उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले से एक बेहद गंभीर और परेशान करने वाली घटना सामने आई है जिसने कानून व्यवस्था और पुलिस की भूमिका पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल पहाड़ी थाना क्षेत्र के एक गांव में 17 साल की दलित लड़की ने बलात्कार होने पर न्याय नहीं मिलने के कारण आत्महत्या कर ली। इस आत्महत्या ने पूरे मामले को और भी संवेदनशील बना दिया है।
रिपोर्ट – नाज़नी रिज़वी, लेखन – रचना
इस मामले पर मृतिका के पिता से बात की गई तब यह सामने आया कि यह घटना की शुरुआत होली के दिन 4 मार्च 2026 को हुई थी। आरोप लगाते हुए उनका कहना है कि उनकी लड़की नहर के पास पानी लेने गई हुई थी लेकिन वहां तक पहुंच ही नहीं पाई। रास्ते में ही गांव के कुछ लड़कों ने उसे पकड़ लिया और जंगल की तरफ ले गए और उसका मुंह दबाया और उसके साथ मारपीट की।
पिता के मुताबिक यह घटना घर से करीब दो किलोमीटर दूर हुआ। जब बेटी काफी देर तक वापस नहीं आई तो परिवार को चिंता हुई और उसे ढूंढने के लिए लोग निकले। करीब तीन घंटे बाद वह वापस आई और उसने जो बताया उससे परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई।
लड़की ने बताया कि गांव के ही तीन लड़कों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। परिवार का आरोप है कि इतनी गंभीर घटना के बावजूद पुलिस ने तुरंत मामला दर्ज नहीं किया बल्कि उल्टा लड़की और उसके परिवार पर ही दबाव बनाने की कोशिश की।
तीन दिन तक बयान बदलती रही पुलिस, आरोप
इस मामले में लड़की के पिता ने जो बातें बताई हैं वो पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती हैं। उनका कहना है कि 4 मार्च को हुई घटना के बाद जब वे शिकायत लेकर थाने पहुंचे तो पुलिस ने तुरंत एफआईआर दर्ज नहीं की उल्टा लगातार तीन दिनों तक उनसे आवेदन बदलवाया जाता रहा।
पिता के मुताबिक पुलिस उन्हें या कहती रही कि “ये लड़की का मामला है आगे चलकर शादी नहीं होगी 20 साल तक कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़ेंगे।” गरीब परिवार होने की वजह से वे डर गए। उनका कहना है कि वे इतनी लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं थे। साथ ही घर में लड़की को भी ज्यादा समय तक इस हाल में रखना उनके लिए मुश्किल था।
परिवार का यह भी आरोप है कि घटना के बाद आरोपियों के घर वाले लगातार उन्हें डराते-धमकाते रहे और समझौते के लिए दबाव बनाते रहे। आखिरकार मजबूरी में उन्हें समझौता करना पड़ा जबकि वे ऐसा करना नहीं चाहते थे। पिता का कहना है कि पहले दो दिनों तक उन्होंने सच्चाई ही बताई लेकिन तीसरे दिन पुलिस ने उनका बयान बदलवा दिया।
घटना के बाद बीते 14 अप्रैल 2026 के दिन परिवार के लिए और भी दुखद साबित हुआ। पिता बताते हैं कि उस दिन दोनों लड़कियाँ खेत से काम करके घर लौटी थीं। घर आकर उन्होंने साथ में खाना बनाया और चावल खाए। खाने के दौरान बड़ी लड़की ने कहा कि घर में पानी नहीं है वह पानी लेने जा रही है। जब वह वापस लौटी तो घर का मंजर देखकर सन्न रह गई छोटी लड़की जिसके साथ पहले घटना हुई थी वह फांसी के फंदे पर टंगी मिली।यह दृश्य पूरे परिवार को तोड़कर रख देने वाला था।
“समझौते के बाद भी मिलती रहीं धमकियां” लड़की की मां
मृतक लड़की की मां ने जो बताया वह इस पूरे मामले की एक और डरावनी सच्चाई सामने लाता है। उनका कहना है कि समझौता हो जाने के बाद भी आरोपियों के परिवार वालों की तरफ से धमकियां मिलना बंद नहीं हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि वे बाहर निकलने तक में डराने की कोशिश करते थे और कहते थे “तुम क्या कर लोगे, एक के साथ किया है दूसरी बहन के साथ भी कर देंगे हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा।”
मां के मुताबिक इन लगातार धमकियों की वजह से उनकी बेटी बेहद डर गई थी। वह खेत तक जाने से भी घबराने लगी थी और हमेशा तनाव में रहती थी। धीरे-धीरे उसने लोगों से बात करना भी कम कर दिया था। वह चुप-चुप रहने लगी थी और अपने मन की बात किसी से नहीं कहती थी। लड़की की मां ने यह भी बताया कि जिस दिन यह घटना हुई उस दिन भी उसने कुछ नहीं बताया। वह खेत से बिल्कुल सामान्य तरीके से घर लौटी थी। परिवार को आज तक समझ नहीं आ रहा कि रास्ते में उसके साथ क्या हुआ या किसी ने उससे कुछ कहा भी था या नहीं।
लड़की की मां कहती हैं कि अगर उन्हें ज़रा सा भी अंदाज़ा होता कि उनकी बेटी अंदर ही अंदर इतना टूट चुकी है तो वे उसे कभी अकेला नहीं छोड़ते। शायद तब आज यह घटना नहीं होती।
क्या कहते हैं चित्रकूट सदर विधायक अनिल प्रधान
