खबर लहरिया Blog Ground Report: ईट भट्ठा में काम करने वाली महिलाएं खुले में शौच करने जाने पर मजबूर

Ground Report: ईट भट्ठा में काम करने वाली महिलाएं खुले में शौच करने जाने पर मजबूर

                             

लोग रोजगार के लिए और अपना जीवन चलाने के लिए दूसरे शहरों में जाते हैं। जैसे भी मेहनत मज़दूरी कर के जीवन चलाने की कोशिश करते हैं लेकिन क्या होगा अगर कार्य स्थल में ही महिलाओं को शौचालय जैसी सुविधा न मिल पाए। उत्तर प्रदेश के ज़िला प्रयागराज के घूरपुर में ईंट भट्ठे का काम चलता है। वहां काम करने वाली महिलाओं का कहना है कि उनके कार्यस्थल में एक भी शौचालय नहीं है। इस कारण उन्हें खुले में शौच करना पड़ रहा है। उस ईंट भट्ठे में छत्तीसगढ़ से आई ललिता नाम की महिला भी काम करती है। 

रिपोर्ट – सुनीता, लेखन – रचना 

लम्बी दूरी तय करके शौच के लिए जाती महिला (फोटो साभार: सुनीता)

“रात के अंधेरे में शौचालय के लिए इधर-उधर जाना पड़ता है।”

मजदूर ललिता द्वारा बताया गया है कि वे अपने पति के साथ यहां आए हैं और इस ईंट भट्टे में काम करते हैं। यहां आए तीन महीना हुआ है। लेकिन अभी तक उन्हें यहां पर सबसे बड़ी समस्या शौचालय की लगी है। उन्होंने बताया शौच के लिए उन्हें बाहर दूसरी जगह पर जाना पड़ता है और वहां इतने सारे ईंट भट्टे हैं और सभी हाईवे रोड के किनारे है इस कारण महिलाओं को शौचालय के लिए सही जगह नहीं मिल पाती है। शौचालय के लिए सुबह के अंधेरे में इधर से उधर घूमना पड़ता है। “अगर दिन में पेट खराब हो जाए या फिर कोई इमरजेंसी हो तो बहुत मुश्किल होती है। छोटे-छोटे बच्चे और पुरुषों के लिए कहीं भी शौच जाना आसान होता है लेकिन महिलाएं और लड़कियाँ कहां जाए? कहां बैठे?” ललिता का कहना है ये बहुत जरुरी सुविधा है इसे हर ईंट भट्टे में होना चाहिए। 

वे कहती हैं इन्हीं सब कारणों से उन्होंने अपने बच्चों को छत्तीसगढ़ में ही छोड़ दिया है। यहां बच्चों की पढ़ाई भी कोई सुविधा नहीं है। “हम दोनों पति पत्नी एक हजार ईंट बना लेते हैं तो उसके बदले एक हजार रुपए मिलते हैं। यही हमारे कमाने का सीजन है। बारिश शुरू होते ही करीब चार महीने ईंट बनाने का काम बंद हो जाता है इसलिए अभी जितना हो सके काम कर लेते हैं ताकि बारिश का खर्च निकल सके इस कारण बिना शौचालय के भी काम कर लेते हैं, मजबूरी है।” उनका कहना था कि सरकार ने तो कार्यस्थल पर भी शौचालय बनाने की सुविधा दिया है लेकिन हकीकत तो कुछ और ही है। “हम लोग दूसरे शहर से आए हैं इस कारण यहां का मालिक हमारा सुनता नहीं है। अगर कोई परेशानी बताओ तो कहते हैं काम करना है तो करो वरना वापस चले जाओ।”

(फोटो साभार: सुनीता)                                             

50 महिलाएं और लड़कियाँ काम करती हैं 

घूरपुर की ही रहने वाली महिला गीता भी उसी ईंट भट्टे में काम करती है। उनके चार छोटे बच्चे हैं। उनका गांव घूरपुर से दस किलोमीटर और अंदर में है। उन्होंने बताया कि रहने के लिए टिन का बना एक कमरा दिया है जिससे गर्मी में सांसे फूलने लगती है लेकिन फिर भी रह रहे हैं और बस शौचालय की उम्मीद कर रहे हैं।                                    

