7 अप्रैल 2026 को ओडिशा के रायगड़ा जिले के कांतमाल गांव में सिजिमाली पहाड़ियां में बॉक्साइट खनन के खिलाफ प्रदर्शन करने की खबर सामने आई थी। इस प्रदर्शन में आदिवासियों और पुलिस के बीच झड़प में पुलिस द्वारा कथित तौर पर लाठी चार्ज, फायरिंग और आँसू गैस के गोले भी छोड़े गए थे। इसी मामले से जुड़ी एक और खबर सामने आई है। 27 अप्रैल को न्यूज़ एजेंसी आर्टिकल 14 की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि विरोध कर रहे लोगों (खासतौर पर दलित) प्रदर्शनकारियों को जमानत की शर्त के तौर पर पुलिस थानों की सफाई करने के लिए कहा गया था।
वेदांता लिमिटेड मुंबई स्थित 50 साल पुरानी बहुराष्ट्रीय खनन कंपनी है, जिसका संचालन गोवा, कर्नाटक, ओडिशा, आयरलैंड, नामीबिया और ऑस्ट्रेलिया सहित अन्य देशों में होता है।
वेदांता (Vedanta Limited) परियोजना का विरोध कर रहे आदिवासी और दलित ग्रामीणों पर कार्रवाई करते हुए 2023 से 2026 तक कम से कम 40 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। कुछ मामलों में प्रदर्शन में गिरफ्तार हुए प्रदर्शनकारियों में 8 लोगों (6 दलित और 2 आदिवासी) को जमानत के लिए जेल साफ़ कराने की शर्त रखी गई थी। यह रिपोर्ट आर्टिकल 14 की रिपोर्ट में सामने आई है।
दलितों और आदिवासियों से जेल में सफाई करवाने का आरोप
रिपोर्ट के मुताबिक जिन लोगों को पकड़ा गया है वो अधिकतर दलित समुदाय से है और उनके साथ जातिगत भेदभाव किया गया है। जमानत में हीरामल नायक और प्रदर्शनकारी कुमेश्वर नायक का नाम था। अदालत द्वारा जमानत के लिए आदेश में कहा गया – “उसे (हीरामल नायक) काशीपुर पुलिस स्टेशन परिसर की सुबह के समय (सुबह 6:00 बजे से 9:00 बजे के बीच) सफाई करनी होगी। यह काम जमानत से दो महीने तक करना होगा।
काशीपुर पुलिस स्टेशन के प्रभारी (IIC) आरोपी को सफाई के लिए झाड़ू, फिनाइल और अन्य सामान उपलब्ध कराएंगे ताकि वह यह काम कर सके।” नीचे दी गई तस्वीर में आदेश की कॉपी की तस्वीर है जिसमें अंग्रजी में ये लिखा हुआ है।
यह आदेश मई 2025 से जनवरी 2026 के बीच ओडिशा हाईकोर्ट और रायगड़ा ज़िला अदालत के दो न्यायाधीशों ने दिए जो उच्च जाति और ओबीसी वर्ग से थे। 18 फरवरी 2026 को तीन और प्रदर्शनकारी नारंगीदेई माझी, रमाकांत नायक और सुंदर सिंह माझी को भी जेल की सफाई की शर्त का सामना करना पड़ा था। एक साल से अधिक समय तक हिरासत में रहने के बाद वे जेल से रिहा हुए।
जेल में साफ़ सफाई की शर्त को प्रदर्शनकारियों ने यह फैसला जाति के आधार पर भेदभावपूर्ण बताया। उनका कहना है कि आदिवासी और दलित लोगों को जमानत की शर्त के तौर पर सफाई जैसे काम करने के लिए मजबूर करना उनके साथ अन्याय और अपमान है, क्योंकि यह काम पहले से ही समाज में निम्न मानी जाने वाली जातियों से जोड़ा जाता रहा है।
उनका मानना है कि यह सिर्फ कानूनी शर्त नहीं, बल्कि जातिगत सोच को दिखाने वाला फैसला है, जिससे उनकी गरिमा को ठेस पहुंचती है।
वेदांता बॉक्साइट खनन परियोजना के खिलाफ गिरफ्तारी और आरोप
अगस्त 2023 में 13 से 25 तारीख के बीच 24 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इन लोगों ने पुलिस और वेदांता से जुड़ी कंपनी के अधिकारियों को इलाके में घुसने से रोका था, क्योंकि वे गांव वालों से सहमति लेने आए थे।
इसके बाद 20 सितंबर 2024 को काशीपुर पुलिस ने आंदोलन के एक प्रमुख नेता कार्तिक नायक को भी गिरफ्तार कर लिया। कार्तिक नायक की गिरफ्तारी के बाद करीब 200 ग्रामीण उनकी रिहाई की मांग को लेकर थाने के बाहर इकट्ठा हो गए। इस पर पुलिस ने 58 नामजद लोगों और 140 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया।
वेदांता बॉक्साइट खनन परियोजना ((mining project) के खिलाफ विरोध की वजह
यह विरोध 2023 से शुरू हुआ जब वेदांता कंपनी (Vedanta Limited) को सिजिमाली (तिजिमाली) इलाके में खनन की मंजूरी मिली। नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजू जनता दल सरकार ने अनुबंध पर वेदांत कंपनी को दी गई थी। कंपनी को यह खनन इसलिए दिया गया है ताकि लांजीगढ़ में मौजूद वेदांता कंपनी की एल्यूमिना फैक्ट्री को कच्चा माल मिल सके।
आपको बता दें इस परियोजना में सिजिमाली (Sijimali) पर्वत श्रृंखला की बड़ी वन भूमि का इस्तेमाल होगा। करीब 1560 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन होना है, जिसमें लगभग आधी जमीन जंगल की है।
