बुन्देलखण्ड में शादी-ब्याह और शुभ कामों के बाद “सात सुहागिन” खिलाने की परंपरा आज भी कई जगह निभाई जाती है। लेकिन सवाल ये है कि इस रस्म में सिर्फ सुहागिन महिलाओं को ही क्यों शामिल किया जाता है? विधवा महिलाएं और कुंवारी लड़कियां इससे बाहर क्यों रहती हैं? क्या शुभ-अशुभ का फैसला समाज करता है? देखिए लोगों की राय, परंपरा और बदलाव के बीच की बहस, और बताइए आपकी क्या सोच है?
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