हालही में 9 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के बांदा जिले पर दौरे में पहुंचे। उनके दौरे से पहले बांदा में ‘एक पेड़ मां के नाम’ महाअभियान के तहत रिकॉर्ड संख्या में पौधे लगाने का दावा किया गया। बता दें सरकार इसे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम बता रही है। लेकिन इसी बांदा में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम की तैयारियों के दौरान सड़क किनारे वर्षों पुराने हरे-भरे पेड़ों की कटाई की तस्वीरें सामने आई।
ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि जब एक ओर करोड़ों पौधे लगाने की बात हो रही है तो दूसरी ओर सालों पुराने पेड़ों को काटने की जरुरत आख़िर क्यों पड़ रही है? क्या यह पर्यावरण संरक्षण की नीति और जमीनी हकीकत के बीच का विरोधाभास नहीं है?
उत्तर प्रदेश सरकार से एक ही दिन में 35 करोड़ से अधिक पौधे लगाने का दावा किया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसी प्रकृति के प्रति और आने वाले पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी बताया। लेकिन बांदा में मुख्यमंत्री के दौरे से पहले पीडबल्यूडी और अन्य विभागों की तैयारियों के दौरान कई पुराने पेड़ काटे गए। स्थानीय लोगों, पर्यावरण प्रेमियों और छात्रों का कहना था कि ये पेड़ किसी निर्माण या हेलीपेड के रास्ते में नहीं थे। उनका सवाल था कि अगर सरकार पर्यावरण बचाने का संदेश दे रही है तो सरकारी कार्यक्रमों के शुरुआत में ही पेड़ों की बाली क्यों दी जा रही है? आखिर एक विकसित हो चुका पेड़ और एक नया लगाया गया पौधा क्या बराबर माने जा सकते हैं?
सीएम योगी ने अपने एक्स अकाउंट में पोस्ट कर लिखा है कि “’माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:’ का सनातन मंत्र आज उत्तर प्रदेश की जनशक्ति का जीवंत संकल्प बन गया है। आदरणीय प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी के प्रेरक आह्वान ‘एक पेड़ माँ के नाम’ वृक्षारोपण महायज्ञ-2026 के अंतर्गत ‘नए भारत’ के ‘नए उत्तर प्रदेश’ ने एक ही दिन में 35 करोड़ से अधिक पौधरोपण कर प्रकृति संरक्षण के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है। यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, धरती माता के प्रति श्रद्धा और भावी पीढ़ियों के प्रति हमारे उत्तरदायित्व का विराट लोक-यज्ञ है।
वृक्षारोपण महायज्ञ-2026 को जनआंदोलन का स्वरूप प्रदान करने वाले सभी सम्मानित नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, किसानों, मातृशक्ति, युवाओं, सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों तथा @UPGovt के समर्पित कार्मिकों का हृदय से अभिनंदन।”
‘माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:’ का सनातन मंत्र आज उत्तर प्रदेश की जनशक्ति का जीवंत संकल्प बन गया है।
आदरणीय प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी के प्रेरक आह्वान ‘एक पेड़ माँ के नाम’ वृक्षारोपण महायज्ञ-2026 के अंतर्गत ‘नए भारत’ के ‘नए उत्तर प्रदेश’ ने एक ही दिन में 35 करोड़ से… pic.twitter.com/5KxXpM7q0A
— Yogi Adityanath (@myogiadityanath) July 12, 2026
पौधा लगाना आसान लेकिन पेड़ बनने में लगते हैं सालों