इस खनन से दो गांव मालीपादर (रायगढ़) और सिजिमाली (कालाहांडी) के 140 से ज्यादा परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ सकता है। यहां रहने वाले लोग खेती और पशुपालन करते हैं। वे अपने खेतों में चावल, टमाटर, बैंगन, प्याज और शिमला मिर्च उगाते हैं। अगर यह परियोजना शुरू होती है, तो उन्हें अपनी जमीन और घर छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ेगा।
खनन की अनुमति के लिए झूठी ग्रामसभा करने का आरोप
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सिजिमाली (Sijimali) क्षेत्र “कॉनस्टिट्यूशनल प्रोटेक्टेड आदिवासी क्षेत्र” के अंतर्गत आता है। ऐसे इलाके जिन्हें भारत के संविधान में खास तौर पर आदिवासी समुदायों की सुरक्षा के लिए चिन्हित किया गया है। ऐसी जगह पर खनन के लिए ग्राम सभा से अनुमति लेनी पड़ती है। लेकिन आरोप है कि अनुमति के लिए फर्जी जन सभाएं बुलाई गई और इनमे गांव के लोगों को शामिल भी नहीं किया गया। इसके लिए झूठे हस्ताक्षर कराए गए जिनमें छोटी उम्र के लोग, जो लोग राज्य से बाहर थे और जिनकी मौत हो चुकी थी वे भी शामिल थे।
तीन किलोमीटर लंबी सड़क के निर्माण के कारण हिंसा भड़की
विरोध इसलिए भी किया जा रहा है क्योंकि सिजिमाली बॉक्साइट खदान की ओर जाने वाली 3 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण होना है।
हाल ही में 7 अप्रैल को कांतमाल गांव में सिजिमाली पहाड़ियों में बॉक्साइट खनन के खिलाफ प्रदर्शन तेज होने की खबर आई। द क्विंट की रिपोर्ट के अनुसार ग्रमीणों ने आरोप लगाया कि रात के 2:30 बजे पुलिसकर्मियों का एक बड़ा दल, जो 10 बसों और लगभग एक दर्जन वाहनों में भरा हुआ था जबरन गांव में घुस गया और लोगों को पकड़ कर ले गई। दूसरे दिन सुबह जब लोगों ने इसके विरोध में आवाज उठाई तो हिंसा भड़क गई। पुलिस ने महिलाओं, बच्चों तक पर लाठी से हमला किया और आंसू गैस के गोले भी दागे। इस हमले में कम से कम 40 पुलिसकर्मी और 25 ग्रामीण घायल हो गए।
Firing on Adivasi people !#Odisha Police has started firing on Tribal people protesting against the mining of Bauxite by #Vedanta in Sijimali village, Rayagada district of Odisha ! Police attacked at 3AM when they were sleeping ! Many injured @DhanadaKanta @TribalArmy pic.twitter.com/hcNn2cw8Pd
— Amiya_Pandav ଅମିୟ ପାଣ୍ଡଵ Write n Fight (@AmiyaPandav) April 7, 2026
इसके बाद प्रशासन ने इलाके में कड़ी सुरक्षा लगा दी और हालात को नियंत्रित करने के लिए प्रतिबंध (जैसे धारा लागू करना) लगाए गए। इलाके में अभी भी तनाव है। पुलिस और प्रशासन सतर्क हैं।
वेदांता बॉक्साइट खनन परियोजना के खिलाफ लड़ाई अभी भी जारी
सिजिमाली सिर्फ एक पहाड़ी नहीं है बल्कि यहां रहने वाले आदिवासियों और दलित समुदाय की जीविका का साधन है। उनके लिए ये पहाड़ी भगवान से कम नहीं है सालों से खड़ी इस पहाड़ी को बचाने के लिए यहां के लोग अभी भी संघर्ष कर रहे हैं।
यह लड़ाई उन आदिवासी समुदाय की है जिन्होंने सदियों तक इन पहाड़ों की रक्षा की है। ये पहाड़ ही उन लोगों की जमीन, जंगल और पहचान ही सब कुछ है, जब वही खतरे में पड़ता है तो उनका विरोध सिर्फ गुस्सा नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई बन जाता है।
इन आदिवासी और दलित परिवारों की स्थिति को समझना जरूरी है—वे न सिर्फ अपनी रोज़ी-रोटी, बल्कि अपनी परंपरा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बचाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में जब उन पर कार्रवाई होती है या उन्हें अपमानजनक शर्तों का सामना करना पड़ता है, तो यह तकलीफ और भी गहरी हो जाती है।
राजनीति का असर भी ऐसे मामलों में साफ दिखता है। एक तरफ सरकार विकास और परियोजनाओं की बात करती है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इन मुद्दों को सामाजिक न्याय और अधिकारों से जोड़कर उठाता है। लेकिन असली सवाल यही है कि इस पूरी राजनीति के बीच जमीनी लोगों की आवाज कितनी सुनी जा रही है?
यदि आप हमको सपोर्ट करना चाहते है तो हमारी ग्रामीण नारीवादी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करें और हमारे प्रोडक्ट KL हटके का सब्सक्रिप्शन लें’

