“जब तक अमीर और गरीब के बच्चों को एक जैसी शिक्षा नहीं मिलेगी, तब तक समान समाज का सपना अधूरा रहेगा।” इसी संदेश के साथ सोमवार 13 जुलाई को वाराणसी में समान शिक्षा की मांग को लेकर तीन दिवसीय पदयात्रा की शुरुआत हुई। यह पदयात्रा कल 15 जुलाई 2026 तक चलेगी।
रिपोर्ट – सुशीला, लेखन – सुचित्रा
एक ओर वाराणसी की सड़कों पर बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए समान शिक्षा की मांग बुलंद हो रही है, तो दूसरी ओर दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी शिक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर धरना, प्रदर्शन और भूख हड़ताल जारी है। अलग-अलग स्थानों पर चल रहे ये आंदोलन एक ही सवाल उठा रहे हैं—क्या देश के हर बच्चे को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार वास्तव में मिल पा रहा है?
वाराणसी में शुरू हुई समान शिक्षा पदयात्रा और दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन इस बात का संकेत हैं कि शिक्षा अब केवल एक नीतिगत विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समान अवसर का राष्ट्रीय मुद्दा बन चुकी है। एक तरफ समाजसेवी, शिक्षक और नागरिक “चाहे अमीर की हो या गरीब की संतान, सबकी शिक्षा हो समान” का संदेश लेकर पदयात्रा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दिल्ली में जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके, सोनम वांगचुक (भारत के जाने-माने शिक्षाविद, इंजीनियर, नवाचारकर्ता और पर्यावरण कार्यकर्ता) के साथ कई छात्र संगठन, छात्र और कई प्रदर्शनकारी शिक्षा से जुड़े अपने मुद्दों और मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से आवाज़ बुलंद कर रहे हैं।
शिक्षा को लेकर पदयात्रा
विख्यात समाजसेवी और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित डॉ. संदीप पांडेय के नेतृत्व में यह यात्रा मुंशी प्रेमचंद की जन्मस्थली लमही से शुरू हुई। इसके बाद यात्रा लोकबंधु राजनारायण के गांव गंजारी होते हुए काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में समाप्त होगी। इस पदयात्रा के माध्यम से समाज तथा सरकार का ध्यान समान शिक्षा की ओर आकर्षित करना है।
आपको बता दें कि रेमन मैग्सेसे पुरस्कार (Ramon Magsaysay Award) एशिया का एक प्रतिष्ठित सम्मान है, जिसे अक्सर “एशिया का नोबेल पुरस्कार” भी कहा जाता है।
यात्रा का उद्देश्य सभी बच्चों के लिए समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की मांग को बुलंद करना है। इस अभियान का नारा है—“चाहे अमीर की हो या गरीब की संतान, सबकी शिक्षा हो समान।”
यात्रा के शुभारंभ पर लमही में एक जनसभा आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। सभा में वक्ताओं ने कहा कि देश में आज भी जाति, धर्म, लिंग, भाषा, क्षेत्र, अमीरी और गरीबी के आधार पर भेदभाव मौजूद है। संविधान का अनुच्छेद 15 सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार की बात करता है, लेकिन आज भी समानता का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया है।
शिक्षा ही समानता का माध्यम
वाराणसी से पदयात्रा में शामिल अमित राजभर ने बताया कि लमही गांव में ग्रामीणों ने पदयात्रा का गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने कहा कि मुंशी प्रेमचंद ने अपने साहित्य और जीवन-दर्शन के माध्यम से बार-बार यह संदेश दिया कि शिक्षा केवल रोजगार पाने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, नैतिक मूल्यों और मानवीय समानता की मजबूत नींव है। उनकी रचनाओं में गाँव, किसान, मजदूर, महिलाओं और वंचित वर्ग के संघर्षों के साथ शिक्षा के लोकतांत्रिक महत्व को गहराई से प्रस्तुत किया गया है।
इसी तरह महात्मा गांधी की बुनियादी तालीम (नई तालीम) पुस्तक भी इस विचार पर आधारित थी कि शिक्षा मातृभाषा, श्रम, स्थानीय ज्ञान, नैतिक मूल्यों और समाज से जुड़ाव पर आधारित हो तथा हर बच्चे को बिना किसी भेदभाव के समान रूप से उपलब्ध कराई जाए।
सभा को संबोधित करते हुए डॉ. संदीप पांडेय ने कहा कि आज शिक्षा ही वह सबसे प्रभावी माध्यम है, जो समाज में मौजूद गैर-बराबरियों को कम कर सकती है। उन्होंने कहा कि यदि देश में सचमुच समानता और सामाजिक न्याय स्थापित करना है, तो हर बच्चे को एक जैसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करानी होगी।
आज, जब शिक्षा का क्षेत्र तेजी से बाज़ारवाद की ओर बढ़ रहा है, तब प्रेमचंद और गांधी की शिक्षा-दृष्टि पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है। उनके विचार हमें यह याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब अमीर और गरीब, शहर और गाँव—हर पृष्ठभूमि के बच्चों को समान अवसर और एक जैसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले।
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