कहते हैं युवा देश का भविष्य होते हैं लेकिन जब देश का भविष्य ही सड़कों पर अपनी फटी हुई किताबों और आंसुओं के साथ न्याय की भीख मांगने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था को घुन लग चुका है। शुक्रवार को लखनऊ का इको गार्डन एक बार फिर ऐसे ही हजारों युवाओं की बेबसी और गुस्से का गवाह बना। लेखपाल, UPSI, NEET और CBSE जैसी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले करीब 6 हजार छात्र-अभ्यर्थी अपनी जिंदगी और करियर को बचाने के लिए सड़कों पर उतर आए।
लेकिन इस पूरे प्रदर्शन के बीच दो ऐसी बातें हुईं, जिसने सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक इस आंदोलन की तपिश को बढ़ा दिया। एक तरफ थे नामी पर्यावरणविद सोनम वांगचुक, जिनका एक वीडियो इस आंदोलन के बीच जमकर वायरल हो रहा है, जिसमें वे व्यवस्था के रखवालों को झकझोरते हुए कह रहे हैं— “सुनो कॉकरोचों, कीड़े-मकोड़ों…”वहीं दूसरी तरफ इसी ‘कॉकरोच’ नाम को अपनी पहचान बनाने वाली ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के चीफ अभिजीत दीपके भी मौके पर अपनी राजनीति चमकाने पहुंच गए।”
जब ‘कीड़े-मकोड़ों’ वाले बयान से थर्राई व्यवस्था
सोशल मीडिया पर इन दिनों लद्दाख से लेकर देश के कोने-कोने के मुद्दों पर आवाज उठाने वाले सोनम वांगचुक का एक वीडियो तेजी से दौड़ रहा है। इस वीडियो में उनके शब्द सीधे उन लोगों पर तीर की तरह लगते हैं जो मलाईदार कुर्सियों पर बैठकर युवाओं के भविष्य का सौदा करते हैं। उनका यह कहना कि “सुनो कॉकरोचों, कीड़े-मकोड़ों…” युवाओं के लिए एक नारा बन गया है।
आंदोलन में शामिल छात्रों का कहना है कि जो लोग पेपर लीक करवाते हैं या भ्रष्ट सिस्टम को बढ़ावा देते हैं, उनकी हैसियत समाज में इन कीड़े-मकोड़ों से ज्यादा कुछ नहीं है, जो अंदर ही अंदर पूरे देश के भविष्य को खोखला कर रहे हैं।
आंदोलन के मैदान में राजनीतिक ‘कॉकरोच’ की एंट्री
एक तरफ वांगचुक का वीडियो गुस्से को हवा दे रहा था, तो दूसरी तरफ दोपहर डेढ़ बजे हाथ में संविधान की किताब लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके इको गार्डन पहुंच गए। 1500 से ज्यादा पुलिस और RAF के जवानों के कड़े पहरे के बीच उन्होंने करीब 40 मिनट तक भाषण दिया। दीपके ने छात्रों को आगामी 20 जून को दिल्ली पहुंचने का आह्वान भी किया। इससे पहले उन्होंने पुणे (11 जून) और दिल्ली के जंतर-मंतर (6 जून) पर भी इसी तरह के प्रदर्शन किए थे।
दिलचस्प बात यह है कि दीपके इससे पहले पुणे और दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी अपनी इस ‘कॉकरोच पार्टी’ का झंडा बुलंद कर चुके हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वाकई इन नेताओं को छात्रों के दर्द से कोई सरोकार है?
छात्रों की दोटूक: हमारी लाचारी को राजनीति का अखाड़ा मत बनाओ
इको गार्डन में आए छात्र भोले हो सकते हैं लेकिन बेवकूफ नहीं। यही वजह थी कि जैसे ही अभिजीत दीपके ने मंच संभाला, कई छात्रों ने उनका खुलकर विरोध शुरू कर दिया।
प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों ने साफ कहा “हम यहां अपने हक, अपनी मेहनत और अपने माता-पिता के आंसुओं का हिसाब मांगने आए हैं। हमारा इस कॉकरोच पार्टी या किसी और दल से कोई वास्ता नहीं है। नेता यहां सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने आते हैं, और उनके आने से हमारा पवित्र आंदोलन तहस-नहस हो जाता है।
उत्तर प्रदेश में पेपर लीक होना अब कोई नई बात नहीं रह गई है। हर दूसरी परीक्षा के बाद पेपर लीक की खबर आती है, जांच बैठती है, और फिर सालों तक युवा कोर्ट-कचहरी और तारीखों के चक्कर काटते रहते हैं। एक गरीब परिवार का बच्चा जब पांच बाय पांच के कमरे में दाल-चावल खाकर, रात-रात भर मोमबत्ती या लालटेन की रोशनी में पढ़ता है, तो उसे उम्मीद होती है कि एक दिन उसकी गरीबी दूर होगी। लेकिन परीक्षा के दिन चंद पैसों के लिए पेपर बेच दिया जाता है।
सोनम वांगचुक का बयान उन भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं के मुंह पर तमाचा है जो युवाओं को ‘कीड़ा-मकोड़ा’ समझकर उनके भविष्य से खेलते हैं। लेकिन युवाओं को भी यह समझना होगा कि उनकी इस लड़ाई को मोहरा बनाकर कई ‘राजनीतिक कॉकरोच’ अपनी रोटियां सेकने की फिराक में हैं। लड़ाई युवाओं की है, दर्द युवाओं का है, इसलिए कमान भी युवाओं के ही हाथ में रहनी चाहिए।
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