केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव नतीजों ने भारतीय राजनीति का नक्शा बदल दिया है। ममता बनर्जी, एम के स्टालिन और पिनराई विजयन जैसे मोदी सरकार के मुखर विरोधियों की सत्ता से विदाई के साथ राष्ट्रीय विपक्ष व्यावहारिक रूप से नेतृत्वहीन हो गया है। लेकिन सवाल सिर्फ जीत-हार का नहीं है- पश्चिम बंगाल में 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने, असम में परिसीमन के ज़रिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं खींचे जाने और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठते सवालों ने इन नतीजों की वैधता को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। क्या यह जनादेश है या एक सुनियोजित राजनीतिक वर्चस्व की कहानी?
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