता पहले की तुलना में बहुत कम मिलने लगा है। उनका कहना है कि पहले जंगल काफी घने हुआ करते थे इसलिए आसानी से अच्छी मात्रा में पत्तियाँ मिल जाती थीं। लेकिन अब लगातार जंगलों की कटाई होने की वजह से तेंदू के पेड़ भी कम होते जा रहे हैं और पत्तियाँ भी जुटाना मुश्किल हो गया है। उन्होंने बताया कि पिछले तीन सालों से तेंदू पत्ता का रेट करीब 400 रुपए चल रहा है हालाँकि कुछ जगहों पर इसका दाम बढ़कर 500 रुपए तब भी इसका दाम बढ़ गया है।”
वहीं लगातार भारी मात्रा में जंगलों की कटाई के कारण जंगल के जंगली जानवर अपनी टोली लेकर गांवों के तरफ आ रहे हैं और जानवर लोगों के फसल को नुक़सान पहुँचा रहा है और कभी-कभी जानवरों द्वारा हमला करने की भी खबर आती रही हैं।
छत्तीसगढ़ के रायगढ़, सरगुजा, कोरबा और कटघोरा जिलों के घने जंगल हमेशा से हाथियों के निवास रहे हैं।लेकिन साल 2022 से अब तक में जंगलों की अंधाधुंध कटाई, खनन परियोजनाओं और औद्योगिक विस्तार ने इन इलाकों की स्थिति को असंतुलित और डर का माहोल बना दिया है।
पेड़ कटाई के बाद कोयला खदान की काम भी उतनी ही तेजी से चल रही है जिसका लोग विरोध कर रहे हैं लेकिन झूठु जनसुनवाई कर के मंज़ूरी दे दी जा रही है। छत्तीसगढ़ के आंदोलन के दौरान एक बुजुर्ग महिला का कहना है कि “हम तो बस कुछ ही दिन के मेहमान हैं लेकिन आने वाली पीढ़ी कैसे जिएँगी? हमारे पूर्वजों ने यह जमीन हमें सौंपी थी और इसे सुरक्षित रखकर आगे बढ़ाना हमारी जिम्मेदारी है। पैसा तो आता-जाता रहता है लेकिन जमीन हमेशा साथ रहती है।” वे साफ शब्दों में कहती हैं कि “हमें कंपनी से कुछ नहीं चाहिए न पैसा, न कोई सुविधा क्योंकि उनके लिए उनकी जमीन, जंगल और पानी ही सबसे बड़ी पूंजी है। हमें अपने बच्चों के भविष्य को बचाने का है।”
जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार गर्मी की तापमान भी बढ़ता जा रहा है जिससे बेमौसम बारिश और भरे गर्मी में लोग पानी के लिए भटकते दिखे। ग्रामीण इलाकों में लोग पानी के लिए मिलोदूरी का रास्ता तय करते दिखीं। कहीं लाल पानी पीते दिखे तो कहीं सरकारी नल से पानी का एक बूँद भी नहीं टपका।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले पुरवा गांव में रहने वाली गायत्री अहिरवार बताती हैं कि “हर रोज सुबह 4 बजे अपने गांव से पैदल चलकर चार डिब्बे लेकर आती हूं और नंबर लगाकर बैठ जाती हैं। कभी-कभी काफी देर तक इंतजार करना पड़ता है तो कभी एक-दो घंटे में पानी मिल जाता है। पानी की इतनी ज्यादा समस्या है कि लोगों को नहाने-धोने के लिए पानी ही नहीं मिल पाते हैं। पानी के लिए हर रोज एक किलोमीटर दूर जाती हूं।”
कल्लू अहिरवार बताते हैं कि वह मजदूरी करते हैं। दिनभर मजदूरी करने के बाद जब घर लौटते हैं तो उनकी पत्नी हैंडपंप पर नंबर लगाए बैठी रहती है। पहले पानी भरते हैं उसके बाद खाना नसीब होता है। उनका कहना है कि अगर सुबह पानी भरने आना हो तो वह पहले 5 बजे आकर पानी भरते हैं और उसके बाद मजदूरी करने जाते हैं। गांव में पानी की इतनी ज्यादा समस्या है कि अगर यह एक हैंडपंप भी बंद हो जाए तो आधा गांव प्यासा रह जाए। गांव में नल-जल योजना भी नहीं है और एक ही हैंडपंप से पूरा गांव पानी भरता है।
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डाउन टू अर्थ के आंकडे और विभिन्न राज्यों से सामने आए ज़मीनी रिपोर्ट साफ मैसेज देती है कि देश के कई हिस्सों पर बड़े पैमानों पर पेड़ों की कटाई और वन भूमि का गैर वन कार्यों के लिए उपयोग लगातार बढ़ रहा है। विकास परियोजनाओं, खनन और औधगिक विस्तार के नाम पर लाखों पेड़ों को काटने की मंज़ूरी दी जा रही है जिसका असर जंगलों तक न रह कर लोगों के आम जीवन में दिखाई देने लगा है।
जंगलों के खत्म होने का सबसे बड़ा असर उन आदिवासी ग्रामीण और किसान समुदायों पर पड़ रहा है जिनकी आजीविका सीधे तौर पर जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। तेंदू पत्ता, महुआ, चिरौंजी और अन्य वन उपज कम होते जा रही है जिससे लोगों की आय भी प्रभावित हो रही है। वहीं वन क्षेत्र सिमटने के कारण जंगली जानवर गांवों की ओर आ रहे हैं। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन के प्रभाव भी दिखते जा रहे हैं। बढ़ती गर्मी, बेमौसम बारिश सूखते जलस्त्रोत और पेयजल संकट जैसी समस्याएं ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के आम जीवन पर प्रभाव छोड़ रही है। कहीं पानी के लिए लोग लंबी दूरी तय कर रहे हैं कहीं नल जल योजना झूठी साबित हो रही है।
आख़िर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? जंगल लोगों की आजीविका, जैव विविधता, जल स्त्रोतों और जलवायु संतुलन का आधार है। अगर अगर सामान गति से वन क्षेत्रों का क्षरण जारी रहा तो इसका असर आने वाले वर्षों में और व्यापक रूप से दिखाई देगा जो इसी वर्ष से दिखाई देने लगा है। इसकी कीमत आम लोगों को भुगतनी पड़ेगी।
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