खबर लहरिया Blog UP/Varanasi: जो देश को साफ रखते हैं वही खुद सुविधाओं के बिना काम करने को मजबूर

UP/Varanasi: जो देश को साफ रखते हैं वही खुद सुविधाओं के बिना काम करने को मजबूर

वाराणसी जिले के सारनाथ क्षेत्र की रहने वाली सफाई कर्मचारी रुखसाना बेगम से इस मामले पर बातचीत की गई। वे भी सफाई कर्मी (संविदा) में से एक हैं और पिछले तीन से साल से काम कर रही हैं। वे बताती हैं कि सफाई कर्मचारियों के लिए सुरक्षा के नाम पर बहुत कम सुविधाएं मिलती हैं।

रिपोर्ट – सुशीला, लेखन – रचना 

सफाई कर्मचारी, काम के दौरान (फोटो साभार: सुशीला)                                   

सुबह होते ही जब शहर की सड़कें साफ-सुथरी नजर आती हैं गलियां कचरे से मुक्त दिखती हैं और सार्वजनिक जगहों पर सफाई दिखाई देती है तो इसके पीछे सफाई कर्मचारियों की कड़ी मेहनत होती है। ये वही लोग हैं जो हर मौसम हर हालात और बीमारी के खतरे के बीच काम करते हैं ताकि शहर साफ रहे और लोगों का जीवन बेहतर हो सके लेकिन जो लोग पूरे शहर की सफाई का जिम्मा उठाते हैं क्या उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य का भी उतना ही ध्यान रखा जाता है? उत्तर प्रदेश के वाराणसी के कई सफाई कर्मचारियों की कहानी कुछ और ही तस्वीर दिखाती है।

वाराणसी जिले के सारनाथ क्षेत्र की रहने वाली सफाई कर्मचारी रुखसाना बेगम से इस मामले पर बातचीत की गई। वे भी सफाई कर्मी (संविदा) में से एक हैं और पिछले तीन से साल से काम कर रही हैं। वे बताती हैं कि सफाई कर्मचारियों के लिए सुरक्षा के नाम पर बहुत कम सुविधाएं मिलती हैं। सफाई कर्मी को किसी भी प्रकार की सुविधा नहीं दी जाती है। “हम लोगों के लिए न कोई बीमा है न ही काम के दौरान बचाव के लिए जरूरी सामान मिलता है। कई बार तो अपने दुपट्टे से मुंह बांधकर सफाई करनी पड़ती है। कागजों में जरूर कहा जाता है कि सफाई कर्मचारियों को सारी सुविधाएं दी जाती हैं लेकिन वह सुविधाएं हम तक कब पहुंचेंगी यह हमें भी नहीं पता।”                   

सफाई कर्मी रुखसाना बेगम (फोटो साभार: सुशीला)                     

रुखसाना की बात सिर्फ उनकी अपनी परेशानी नहीं है ये परेशानी उन हजारों सफाई कर्मचारियों की आवाज है जो रोजाना धूल, कूड़ा, बदबू और संक्रमण के खतरे के बीच काम करते हैं पर उनके पास खुद को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी साधन नहीं होते।

सालों की मेहनत, लेकिन सुविधाएं आज भी अधूरी

बड़ी मलदहिया बस्ती के रहने वाले विजय पिछले करीब 20 साल से सफाई का काम कर रहे हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने बहुत कम वेतन से काम शुरू किया था और आज करीब 12 हजार रुपये महीना मिलते हैं और आज भी वे वही काम करते हैं लेकिन महंगाई के कारण इतने पैसों में भी परिवार चलाना आसान नहीं है। “पहले महीने में 2100 रुपये मिलते थे तब से काम कर रहे हैं। आज 12 हजार रुपये मिलते हैं लेकिन महंगाई भी बढ़ रही है और हमारी मेहनत के हिसाब से वेतन बहुत कम है। इतने में घर कैसे चले? बच्चों की पढ़ाई, इलाज, बिजली का बिल, घर का खर्च सब कुछ इसी में करना पड़ता है। 

उन्होंने बताया “2020 कोविड के दौरान लॉकडाउन के समय भी हम लोगों ने लगातार काम किया। उस दौरान एक बार थोड़ा सामान मिला लेकिन उसके बाद कुछ नहीं मिला जैसे ग्लबस, मास्क। उसके बाद फिर कभी नियमित रूप से कुछ नहीं मिला। आज भी कई बार हमें अपने इंतजाम से काम करना पड़ता है।”                                      

सफाई कर्मी विजय (फोटो साभार: सुशीला)

सम्मान मिला लेकिन सुरक्षा अब भी सवाल

कोरोना लॉकडाउन के दौरान सफाई कर्मचारियों को “कोरोना योद्धा” कहा गया। वाराणसी में प्रधानमंत्री द्वारा सफाई कर्मचारियों के पैर धोकर उनका सम्मान भी किया गया। उनके ऊपर फूल बरसाए गए और उन्हें समाज का असली हीरो बताया गया।

