खबर लहरिया Blog तेंदू पत्ते की तोड़ाई में जुटे ग्रामीण, एक हफ्ते की मेहनत से चलता है साल भर का खर्च, जंगल घटे तो कम हुआ तेंदू पत्ता

तेंदू पत्ते की तोड़ाई में जुटे ग्रामीण, एक हफ्ते की मेहनत से चलता है साल भर का खर्च, जंगल घटे तो कम हुआ तेंदू पत्ता

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के अजय गढ़ के ग्रामीण अपनी रोजमर्रा कि जरूरतों को पूरा करने और आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए तेंदूपत्ता तोड़ने और बीड़ी बनाने का काम करते हैं। ये उनका एक तरह से पारंपरिक रोजगार है। बीड़ी बनाने में सूखी तम्बाकू के पत्तों और तेंदू के पत्तों का उपयोग किया जाता है। इसके लिए इस समय तपती गर्मी में महिलाएं सुबह से तेंदूपत्ता तोड़ने के लिए जंगल जाती हैं ताकि तेंदूपत्ता तोड़कर इक्ट्ठा कर लें।

रिपोर्ट – अनीता, लेखन – रचना 

तेंदू पत्ते की तोड़ाई करने के बाद पत्ते बांधते लोग (फोटो साभार:अनीता)

तेंदू पत्ता तेंदू के पेड़ से मिलने वाली एक महत्वपूर्ण वन उपज है। यह पेड़ जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगता है हर साल मई महीने में तेंदूपत्ता का संग्रहण किया जाता है। इस समय ज़्यादातर ग्रामीण और आदिवासी लोग खेती के काम से थोड़े खाली रहते हैं इसलिए वे जंगलों से तेंदू पत्ता तोड़कर अपनी रोजी रोटी चलाने का काम करते हैं। 

तेंदू पत्ता का इस्तेमाल मुख्य रूप से बीड़ी बनाने में किया जाता है। यह आदिवासी और ग्रामीण परिवारों के लिए कमाई का एक बड़ा सहारा होता है। इसके अलावा तेंदू पत्ता से मिलने वाली आय और योजनाओं के ज़रिए आदिवासी बच्चों को एकलव्य योजना जैसी सुविधाओं का लाभ भी मिल पाता है। 

तेंदू पत्ता तोड़ने की प्रक्रिया 

ग्राम श्री सोभन की रहने वाली बामरती बताती हैं कि उनके गांव से पहाड़ करीब चार किलोमीटर दूर है। तेंदू पत्ता तोड़ने के लिए वे लोग लगभग सुबह चार बजे घर से निकल जाते हैं और दोपहर 11-12 बजे तक वापस लौटतें हैं। इसके बाद टूटे हुए तेंदू पत्तों को एक एक कर के जमाया जाता है और उनकी गिनती की जाती है। एक तरफ 25 पत्ते और दूसरी तरफ 25 पत्ते रखे जाते हैं। इस तरह कुल 50 पत्तों की एक गड्डी तैयार की जाती है जिसे बाद में बांध दिया जाता है। 

पत्तियों की अलग अलग गड्डियाँ (फोटो साभार: अनीता)                                    

रामरती ने बताया कि गड्डी बांधने के लिए इस्तेमाल होने वाला बंधन या रस्सी आसानी से नहीं मिलती है। इसके लिए जंगल में पेड़ों की जड़ों को खोदकर निकाला जाता है। फिर उन जड़ों को कूटा और साफ किया जाता है तब जाकर उनसे पतली रस्सी जैसी सामग्री निकलती है। उसी से तेंदू पत्तों की गड्डियाँ बांधी जाती है।  

तेंदू पत्ता बांधने के लिए रस्सी (फोटो साभार: अनीता)                                       

