हरियाणा सरकार का दावा है कि जल जीवन मिशन के तहत राज्य के सभी ग्रामीण घरों तक नल का पानी पहुंच चुका है। लेकिन नूंह जिले के मलाब गांव के लोगों के लिए साफ पीने का पानी आज भी बड़ी समस्या बना हुआ है। गांव के लोगों का कहना है कि या तो नलों में पानी नहीं आता, या फिर कई घरों तक पाइपलाइन पहुंची ही नहीं है।

मलाब की महिलाएं अक्सर पानी लाने के लिए भूमिगत जल टैंक तक कई बार जाती हैं। फोटो: शिवंश श्रीवास्तव/एशियन डिस्पैच
रिपोर्ट व लेखन – शिवांश श्रीवास्तव
करीब 12,200 आबादी वाले इस गांव में लोग पीने के पानी के लिए ज़मीन के नीचे बने पानी के टैंकों पर निर्भर हैं, जिन्हें स्थानीय लोग “कुंड” कहते हैं। गांव में भूजल इतना खारा हो चुका है कि उसे पीने लायक नहीं माना जाता।
सुबह होते ही गांव की महिलाएं और लड़कियां बाल्टी और घड़े लेकर इन कुंडों के पास पहुंचने लगती हैं। कई महिलाओं को दिन में कई बार पानी भरने जाना पड़ता है।
82 साल की शकीला बताती हैं, “जब मेरी शादी होकर मैं यहां आई थी, तब गांव में कुएं थे और पानी मीठा था। लेकिन धीरे-धीरे पानी खारा हो गया। आज तक हमारे घरों तक नल नहीं पहुंचे। पूरी जिंदगी सिर पर पानी ढोते-ढोते अब सिर कमजोर लगने लगा है।”
केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक हरियाणा भूजल में खारेपन के मामले में देश में तीसरे स्थान पर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि राजस्थान, पंजाब और हरियाणा जैसे इलाकों में ज्यादा गर्मी और पानी के तेजी से सूखने की वजह से जमीन के नीचे नमक की मात्रा बढ़ती जाती है।
गांव में बने ये कुंड सरपंच की ओर से बनवाए गए हैं। इनमें करीब 18,000 लीटर पानी आ सकता है और जरूरत के हिसाब से इन्हें भरा जाता है।
60 साल की मकसुइया कहती हैं, “पहले पानी के लिए बहुत दूर जाना पड़ता था। अब कुंड पास बन गए हैं तो दूरी कम हुई है, लेकिन मेहनत उतनी ही है।”
हालांकि गांव वालों का कहना है कि कई बार कुंडों पर लंबी लाइन लग जाती है। कुछ दिनों में पानी खत्म हो जाता है, तब उन्हें दूसरे गांवों तक जाना पड़ता है। इससे गर्मी, थकान, चक्कर और शरीर में पानी की कमी जैसी दिक्कतें होती हैं। इसका सबसे ज्यादा असर महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है।
“अगर पानी पीना है तो बाल्टी उठानी ही पड़ेगी”
26 साल की अर्शी सात महीने की गर्भवती हैं। डॉक्टर ने उन्हें भारी सामान उठाने से मना किया है, लेकिन वह रोज पानी भरने आती हैं।
वह कहती हैं, “घर के लोग काम पर चले जाते हैं। पानी तो चाहिए ही। अगर पानी पीना है तो ये भारी बाल्टियां उठानी ही पड़ेंगी।”

एक गर्भवती महिला पानी लेने के लिए तालाब की ओर जाने की तैयारी कर रही है। फोटो: शिवंश श्रीवास्तव/एशियन डिस्पैच
गर्मी बढ़ने के साथ घरों में पानी की जरूरत भी बढ़ रही है। महिलाएं कहती हैं कि उन्हें दिन में कई बार कुंड तक जाना पड़ता है।
पानी संरक्षण पर काम करने वाले संगठन तरुण भारत संघ के कार्यकारी निदेशक मौलिक सिसोदिया कहते हैं, “इसका महिलाओं की जिंदगी पर गहरा असर पड़ता है। उनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा पानी की तलाश में निकल जाता है।”
वह बताते हैं कि कई महिलाएं प्रसव से कुछ दिन पहले तक पानी ढोती रहती हैं और कई को लंबे समय से कमर दर्द की समस्या रहती है।
गांव में पानी की समस्या का असर लड़कियों की पढ़ाई पर भी पड़ रहा है। कई परिवार लड़कियों को स्कूल भेजने के बजाय घर के काम और पानी भरने में लगा देते हैं।
नूंह जिले में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या पिछले कुछ सालों में बढ़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि पानी की कमी लड़कियों की शिक्षा पर सीधा असर डालती है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार , 2025-2026 में यह दर राज्य के औसत 3.05 के मुकाबले 12.84 थी। हालांकि जल संकट ही इस बढ़ती दर का एकमात्र कारण नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसका लड़कियों की शिक्षा पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
नूह जिले में पानी की कमी पर टीबीएस की एक रिपोर्ट में कहा गया है, “यदि स्कूल में ही पानी का विश्वसनीय स्रोत और साफ शौचालय नहीं हैं, तो अनुपस्थिति जल्दी ही स्कूल छोड़ने में तब्दील हो जाती है।”
एशियन डिस्पैच से बात करते हुए, नूह के विधायक आफताब अहमद ने कहा कि उन्होंने विधानसभा में कई बार यह चिंता उठाई है, लेकिन उनका दावा है कि पानी की आपूर्ति मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
पानी की सफाई भी चिंता का कारण
गांव की रहने वाली अवीदा कहती हैं, “कुंड के आसपास सफाई नहीं होती। हमारे यहां आने वाले मेहमान भी ये पानी पीने से मना कर देते हैं। कहते हैं कि हम तो इस पानी से हाथ भी नहीं धोएंगे। लेकिन हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है।”
सरकारी मानकों के मुताबिक पीने के पानी में TDS यानी घुले हुए पदार्थों की मात्रा 500 mg/L से कम होनी चाहिए। मलाब के कुंडों के पानी में TDS 451 mg/L पाया गया, जो तय सीमा के अंदर तो है, लेकिन विशेषज्ञ इसे पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानते।

