खबर लहरिया Blog Ground Report: छत्तीसगढ़ रायगढ़ के तमनार में फ्लोराइड संकट, कोयला खनन, कोल माइंस, पेड़ कटाई और पीले पानी से फैलती बीमारी 

Ground Report: छत्तीसगढ़ रायगढ़ के तमनार में फ्लोराइड संकट, कोयला खनन, कोल माइंस, पेड़ कटाई और पीले पानी से फैलती बीमारी 

रायगढ़ जिले के तमनार ब्लॉक के मुड़ागांव में पीने का पानी लोगों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बनता जा रहा है। वहां के पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण वहां के कई परिवार हड्डियों के बीमारी से जूझ रहे हैं। बढ़ती फ्लोराइड के कारण पानी का रंग बदल कर पीला रंग का हो चुका है। फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण किसी के दांत पीले पड़ गए हैं, लोगों के शरीर पर खाद खुजलियों जैसे बीमारियों हो रही हैं।

रिपोर्ट – पुष्पा, पिंकी, लेखन – रचना 

फोटो साभार: पुष्पा, पिंकी

छत्तीसगढ़ में  भारत की 7.5 प्रतिशत जनजातीय आबादी रहती है और रायगढ़ जिले में जनजातीय समुदाय की आबादी 33.84 प्रतिशत है। यहां, बिरहोर, कावार और बिनजवार जैसी जनजातियां रहती हैं। रायगढ़ जिले के गारे पाल्मा क्षेत्र में कोयला, क्वार्टजाइट, चूना पत्थर और डोलोमाइट जैसे खनिज बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। तमनार और उससे लगे घरघोरा ब्लॉक में कई कोयला खदानें और बिजली संयंत्र है। अब कोल माइंस की संख्या भी बढ़ते जा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार इन खदानों और संयत्रों से निकलने वाली राख हर दिन गुजरने वाले वाले भारी वाहनों के धूल और घंटों खदान और माइंस से निकलने वाले धुएँ से इलाकों में प्रदूषण लगातार बढ़ता ही जा रहा है। गांव और शहर काले रंग के धूल से ढका हुआ है। 

सड़कों में भी जमा काला धूल फोटो साभार: पुष्पा, पिंकी                                      

उनसे लगातार राख निकलती रहती है जिसके कारण वायु गुणवत्ता खराब होती जा रही है। ग्रामीणों और स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानना है कि खनन गतिविधियों के बढ़ने के बाद पानी की गुणवत्ता में गिरावट आई है। 

खदान से निकलता प्रदूषित धुआं (फोटो साभार: पुष्पा, पिंकी)                                        

खनन प्रभावित इन इलाकों में रहने वाले लोग पहले से ही सांस की दिक्कत, त्वचा रोग के साथ और दूसरे बीमारियों के खतरे का सामना कर रहे हैं। अब ग्रामीणों का कहना है कि पीने के पानी में फ्लोराइड की बढ़ती मात्रा ने लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। 

पानी का हर घूंट बीमारी बन गया है। रायगढ़ जिले के तमनार ब्लॉक के मुड़ागांव में पीने का पानी लोगों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बनता जा रहा है। वहां के पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण वहां के कई परिवार हड्डियों के बीमारी से जूझ रहे हैं। बढ़ती फ्लोराइड के कारण पानी का रंग बदल कर पीला रंग का हो चुका है। फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण किसी के दांत पीले पड़ गए हैं, लोगों के शरीर पर खाद खुजलियों जैसे बीमारियों हो रही हैं और कई लोगों की कूबड़ के कारण कमर झुक गई है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के हाथ पांव और रीढ़ की हड्डियों में विकृति (ड्डियों के आकार, जोड़ या मांसपेशियों में असामान्य बदलाव होना) दिखाई दे रही है। 

दांतों का पीलापन पानी का पीलापन (फोटो साभार: पुष्पा, पिंकी)                              