लेकिन आज कई सफाई कर्मचारियों की हालत देखकर सवाल उठता है कि क्या सम्मान के साथ उनकी सुरक्षा भी सुनिश्चित हुई? कई कर्मचारी बिना दस्ताने, बिना जूते, बिना मास्क और बिना किसी सुरक्षा उपकरण के काम कर रहे हैं। 21वीं सदी में भी अगर किसी कर्मचारी को गंदगी और संक्रमण के बीच बिना सुरक्षा के उतरना पड़े तो यह चिंता का विषय है।

“मास्क, ग्लव्स और जूते तक खुद खरीदने पड़ते हैं”

वाराणसी के कज्जाकपुरा क्षेत्र के रहने वाले सफाई कर्मचारी सूरज बताते हैं कि वह पिछले 8 साल से सफाई का काम कर रहे हैं। पहले दूसरे जिले में काम किया और पिछले दो साल से वाराणसी में कार्यरत हैं। उनका कहना है कि सुबह 6 बजे से दोपहर 2 बजे तक लगातार काम करना पड़ता है। कभी-कभी जरूरत पड़ने पर 24 घंटे तक ड्यूटी करनी पड़ती है। इसके बदले करीब 13 हजार रुपये मिलते हैं और पीएफ भी कटता है लेकिन उसका पैसा अब तक नहीं मिला। “काम के दौरान हमें मास्क, ग्लव्स, जूते जैसी जरूरी चीजें नहीं मिलतीं। कई बार हमें अपने पैसे से खरीदना पड़ता है। अगर मांग करो तो काम से निकालने की धमकी मिलती है। ऐसे में मजबूरी में चुप रहकर काम करना पड़ता है।”
उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले (डेट याद नहीं) उन्होंने एक छोटा सा विरोध किया था कि उन्हें काम के दौरान सुविधाएं दी जाएं लेकिन उसके बाद उन्हें अधिकारियों द्वारा काम से निकालने और वेतन काट कर देने की बात कही गई।     

बिना सुविधा काम करने को मजबूर (फोटो साभार: सुशीला)                            

कर्मचारियों की मांग है कि उन्हें नियमित दवा की सुविधा उपलब्ध कराई जाए हर महीने दस्ताने, मोजे और मास्क जैसे सुरक्षा उपकरण दिए जाएं गर्मी में पीने के पानी की व्यवस्था हो, स्वास्थ्य बीमा की सुविधा मिले और तय समय से ज्यादा काम कराने पर उसका अलग से भुगतान भी किया जाए। उनका कहना है कि ये मांगें कई बार रखी गईं लेकिन अब तक उनकी सुनवाई नहीं हुई।

प्रशासन का क्या कहना है?

इस विषय पर नगर निगम ने भी अपना पक्ष रखा जिसमें नगर निगम के जोनल स्वास्थ्य अधिकारी संदीप भार्गव का कहना है कि वाराणसी में करीब 7423 सफाई कर्मचारी कार्यरत हैं जिनमें नियमित और संविदा दोनों तरह के कर्मचारी शामिल हैं। उनके अनुसार नियमित कर्मचारियों का बीमा भी होता है और साल में दो बार उन्हें सेफ्टी किट दी जाती है। इसमें जैकेट, मास्क, ग्लव्स, जूते जैसी जरूरी चीजें शामिल होती हैं। गर्मियों में पानी की बोतल और धूप से बचाव के लिए टोपी देने की भी व्यवस्था की जा रही है। अगर किसी कर्मचारी तक यह सुविधाएं नहीं पहुंच रही हैं तो शिकायत मिलने पर उसका समाधान किया जाएगा।                                    

नगर निगम कार्यालय (फोटो साभार: सुशीला)

छह महीने में एक बार काफी है क्या?

यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या छह महीने में एक बार दिया गया मास्क, ग्लव्स या जूते, उन सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए काफी है जो रोजाना कूड़े, धूल, बदबू, गंदे पानी और संक्रमण के बीच काम करते हैं? जिन चीजों का इस्तेमाल रोज होता है उनकी जरूरत भी नियमित रूप से पड़ती है। अगर मास्क खराब हो जाए, ग्लव्स फट जाएं या जूते घिस जाएं, तो कर्मचारी क्या करें? बिना सुरक्षा के काम करें या अपनी जेब से खरीदें?

बिना सुविधा सफाई करने से स्वास्थ्य पर असर 

सफाई कर्मचारियों विजय का कहना है कि लगातार गंदगी, धूल और कचरे के बीच काम करने की वजह से कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ता है। अक्सर बुखार, मलेरिया, सांस फूलना, उल्टी होना और सिरदर्द जैसी परेशानियां बनी रहती हैं। काम के दौरान उनके स्वास्थ्य पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है लेकिन इलाज और बचाव के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पातीं। 

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