इन भूमिगत टैंकों के पानी में टीडीएस की मात्रा 451 मिलीग्राम/लीटर है, जो इस “अनुमत सीमा” के भीतर है। फोटो: शिवंश श्रीवास्तव/एशियन डिस्पैच
पश्चिम बंगाल सरकार के पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञ डॉ. सुबर्णा गोस्वामी कहते हैं, “451 mg/L सीमा के अंदर है, लेकिन लंबे समय तक ऐसा पानी पीने से हाई ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारी, स्ट्रोक और किडनी की दिक्कतें हो सकती हैं।”
खारे पानी की वजह क्या है?
विशेषज्ञों का कहना है कि इस इलाके में पानी के खारे होने की कई वजहें हैं। मौलिक सिसोदिया बताते हैं कि लाखों साल पहले यह इलाका समुद्र के नीचे था। समय के साथ पानी तो चला गया, लेकिन जमीन में नमक रह गया।
वह कहते हैं कि पहले बारिश का पानी जमीन में जाकर खारे पानी को नीचे धकेल देता था, लेकिन अब यह प्राकृतिक प्रक्रिया टूट चुकी है। तेजी से शहरीकरण और गुरुग्राम जैसे इलाकों में जरूरत से ज्यादा भूजल निकालने से समस्या और बढ़ गई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक बढ़ती आबादी, शहरों की पानी की मांग और जलवायु परिवर्तन भी पानी की कमी और खराब गुणवत्ता की बड़ी वजह हैं।
लोग खुद बना रहे हैं समाधान
कुछ परिवारों ने अपने घरों में निजी कुंड बनवा लिए हैं। लेकिन यह काफी महंगा काम है।
किसान साजिद बताते हैं, “एक टैंक बनाने में 70 से 80 हजार रुपये खर्च हुए। आसपास के आठ-नौ परिवारों ने मिलकर पैसे लगाए ताकि गांव के सार्वजनिक कुंड तक बार-बार न जाना पड़े।”
लेकिन इन टैंकों को भरवाने में हर बार करीब 2,000 रुपये खर्च होते हैं। गर्मियों में पानी ज्यादा लगेगा, तो खर्च भी बढ़ेगा। गांव में ज्यादातर परिवारों की महीने की कमाई 10 से 12 हजार रुपये के बीच है।
जो लोग निजी टैंक नहीं बनवा सकते, वे गांव में लगी पाइपलाइन से खारा पानी इस्तेमाल करते हैं या फिर तालाब का पानी कपड़े धोने, नहाने और सफाई के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन तालाब का पानी बहुत ज्यादा दूषित है।
डॉ. गोस्वामी कहते हैं कि इतना खराब पानी सफाई और नहाने के लिए भी सुरक्षित नहीं है और इससे त्वचा की बीमारियां हो सकती हैं।
आगे का रास्ता
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ पाइपलाइन बिछा देने से समस्या हल नहीं होगी।
मौलिक सिसोदिया कहते हैं, “सिर्फ पाइप डाल देने से पानी नहीं आ जाएगा। सबसे बड़ा सवाल पानी के स्रोत का है।”
विशेषज्ञों का कहना है कि गांव के लोगों को योजना और फैसलों में शामिल करना जरूरी है। पानी बचाने, बारिश का पानी जमा करने और स्थानीय स्तर पर रखरखाव की मजबूत व्यवस्था के बिना हालात नहीं बदलेंगे।
गुरुजल संस्था और अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन मिलकर मलाब और घासेड़ा गांव में तीन साल का एक प्रोजेक्ट शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। इसमें पानी की जांच, वर्षा जल संरक्षण, तालाबों को फिर से ठीक करना और RO प्लांट लगाने जैसे काम शामिल हैं।
लेकिन यह संकट सिर्फ मलाब या हरियाणा तक सीमित नहीं है। पूरे दक्षिण एशिया में साफ पानी की कमी तेजी से बढ़ रही है।
यूनिसेफ के मुताबिक दक्षिण एशिया में 18 साल से कम उम्र के करीब 34.7 करोड़ बच्चे ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां पानी की भारी कमी है। भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल में भी पानी की गुणवत्ता और प्रदूषण बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं।
मलाब के लोग अब भी इंतजार कर रहे हैं कि कब उनके घरों तक साफ पानी पहुंचेगा। लेकिन उनकी कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में बढ़ते जल संकट की तस्वीर दिखाती है।
यह कहानी मूल रूप से एशियन डिस्पैच द्वारा 11 मई 2026 को प्रकाशित की गई थी और खबर लहरिया द्वारा अनुमति से पुनः प्रकाशित की गई है।
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