30 साल से ज़्यादा ऊम्र के लोगों को जोड़ों के दर्द की शिकायत होने लगी है। गांव में ऐसे कई लोग हैं जिनकी ऊम्र ज़्यादा नहीं हैं लेकिन उनके शरीर में बुजुर्गों जैसी तकलीफ़ें और कूबड़पन नजर आने लगा है। 

लोगों के शरीर पर खाज खुजली की बीमारी (फोटो साभार: पुष्पा, पिंकी)                                

मुड़ागांव ही नहीं तमनार ब्लॉक के कई गांव के लोग साफ पीने के पानी की मांग को लेकर आंदोलन भी कर रहे हैं। लोगों का मानना है कि रायगढ़ जिले के आसपास बड़ी संख्या में कोयला खदानें हैं और खनन बढ़ने के बाद पानी में फ्लोराइड की मात्रा बढ़ गई और पानी का रंग भी पीला हो गया। हालाँकि इसमें किसी वैज्ञानिक या चिकित्सक पुष्टि नहीं हुई है। ये खदानें लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं जिसके लिए आसपास के जंगल और पेड़ों की कटाई भी लगातार जारी है। जंगल से फल फूल,पत्ते, लकड़ी और दूसरी जरुरत की चीजें भी पेड़ों और जंगल के साथ कटते जा रहे हैं। 

बता दें राज्य के लोक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए जल गुणवत्ता परिदृश्य के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2015 में छत्तीसगढ़ के 27 जिलों में से लगभग 17 जिलों में पानी में फ्लोराइड की मात्रा अनुमेय सीमा से अधिक है।पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने वाले जिले गरियाबंद, धमतरी, महासमुंद, दुर्ग, बालोद, बेमेतरा, कबीरधाम, बस्तर, बीजापुर, कांकेर, कोंडागांव, कोरबा, रायगढ़, सरगुजा, बलरामपुर, सूरजपुर और कोरिया हैं, जबकि केवल राजनांदगांव में आर्सेनिक की मात्रा अधिक बताई गई है। वर्तमान में इसकी मात्रा और संख्या कितनी बढ़ चुकी होगी इसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता। 

फ्लोराइड क्या है? 

फ्लोरोसिस बीमारी एक ऐसी स्थिति है जो फ्लोराइड युक्त पानी के ज्यादा इस्तेमाल से होती है। फ्लोराइड एक प्राकृतिक रूप से पानी में पाया जाने वाला खनिज है। तय मात्रा में इसका शरीर पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। जरुरत से ज्यादा अगर ये शरीर में जाता है तो हमारे स्वास्थ्य खासकर दांत और हड्डियों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

पानी में फ्लोराइड की अधिक मात्रा से लोगों के जीवन पर असर 

रायगढ़ जिले के ग्राम मुड़ागांव के सरपंच अमृत लाल भगत द्वारा बातचीत में पता लगा कि अभी गांव में पानी की समस्या और भी बढ़ती जा रही है। पानी में फ्लोराइड की मात्रा इतनी ज़्यादा है कि पीने के लायक नहीं है लेकिन लोग मजबूरी में उसी पानी का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। “फ्लोराइड वाला पानी हड्डियों पर असर करता है। बच्चों के शरीर की बढ़ने की क्षमता भी प्रभावित हो रही है। इससे खाज-खुजली और कई दूसरी गंभीर बीमारियाँ भी दिखने लगी हैं। हमने पानी का सैंपल भी जांच के लिए पीएचई भेजा था जिसके बाद रिपोर्ट में फ्लोराइड की मात्रा इतनी ज़्यादा निकली की पानी पीने और नहाने लायक भी नहीं था लेकिन आज भी लोग वही पानी पी रहे हैं।”                  