इस साल तेंदू पत्ता की तोड़ाई 18 मई 2026 से शुरू हुई है। आम तौर पर तेंदू पत्ता तोड़ने का काम करीब एक हफ़्ते तक चलता है लेकिन कई बार मौसम खराब होने की वजह से यह काम उससे पहले ही बंद करना पड़ता है। यही कारण है कि इस दौरान गांव के लगभग सभी लोग तेंदू पत्ता तोड़ने जंगल जाते हैं। इसमें महिलाएं, पुरुष और बच्चे सभी शामिल होते हैं क्योंकि यह कम समय में कमाई का एक बड़ा सहारा होता है। 

तेंदू पत्ता तोड़ने की जानकारी गांव वालों को समिति के अध्यक्ष या मुंशी के ज़रिए दी जाती है। वन विभाग पहले समिति के अध्यक्ष और मुंशी को तोड़ाई की तारीख़ और समय की सूचना देता है फिर गांव में लोगों को बताया जाता है। हर साल मई महीने में ही तेंदू पत्ता तोड़ने और इकट्ठा करने का काम होता है। पहाड़ों के पास बसे गांव जैसे – श्री सोभन, भासूड़ा, हीरापुर, चुनहा, छतेनी, पिपराही, कुंवरपुर पाठा, डूंगरहों, सिद्धपुर, माखनपुर, भैराहा, तरौनी, गहलोत पूर्वी, भाटिया तरे, आरामनंज और प्रतापपुर में लगभग 80 प्रतिशत परिवार तेंदू पत्ता तोड़ने का काम करते हैं।  

तेंदू पत्ते की गिनती की जा रही है (फोटो साभार: अनीता)                                       

तेंदू पत्ता का पैसा सीधे बैंक में भेजा जाता है। जब पत्तियाँ सुखाकर गोदाम तक पहुंच जाती हैं और सुरक्षित जमा कर ली जाती है तब भुगतान की प्रक्रिया शुरू होती है। इसके बाद लोगों को उनके काम के हिसाब से बोनस भी दिया जाता है।  

पेड़ कटाई के कारण तेंदू पत्ता में कमी 

ग्राम इटवा की रहने वाली हक्की बाई बताती हैं कि अब तेंदू पत्ता पहले की तुलना में बहुत कम मिलने लगा है। उनका कहना है कि पहले जंगल काफी घने हुआ करते थे इसलिए आसानी से अच्छी मात्रा में पत्तियाँ मिल जाती थीं। लेकिन अब लगातार जंगलों की कटाई होने की वजह से तेंदू के पेड़ भी कम होते जा रहे हैं और पत्तियाँ भी जुटाना मुश्किल हो गया है। उन्होंने बताया कि पिछले तीन सालों से तेंदू पत्ता का रेट करीब 400 रुपए चल रहा है हालाँकि कुछ जगहों पर इसका दाम बढ़कर 500 रुपए तब भी इसका दाम बढ़ गया है। 

पत्तों को इकट्ठा कर गड्डी बनाता व्यक्ति (फोटो साभार: अनीता)                                               

वे बताती हैं कि गांव के बाहर एक तय जगह होती है जहां सभी लोग जंगल से तोड़े गए तेंदू पत्ता लाकर जमा करते हैं। वहां मुंशी या समिति के अध्यक्ष सभी की पत्तियों की गिनती करते हैं और उसी हिसाब से एक डायरी में रिकॉर्ड दर्ज किया जाता है। तेंदू पत्ता का पैसा तुरंत नहीं मिलता है। कई बार भुगतान आने में एक से दो महीने लग जाते हैं। कभी-कभी चार महीने तक भी इंतिज़ार करना पड़ता है। 

वन समिति के अध्यक्ष रामप्यारी से बात करने पर बताया गया कि तेंदू पत्ता का संग्रहण साल में सिर्फ एक बार मई महीने में किया जाता है। पहले घने जंगल होने की वजह से तेंदू तोड़ने का काम 15 से 20 दिनों तक चलता था लेकिन अब जंगल कम होते जा रहे हैं जिसके कारण पत्ते की तुड़ाई का कम सिर्फ एक हफ़्ते तक की ही हो पाती है। कम पत्तियों के कारण अब तय लक्ष्य यानी टार्गेट के हिसाब से ही पत्तियाँ तुड़वाई जाती हैं। 

 

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