इस पूरे मामले पर चित्रकूट सदर के विधायक अनिल प्रधान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यह घटना पूरे चित्रकूट को शर्मसार करने वाली है और बेहद दुखद है। विधायक के मुताबिक 4 मार्च को दलित लड़की के साथ इतनी गंभीर घटना हुई लेकिन पुलिस ने समय पर रिपोर्ट दर्ज नहीं की और मामले को दबाने की कोशिश की। उनका कहना है कि इसी लापरवाही की वजह से आरोपियों और उनके परिवार वालों के हौसले बढ़ते गए।
उन्होंने साफ कहा कि इस मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। इतने बड़े गैंगरेप जैसे मामले में तुरंत एफआईआर दर्ज होनी चाहिए थी और आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार कर जेल भेजा जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ जो बेहद निंदनीय है।
विधायक ने मांग की है कि पुलिस इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करे और लड़की के परिवार को जल्द से जल्द न्याय दिलाया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि वे इस मुश्किल समय में लड़की के परिवार के साथ खड़े हैं और उन्हें न्याय दिलाने के लिए हर संभव लड़ाई लड़ेंगे।
दलित नेता कैलाश कोटार्य जो चित्रकूट समाजवादी जिला उपाध्यक्ष के बयान
इस मामले में दलित नेता कैलाश बौद्ध जो चित्रकूट समाजवादी जिला उपाध्यक्ष हैं ने भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उन्हें 4 मार्च की शाम को ही इस घटना की जानकारी मिल गई थी। जैसे ही पता चला कि उनकी ही समाज की एक लड़की के साथ गैंगरेप हुआ है उन्होंने तुरंत परिवार को सलाह दी कि वे पहाड़ी थाने जाकर शिकायत दर्ज कराएं।
कैलाश बौद्ध के मुताबिक परिवार थाने पहुंचा और पुलिस को पूरी जानकारी दी। पुलिस गांव भी गई, लेकिन तब तक आरोपी लड़के वहां से फरार हो चुके थे। इसके बाद पुलिस ने आरोपियों की तलाश करने के बजाय उनके पिता को पकड़ लिया और थाने ले आई। अगले दिन जब उन्हें पता चला कि अब तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई है तो वे खुद लड़की के परिवार के घर पहुंचे। वहां का नज़ारा देखकर वे हैरान रह गए आरोपियों के परिवार वाले जो दबंग और प्रभावशाली थे लड़की के घर पर ही बैठे हुए थे और पूरे परिवार पर दबाव बना रहे थे।
उन्होंने बताया कि उस माहौल में पीड़ित परिवार से खुलकर बात करना भी मुश्किल हो रहा था। किसी तरह वे परिवार को लेकर थाने गए जहां दूसरे दिन लड़की और उसके परिवार का बयान दर्ज कराया। उनका कहना है कि मामले में शुरुआत से ही माहौल ऐसा बना दिया गया था कि लड़की के परिवार खुलकर बात नहीं कर पा रहे थे। कैलाश बौद्ध का आरोप है कि तीसरे दिन हालात और बिगड़ गए। थाने में बयान दर्ज होने के बाद भी लगातार धमकियां दी गईं। जिससे परिवार पर दबाव बढ़ता गया। इसी दबाव के चलते बयान बदले गए और इसी डर और दबाव के बीच लड़की और उसके परिवार के बयान बार-बार बदलवाए गए। उन्होंने कहा कि तीन बार आवेदन बदलवाया गया और आखिरकार चौथे दिन जबरन समझौता करा दिया गया। कैलाश बौद्ध ने इस पूरे मामले में निष्पक्ष जांच और लड़की के परिवार को न्याय दिलाने की मांग की है।
“परिवार ने खुद बदले बयान” एसपी का पक्ष
वहीं इस पूरे मामले पर चित्रकूट एसपी अरूण कुमार सिंह ने भी अपना पक्ष सामने रखा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर दिए बयान में कहा कि पुलिस के पास लड़की के परिवार के लिखित आवेदन और बयान मौजूद हैं और इन्हीं में बदलाव खुद परिवार की तरफ से किया गया है।
एसपी के मुताबिक परिवार पहले थाने आया था और उन्होंने एक तरह की घटना बताई थी लेकिन करीब दो घंटे बाद वे फिर वापस आए और अपना बयान बदल दिया। उन्होंने कहा कि अब उन्हें कोई कार्रवाई नहीं करनी है और जो हुआ वह होली के दौरान रंग लगने जैसा मामला था इससे ज्यादा कुछ नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि लड़की की मौत फांसी लगाने से हुई है और इस पूरे मामले की जांच की जा रही है। साथ ही एसपी ने साफ किया कि अगर जांच में कोई पुलिसकर्मी दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जाएगी।
इस मामले में एक और अहम बात सामने आ रही है जिसने पूरे घटनाक्रम को और गंभीर बना दिया है। परिवार का आरोप है कि आरोपी सवर्ण समुदाय से हैं जबकि लड़की दलित थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या कहीं सामाजिक और जातीय दबाव की वजह से पुलिस की कार्रवाई प्रभावित हुई? कानून की बात करें तो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376D के तहत सामूहिक दुष्कर्म एक बेहद गंभीर और गैर-जमानती अपराध माना जाता है। ऐसे मामलों में तुरंत सख्त कार्रवाई जरूरी होती है।
इसके अलावा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत अगर लड़की दलित समुदाय से है तो उसे खास सुरक्षा देने और मामले में तुरंत कार्रवाई करने का प्रावधान है।
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