उनका आरोप है कि लोग पानी और उससे होने वाली स्वास्थ्य की समस्याओं को लेकर पिछले दस सालों से आंदोलन कर रहे हैं और साथ ही खदान का विरोध कर रहे हैं कई बार कलेक्टर और दूसरे अधिकरियों और पीएचई को आवेदन दिया गया, मांग रखी और धरना भी दिया लेकिन सुनवाई पूरा शून्य। वे कहते हैं शिकायत करने पर अधिकारी की टीम आती  हैं और जांच कर के चली जाती  हैं जिसका कोई परिणाम भी नहीं निकलता। इस कारण अब लोग शिकायत करते-करते थक चुके हैं और वही पीला पानी पी रहे हैं। उन्होंने बताया कि गांव में तीन पानी फ़िल्टर लगाए गए थे जो दो चार दिन चलने के बाद बंद हो गए। अब वो डेढ़ साल से बंद है। तमनार ब्लॉक के आसपास के पांच से छह गांवों में भी फ़िल्टर प्लांट बंद पड़ा हुआ है। 

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता गायत्री महंथ कहती हैं “आज से पांच-दस साल पहले भी यहां का वातावरण जीने लायक था, हवा बेहतर साफ थी पानी भी भरपूर मिलता था। पहले तालाब और कुओं में पानी रहता था लेकिन अब वे सब सूखते जा रहा है। पानी कभी काला दिखता है कभी पीला। पानी का स्तर भी काफी नीचे चला गया है।” 

पानी का पीलापन (फोटो साभार: पुष्पा, पिंकी)            

वहीं राशमती भगत के अनुसार गांव में कोई स्वास्थ्य सुविधाएँ या स्वास्थ्य केंद्र भी नहीं है। इलाज के लिए करीब 10 किलोमीटर दूर तमनार जाना पड़ता है। उन्होंने बताया कि गर्भवती महिलाओं को सबसे ज़्यादा दिक्कत होती है। अगर रात में अचानक तबियत बिगड़ जाए तो कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार को गांव में स्वास्थ्य सुविधा देने चाहिए। हम लोग वही पीला पानी पीते हैं उसे उबालकर या फिर छानकर। पानी का स्वाद लोहे जैसा और नमकीन लगता है। गांव के बीच एक छोटा सा तालाब है अगर उसमें ज़्यादा लोग नहां ले तो पानी गंदा हो जाता है और फिर बीमारी शुरू हो जाता है।” 

शरीर में फैल रहा खुजली पानी का पीलापन फोटो साभार: पुष्पा, पिंकी,                                      

ग्राम लालपुर रायगढ़ की स्वास्थ्य कार्यकर्ता गितांजली राठिया ने बताया कि –

उनकी टीम सरायटोला, मुड़ागांव, पाता, झेराडीपा, कोसबाड़ी नाम के पांच गांव में काम करते हैं। आगे बताती हैं कि सामान्य तौर पर पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा 0.5 से 1.0 मिलीग्राम प्रतिलीटर तक सुरक्षित मानी जाती है। अगर यह मात्रा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक हो जाए तो इसका स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। इसका प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं पर अलग-अलग तरह से पड़ता है। ज़्यादा फ्लोराइड वाले पानी के लगातार इस्तेमाल से थायरॉयड, त्वचा संबंधी बीमारी, आँत की समस्या जैसे स्वास्थ्य समस्या हो सकती है। उनके अनुसार एक दिन में खाज-खुजली का शिकायत ले कर तीन से चार मरीज इलाज के लिए पहुँचते जाते हैं। 

बढ़ रही खुजली की समस्या (फोटो साभार: पुष्पा, पिंकी)                                   

उन्होंने बताया कि पहले फ्लोराइड की अधिक मात्रा की समस्या मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों से सामने आती थी लेकिन हाल में रिसर्च के अनुसार रायगढ़ जिले के तमनार ब्लॉक के कई गांव भी इससे प्रभावित हो रहा है हैं। सरायटोला, मुड़ागांव, पाता, झेराडीपा, कोसबाड़ी में पानी में फ्लोराइड की मात्रा 2.5 से तीन मिलीग्राम प्रति लीटर तक दर्ज की गई है जबकि इसकी सुरक्षित सीमा 1 से 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर मानी जाती है। इन गांवों में बढ़ते फ्लोराइड स्तर को देखते हुए पहले फ्लोराइड रिमूवल प्लांट लगाए गए थे (20011-12 में पीएचई ने 6 फ्लोराइड रिमूवल प्लांट बनाए) और नल-जल योजना के जरिए दूसरे स्त्रोत से स्वच्छ पेय जल पहुँचाने की व्यवस्था की गई थी हलांकी फिलहाल दोनों योजनाएँ बंद पड़ी है। 

