यूपी पंचायत चुनाव का मामला एक बार फिर सामने आया है। यूपी चुनाव को लेकर होने वाली देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त निर्देश दिए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य निर्वाचन आयोग से प्रदेश में ग्राम पंचायतों के होने वाले चुनाव की तारीख़ को बताने को कहा है।
कोर्ट ने ग्राम प्रधानों का कार्यकाल छह महीने बढ़ाने के फैसले पर भी सवाल उठाते हुए यूपी सरकार की दलीलों पर असंतुष्टि जताई है। दरअसल यूपी सरकार ने जो जून और जुलाई के आस पास पंचायत चुनाव होना था उसमें रोक लगाकर ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ा देने का निर्देश दिया था जो अगले छह महीने के लिए लागू किया गया है। इसी निर्णय पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपत्ति जताई है।
इसी के साथ कोर्ट ने राज्य सरकार को समर्पित अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट 10 जुलाई को पेश करने का निर्देश भी दिया है। यह आदेश 3 जून को न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ द्वारा दिया गया। ये आदेश ओमप्रकाश प्रजापति कि जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद आया।
याचिकाकर्ता ने क्या कहा?
राज्य सरकार के 25 मई को दिए गए आदेश के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई जारी है। याचिका दाखिल करने वाले ओमप्रकाश प्रजापति (समाजवादी पार्टी कार्यकर्ता) का कहना है कि पंचायत चुनाव समय पर नहीं कराए गए और मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बना दिया गया। ओमप्रकाश प्रजापति के अनुसार उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12(3)(क) में ग्राम प्रधान का कार्यकाल शपथ लेने की तारीख़ से अधिकतम पांच वर्ष तय किया गया है। ऐसे में प्रधानों के प्रशासक नियुक्त करना उनके कार्यकाल को बढ़ाने जैसा है जो कानून कि भावना के अनुरूप नहीं है।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया है कि पहले जब किसी कारण से पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाते थे तब ग्राम पंचायतों के कामकाज की जिम्मेदारी एडीओ पंचायत या अन्य सरकारी अधिकारियों को सौंपी जाती थी। इसलिए इस बार भी पंचायतों का संचालन किसी सक्षम सरकारी अधिकारी के हाथ में दिया जाना चाहिए था न कि मौजूदा प्रधानों को प्रशासक बनाना चाहिए था।
पंचायती राज मंत्री ओमप्रकाश राजभर की टिप्पणी
पंचायत प्रशासक के नियुक्ति के मुद्दे पर पंचायती राज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने समजवादी पार्टी की आलोचना की है। उनका कहना है कि सपा विकास से जुड़े फैसलों का विरोध करने की राजनीति करती रही है और गांव में चल रहे विकास कार्यों को रोकने और पंचायत व्यवस्था को विवादों में घेरने के लिए इस मामले को अदालत तक ले जाया रहा है।
उनका कहना है कि राज्य सरकार ने ग्राम पंचायतों के कामकाज में रुकावट न आए इसलिए ग्राम प्रधानों को प्रशासक की जिम्मेदारी दी गई है। उनके द्वारा आरोप लगाया गया है कि इस फैसले से सपा को परेशानी हो रही है और वे क़ानूनी प्रक्रियाओं के ज़रिए इसे चुनौती देकर ग्राम प्रधानों के अधिकारो और उनकी भूमिका को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।
उन्होंने अपने एक्स पोस्ट पर लिखा है कि “हर अच्छे काम में अड़ंगा लगाना @samajwadiparty की पुरानी आदत बन चुकी है। ऐसा लग रहा है कि अब गांवों में चल रहे विकास कार्यों को प्रभावित करने के लिए सपा पूरे पंचायत तंत्र को ही अदालती उलझनों में फंसाने की कोशिश में जुट गई है। प्रदेश सरकार ने ग्राम पंचायतों को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाए रखने के लिए अगले पंचायत चुनाव तक ग्राम प्रधानों को ही ‘प्रशासक’ नियुक्त करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है, लेकिन मालूम होता है कि इस फैसले से सपाइयों के पेट में तेज दर्द उठने लगा है।”
हर अच्छे काम में अड़ंगा लगाना @samajwadiparty की पुरानी आदत बन चुकी है। ऐसा लग रहा है कि अब गांवों में चल रहे विकास कार्यों को प्रभावित करने के लिए सपा पूरे पंचायत तंत्र को ही अदालती उलझनों में फंसाने की कोशिश में जुट गई है। प्रदेश सरकार ने ग्राम पंचायतों को सशक्त और आत्मनिर्भर…
— Om Prakash Rajbhar (@oprajbhar) June 3, 2026
पंचायत चुनाव में आरक्षण तय करने के लिए राज्य सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया है। आयोग को अपनी रिपोर्ट देने के लिए छह महीने का समय दिया गया है। पहले कहा जा रहा था कि आयोग कि रिपोर्ट आने के बाद ही पंचायत चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। हलांकि अब हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सरकार को आयोग कि रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करनी होगी। इसके साथ ही राज्य निर्वाचन आयोग को भी कोर्ट को ये बताना होगा कि पंचायत चुनाव कब कराए जाएँगे।
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