पौधा लगाना जरुरी है लेकिन उससे भी ज़्यादा जरुरी है पुराने पेड़ों को बचाना। एक पौधे को छाया देने वाला पेड़ बनने में कई साल कभी-कभी दशकों का समय लगता है। वहीं एक परिपक्व पेड़ रोजाना बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करता है, तापमान कम करने में मदद करता है, भूजल संरक्षण, जैव विविधता और पक्षियों के आश्रय का आधार बनता है। ऐसे में यदि एक तरफ हज़ारों पौधे लगाए जाए और दूसरी ओर दशकों पेड़ों की कटाई की जाए तो पर्यावरणीय नुक़सान की भरपाई तुरंत संभव नहीं होती। इसकी स्थिति या असर बाद में नजर आता है जो अभी देश की वर्तमान स्थिति देख सकते हैं कहीं सूखा पड़ा है तो कहीं बारिश लोगों के जीवन को बहा ले जा रहा है। सिर्फ पौधों की संख्या की ही बात नहीं है पुराने पेड़ों की संरक्षण और असर का भी है।
पेड़ों की कटाई को लगातार मिल रही मंजूरी
पेड़ काटने की सच्चाई केवल बांदा तक सीमित नहीं है। हाल ही में डाउन टू अर्थ द्वारा वन भूमि उपयोग से जुड़े अधिकारिक अभिलेखों के अध्ययन में सामने आया कि जुलाई 2023 से मई 2026 के बीच देशभर में वन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई को मंज़ूरी दी गई। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की सलाहकार समिति के रिकॉर्ड आधार पर किए गए अध्ययन में 288 प्रस्तावों की जांच की गई जिनमें से 242 को मंज़ूरी मिली। इन स्वीकृतियों के तहत 22 हजार हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को खनन, जलविधुत परियोजनाओं और बिजली पारेषण लाइनों जैसे गैर-वन कार्यों के लिए इस्तेमाल करने की अनुमती दी गई। छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग की केंटे एक्सटेंशन ओपनकास्ट कोयला खदान और कोयला वाशरी परियोजना के लिए ही चार लाख से अधिक पेड़ों की कटाई की मंज़ूरी दी गई। अध्ययन में यह भी सामने आया कि कई परियोजनाओं में पेड़ों की संख्या का पूरा विवरण तक दर्ज नहीं था।
अब अगर प्रशासन द्वारा ही पेड़ों को काटने की मंज़ूरी दी जा रही है तो फिर पेड़ लगाने का दिखावा क्यों? ‘एक पेड़ मां के नाम’ से लाखों मां और बहन आदिवासी, आम लोग, जंगली जानवर जैसे तमाम लोगों का जीना मुश्किल होते जा रहा है उसका ज़िम्मेदार कौन है? और ये सवाल भी है कि ये जो एक पेड़ मां के नाम का जो चर्चा है आखिर वो मां हैं कौन? जिनके नाम पर करोड़ों पेड़ काटे जा रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन के दौरे में क्या हमारी प्राथमिकताएँ सही हैं?
देश पहले से ही जलवायु परिवर्तन के गंभीर असर झेल रहा है। कहीं भीषण गर्मी लोगों की जान ले रही है कहीं अचानक भारी बारिश और बाढ़ किसानों की फसलें बर्बाद कर रही है तो कहीं सूखे और पानी की कमी से लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है। शहरों में तापमान लगातार बढ़ रहा है और हरित क्षेत्र तेजी से घाट रहे हैं। ऐसे समय में केवल रिकॉर्ड संख्या में पौधे लगाने की घोषणाएँ काफी नहीं हैं। सबसे बड़ी जरुरत उन पेड़ों को बचाने की है जो वर्षों से पर्यावरण को संतुलित रखने का काम कर रहे हैं।
ऐसा भी नहीं है कि इस तेजी से पेड़ कटाई के खिलाफ लोग लड़ नहीं रहे हैं देश के लगभग राज्यों में इसके खिलाफ लोग मैदान में आ खड़े हैं। अपने जंगल, ज़मीन, पानी, हवा, संस्कृति को बचाने के लिए लोग सरकार के खिलाफ भी डटे हुए हैं। ओड़िसा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड जैसे राज्यों में लगातार उनकी लड़ाई और माँगें जारी हैं।
यदि विकास, सरकारी कार्यक्रमों और औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर लगातार पुराने पेड़ काटे जाते रहे तो पौधारोपण अभियान अपने उद्देश्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाएंगे। पर्यावरण संरक्षण का असली अर्थ तभी पूरा सो सकता है जब नए पौधे लगाने के साथ-साथ पुराने पेड़ों को बचाने को भी समान प्राथमिकता दी जाएगी।
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