उनके अनुसार सरकार को कोयला खनन गतिविधियों की वैज्ञानिक निगरानी की जानी चाहिए और जहां जरुरत हो वहां नियंत्रण के उपाए भी किए जाने चाहिए इससे पानी में फ्लोराइड की जो मिलावट है वो कम हो सकती है। ऐसा करने से बीमारी से बचाव भी किया जा सकता है। इसके साथ ही प्रभावित गांवों में सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था भी की जानी चाहिए ताकि फ्लोराइड का असर लोगों पे न पड़े। 

क्या कहते  हैं आकंडे? 

ग्रामीण की शिकायतों के बीच पानी की गुणवत्ता को लेकर पहले भी वैज्ञानिक जांच हो चुकी है। (CSIR-NEERI) (इस रिपोर्ट में विस्तार से जानकारी उपलब्ध है) राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान ने वर्ष 2018 में तमनार ब्लॉक के 14 गांवों में पेयलज की गुणवत्ता का अध्यन किया था। जांच में मुड़ागांव, सरायटोला, पाता और गारे समेत कई गांव के कुछ जल स्त्रोतों में फ्लोराइड का असर अधिक पाया गया। इसके अलावा कुछ गांव के पानी में भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) की स्वीकार्य सीमा से अधिक आयरन और आर्सेनिक भी दर्ज किया गया जबकि कुछ स्थानों पर नाईट्रेड, मैंगनीज निकले और सीसा जैसे तत्व भी मिले। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि खनन और उससे जुड़ी गतिविधयाँ भुजल व्यवस्था और पानी की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। 

तमनार ब्लॉक में खदान के लिए पेड़ों की कटाई भी जारी है 

विरोध करते लोग (फोटो साभार: रिनचीन)                                         

हाल ही में बीते 1 जुलाई 2026 को एक बार फिर से छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले के तमनार ब्लॉक में स्थित नागरामुडा गाँव के लोग जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड और ज़िला प्रशासन द्वारा हज़ारों पेड़ काटे जाने का विरोध किए। वैसे वहां के ग्रामीण लंबे समय से इस लड़ाई में डटे हुए हैं। 

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ग्रामीण एक साल से ज़्यादा समय से इसका विरोध कर रहे हैं। इस गाँव को कोयला खदान के लिए विस्थापन (दूसरी जगह बसाने) के लिए चुना गया है लेकिन ग्रामीण उचित और कानूनी तरीके से विस्थापन की मांग कर रहे हैं। 

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गाँव के सबसे कमज़ोर और भूमिहीन लोगों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर भी की है जिस पर प्रशासन और प्रोजेक्ट प्रमोटर को नोटिस जारी किए गए हैं जिसका मामला अभी लंबित है। कई बार धरना किया रोड और कोर्ट की लड़ाई भी जारी है। 

लोगों के अनुसार पुलिस बल और खोजी कुत्तों (स्निफर डॉग्स) की तैनाती के साथ ज़बरदस्ती पेड़ कटवाए जा रहे हैं। ग्रामीणों की मांग साफ है कि उन्हें उनकी पसंद की जगह पर बसाया जाए और जब तक पूरे गाँव का पुनर्वास न हो जाए तब तक उनके जंगल को न काटा जाए।

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मांग है कि सभी परिवारों को शामिल करते हुए एक सही सर्वे किया जाना चाहिए और मुआवज़े के पैकेज में भूमिहीन और कमज़ोर वर्ग के लोगों को भी शामिल किया जाना चाहिए। सरकार और प्रशासन को JSPL (जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड) में समझा दो और निजी स्वार्थ वाले लोगों के साथ मिलीभगत करने के बजाय लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए और उनके अधिकार दिलाने में मदद करनी चाहिए।

बता दें खबर लहरिया द्वारा इस मुद्दे पर अभी तक कई रिपोर्टिंग की गई है। 

 

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