उत्तर प्रदेश के चित्रकूट और प्रयागराज के गांवों में इस समय भीषण गर्मी के बीच लोग पुराने देसी तरीकों की ओर लौट रहे हैं। जहां शहरों में लोग एसी और कूलर के सहारे गर्मी से बचने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं गांवों में पक्का घर होने के बाद भी कुशा घास, बांस और सरपत से बने झोपड़ी (छपर, बंगला) लोगों को राहत दे रहे हैं।
रिपोर्ट – सुनीता, लेखन –
भीषण गर्मी से बचने के लिए बनाई झोपड़ी
लोगों का कहना है कि 42 से 43 डिग्री सेल्सियस तापमान के बीच पक्के मकान दिन में भट्ठी की तरह तपने लगते हैं। ऐसे में गांव के लोग घर के सामने घास और बांस से बने छपरे तैयार करते हैं, जहां दिन-रात पूरा परिवार समय बिताता है। इन देसी झोपड़ियों में न सिर्फ ठंडी हवा मिलती है, बल्कि कई परिवार यहीं खाना बनाते, खाते और सोते भी हैं।
गांवों में अलग-अलग नाम, लेकिन मकसद एक
चित्रकूट के बरवार गांव में इसे “बंगला” कहा जाता है। गांव में एक व्यक्ति ने कहा इसे बड़े शहरों वाला बंगला मत समझ लीजियेगा। इसे कहीं “छपरा”, तो कहीं “मड़ई” और झोपड़ी भी कहते हैं। प्रयागराज के घूरपुर इलाके में लोग सरसों के सनेहठा और घास से झोपड़ी बनाते हैं।
गांव की निवासी कुषमा बताती हैं कि उनके घर में 12 लोग हैं। पक्के घरों में इस समय एक मिनट भी रहना मुश्किल हो जाता है। दीवारों से आग जैसी गर्मी निकलती है। इसी कारण गांव के लगभग हर घर में कूसा घास या सरपत से बना बंगला बनाया जाता है। उनका कहना है कि कूसा घास का बना बंगला कई साल तक चलता है, जबकि सरपत जल्दी सड़ जाता है।
वह बताती हैं कि जब पूरा परिवार इसके नीचे रहता है तो कूलर और पंखे की जरूरत तक नहीं पड़ती। चारों तरफ से हवा चलती रहती है और काफी राहत मिलती है। गर्मी के चार महीने पूरा परिवार इसी के नीचे गुजारता है।
“कूलर-पंखा भी फेल हो जाता है”
गांव के विष्णु प्रसाद बताते हैं कि गर्मी के मौसम में चाहे पक्का मकान हो या कच्चा, लोग इन दिनों बंगला (छपर) में रहना ज्यादा पसंद करते हैं।
उनके मुताबिक बरसात के समय भी यह काफी आराम देता है। बाहर तेज बारिश होती रहती है, लेकिन अंदर ठंडी हवा चलती रहती है और पानी की एक बूंद तक अंदर नहीं टपकती। उनका कहना है कि कई बार इस देसी बंगला में सोने का आराम कूलर-पंखे से भी ज्यादा होता है।
कुशा घर का छपर (झोपड़ी) बनाना मुश्किल
लोगों ने बताया कि बंगला (छपर) बनाना आसान नहीं होता। इसके लिए लोग यमुना पार कौशांबी इलाके तक कुशा घास काटने जाते हैं। फिर बांस काटे जाते हैं, उनकी फंटी बनाई जाती है और जंगल से बतना लाकर बांधा जाता है। पूरा परिवार मिलकर 10 से 15 दिन में इसे तैयार करता है। इसमें 10 से 15 हजार रुपये तक खर्च भी हो जाता है, लेकिन गांव के लोग इसे सुकून का घर मानते हैं।
गर्मी में देसी विज्ञान
गांवों की ये झोपड़ियां सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि देसी विज्ञान का उदाहरण भी हैं। घास, सरपत और कुशा जैसी चीजें गर्मी को अंदर आने से रोकती हैं। ऊपर से पेड़ों की छांव और चारों तरफ खुला वातावरण तापमान को कम महसूस कराता है।
प्रयागराज के घूरपुर की रानी बताती हैं कि उनके इलाके में सरसों के सनेहठा से झोपड़ी बनाई जाती है। गांवों में बिजली की समस्या रहती है और कई जगह आज भी नियमित बिजली नहीं पहुंचती। ऐसे में लोग हर साल गर्मी के मौसम में अप्रैल के महीने में झोपड़ी बनाते हैं और चार महीने उसी में रहते हैं।
उनका कहना है कि आम और महुआ के पेड़ों के नीचे बनी झोपड़ी में सुबह दस बजे से लोग बैठ जाते हैं और शाम को ही बाहर निकलते हैं।
पहले के समय में ऐसे ही रहते थे लोग
पुराने समय में गांवों में पक्के मकान बहुत कम होते थे। लोग मिट्टी, खपरैल, फूस और बांस से बने घरों में रहते थे। घरों के सामने बड़े-बड़े छपरे बनाए जाते थे, जहां परिवार और पशु दोनों रहते थे। गर्मियों में लोग पेड़ों के नीचे चारपाई डालकर सोते थे।
तब गांवों में बिजली और पंखों की सुविधा नहीं थी, इसलिए प्रकृति के अनुसार घर बनाए जाते थे। मिट्टी के घर दिन में ठंडे रहते थे और फूस की छत गर्मी को रोकती थी। गांवों की जीवनशैली प्रकृति के साथ जुड़ी हुई थी।
आज भले ही पक्के मकान बढ़ गए हों, लेकिन बढ़ती गर्मी ने लोगों को फिर उसी पुराने देसी तरीके की याद दिला दी है। गांवों के ये बंगले (छपरे) सिर्फ गर्मी से राहत नहीं देते, बल्कि गांव की पारंपरिक समझ, मेहनत और प्रकृति से जुड़ाव की कहानी भी बताते हैं।
आग का खतरा भी बना रहता है
हालांकि घास और सरपत से बने इन बंगलों में खतरे भी होते हैं। क्योंकि यह पूरी तरह सूखी घास से तैयार होते हैं, इसलिए आग लगने का डर बना रहता है। इसी कारण गांव के लोग इन्हें थोड़ी ऊंचाई पर बनाते हैं ताकि बच्चे आग या शरारत से नुकसान न पहुंचा सकें।
इसके बावजूद गांव के लोगों का कहना है कि गर्मी से राहत के लिए इससे बेहतर कोई साधन नहीं है। गांवों में आज भी यह देसी व्यवस्था लोगों की जिंदगी आसान बना रही है।
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