छोटी सी झोपड़ी में परिवार का बसेरा (फोटो साभार: सुनीता)

“हम ज़्यादा समय पेड़ के नीचे बैठ कर ही गुज़ारा करते हैं। कई लोग भट्टे पर आते हैं फोटो लेते हैं और फिर चले जाते हैं लेकिन ऐसी सुविधाओं को लेकर कोई अधिकारी कुछ नहीं कहता है।” उन्होंने बताया उस ईंट भट्टे में करीब 50 महिलाएं और लड़कियाँ काम करती हैं लेकिन फिर शौचालय की सुविधा शून्य। बता दें घूरपुर इलाके में लगभग डेढ़ सौ ईंट भट्टे हैं। 

ईंट भट्टा (फोटो साभार: सुनीता)                                                  

ईंट भट्टे के एक और मज़दूर गुलाब का कहना है कि महिलाओं को शौच के लिए दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। अगर काम के बीच में एमरजेंसी आए और जाना पड़े तो काम छूट जाता है और फिर उसका हाज़िरी काट दिया जाता है।इस इलाके के सभी ईंट भट्टे में सर्वे होना चाहिए और हर ईंट भट्टे में शौचालय बनाना चाहिए। मज़दूरों ने ईंट भट्टे के मालिक से इस बारे में बात की थी लेकिन करवा देंगे का भरोसा दिया गया और अभी तक कुछ भी नहीं हुआ। 

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर की रहने वाली रुखमनी बताती हैं कि शौचालय नहीं होने के कारण कई बार महिलाएं शौच रोक कर रखती हैं क्यों कि काम के बीच में जा भी नहीं सकते हैं और इससे उनके स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। वे कहती हैं “मैं अगली बार कहीं दूसरी जगह के ईंट भट्टे में जाऊँगी तो सबसे पहले शौचालय की ही मांग करूँगी।”  

वे बताती हैं कि सबसे ज़्यादा परेशानी महिलाओं को महवारी के समय होती है। मजबूरी में जो टिन का झोपड़ी देते हैं उसी में महवारी का कपड़ा बदलते हैं।         

काम करते हुए (फोटो साभार: सुनीता)

सुविधा दे कर मज़दूरी से काट लिया जाता है। 

वहीं बिलासपुर के रहने वाले राममनोहर पिछले चार महीने से इस ईंट भट्टे में काम कर रहे हैं। वे बताते हैं कि उनके साथ उनकी पत्नी और दो बेटियाँ रहती हैं। सुविधा के नाम से टिन का एक छोटी सी झोपड़ी दिया जाता है, एक लाइट के साथ बिजली दी जाती है लेकिन काम खत्म होने पर उसका पैसा मजदूरी से काट लिया जाता है। “मेरी दो बेटियाँ है बाहर शौच में जाती हैं तो मन में डर बना होता है। जब लड़कियाँ शौच के लिए जाती हैं तो या तो उनके साथ किसी को जाना पड़ता है या फिर हम झोपड़ी पर से उन पर नजर रखते हैं। हम दूसरे शहर से हैं किसी को जानते नहीं है तो डर ज़्यादा बना होता है।” उन्होंने बताया सब को जीवन चलाना है इस चार महीने की कमाई में इस कारण सब चुप चाप से काम करते हैं क्योंकि कुछ बोलने पर काम से निकाल दिए जाने का डर है। 

ईंट भट्टे के मालिक का पक्ष 

मज़दूरों का पक्ष सुनने के बात ईंट भट्टे के मालिक से भी बात की गई और उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई । भट्टे के मालिक चिंटू और दूसरे मालिक कुंवर बहादुर सिंह का कहना है कि भट्टे में शौचालय की सुविधा नहीं है। महिलाओं को बाहर जाने में दिक्कत होती है इसलिए अगले साल से उनके लिए शौचालय बनवाने की कोशिश की जाएगी। 

 

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