खबर लहरिया Blog कहीं मौत का सबूत, कहीं बीमारी का प्रमाण, ओडिशा और बिहार की दो घटनाएं, एक सवाल

कहीं मौत का सबूत, कहीं बीमारी का प्रमाण, ओडिशा और बिहार की दो घटनाएं, एक सवाल

ओडिशा और बिहार से सामने आई दो घटनाओं ने सरकारी व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं,जहां एक व्यक्ति को बहन की मौत और एक महिला कर्मी को अपनी बीमारी साबित करने के लिए अपमानजनक हालात से गुजरना पड़ा। ये घटनाएं दिखाती हैं कि गरीब, आदिवासी और कमजोर तबके के लोगों के लिए अपने हक तक पहुंचना आज भी कितना मुश्किल और बेबस करने वाला है।     

दोनों घटनाओं की तस्वीर (फोटो साभार: सोशल मीडिया में वायरल वीडियो का लिया गया स्क्रीन शॉर्ट)

क्या अपने हक के लिए एक आम इंसान को इस हद तक गुजरना चाहिए कि उसे अपनी बात साबित करने के लिए अपमान और बेबसी का बोझ उठाना पड़े? क्या यह सिर्फ सरकारी प्रक्रिया का पालन है या फिर संवेदनहीनता की वह सीमा जहां इंसान की तकलीफ से ज्यादा कागज और औपचारिकताएं मायने रखने लगती हैं? देश के अलग-अलग राज्यों से सामने आई दो घटनाएं यही सवाल खड़े करती हैं। एक में भाई अपनी मृत बहन का कंकाल कंधे पर उठाकर बैंक पहुंचता है तो दूसरी में एक बीमार महिला कर्मी सलाइन चढ़ते हुए अपनी हाजिरी लगाने पहुंचती है।

पहला मामला 

इन दिनों ओडिशा के क्योंझर जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है जो चर्चा का विषय बना हुआ है और जिसने सिस्टम पर भी कई सवाल खड़े किए हैं। दरअसल 27 अप्रैल 2026 को सोशल मीडिया में एक वीडियो सामने आया जिसमें एक व्यक्ति एक कंकाल (मृत शरीर) को कंधे में लेकर चलते नजर आए। उसके बाद सच्चाई सामने आई कि ओडिशा के क्योंझर जिले में एक भाई अपनी मृत बहन के बैंक खाते में जमा पैसे निकालने के लिए उसका कंकाल कंधे पर उठाकर बैंक पहुंच गया।

दियानाली गांव के रहने वाले जीतू मुंडा अपनी मृतक बहन कलरा मुंडा के खाते से करीब 19 हजार रुपये निकालना चाहते थे। बता दें मृतक कलरा दिहाड़ी मजदूरी कर अपना गुजारा करती थीं और कुछ समय पहले एक बछड़ा बेचकर मिले पैसे उन्होंने बैंक में जमा किए थे। करीब दो महीने पहले उनकी मौत हो गई।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जीतू का कहना था कि वह कई बार बैंक गए और अधिकारियों को समझाया कि उनकी बहन अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन बैंक की तरफ से खाताधारक को सामने लाने या कानूनी दस्तावेज और मौत का प्रमाण देने की बात कही गई। लगातार चक्कर लगाने और बात न सुने जाने से परेशान होकर जीतू श्मशान घाट पहुंचे। बहन के अवशेष निकाले और उन्हें बोरी में रखकर करीब तीन किलोमीटर पैदल बैंक तक ले आए ताकि साबित कर सकें कि उनकी बहन की मौत हो चुकी है।

बैंक में यह दृश्य देखकर वहां मौजूद कर्मचारी और ग्राहक सन्न रह गए। इसके बाद प्रशासन और पुलिस मौके पर पहुंची मामला शांत कराया गया और जरूरी जांच के बाद बीते कल यानी 28 अप्रैल 2026 को खाते में जमा रकम परिवार और जीतू मुंडा को सौंप दी गई है। BBC की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार इस घटना पर चिंता जताते हुए जिला प्रशासन ने डिस्ट्रिक्ट रेड क्रॉस फंड से जीतू मुंडा को 30 हजार रुपये की आर्थिक मदद भी दी है।

दूसरा मामला 

ओड़िसा के बाद वहीं अब बिहार के कटिहार से भी सिस्टम की बेरुखी दिखाने वाली एक और घटना सामने आई है। यहां एक आंगनबाड़ी सेविका को अपनी बीमारी साबित करने के लिए हाथ में चढ़ रही सलाइन के साथ अधिकारी के सामने पहुंचना पड़ा।

(सलाइन यानी शरीर में पानी और जरूरी खनिज तत्वों की कमी पूरी करने के लिए नसों के जरिए चढ़ाया जाने वाला तरल पदार्थ,ड्रिप)

NDTV के रिपोर्ट अनुसार मामला कटिहार जिले के मनिहारी थाना क्षेत्र के नारायणपुर पंचायत का है। यहां प्रेमलता हेंब्रम आंगनबाड़ी सेविका के पद पर काम करती हैं। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ दिनों से उनकी तबीयत काफी खराब थी और इसी वजह से वह छुट्टी पर थीं। इसी दौरान बाल विकास परियोजना अधिकारी केंद्र के निरीक्षण के लिए पहुंचीं। सेविका के मौजूद न होने पर उन्हें तुरंत केंद्र पर हाजिर होने के लिए कहा गया।

नौकरी जाने के डर और अधिकारी के आदेश के बाद प्रेमलता हेंब्रम अपनी खराब तबीयत के बावजूद केंद्र पहुंचीं। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि उनके पति एक तरफ उन्हें सहारा देकर चल रहे हैं और दूसरी तरफ हाथ में सलाइन की बोतल पकड़े हुए हैं। यह मामला 26 अप्रैल 2026 का है। 

जिस महिला को अस्पताल में आराम की जरूरत थी वह अपनी बीमारी का सबूत देने के लिए अधिकारी के सामने हाजिरी लगाने पहुंच गई।

फिलहाल इस मामले में बाल विकास परियोजना अधिकारी की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा यह वीडियो सरकारी व्यवस्था के रवैये और संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर रहा है। कई लोग इसे सिस्टम की बेरुखी और आम कर्मचारियों की मजबूरी की तस्वीर के तौर पर देख रहे हैं।

कोई मरने का सबूत मांग रहा है तो कोई बीमारी का। ओडिशा और बिहार की ये दोनों घटनाएं सिर्फ दो अलग-अलग खबरें नहीं हैं ये उस सच्चाई की तस्वीर हैं जो अक्सर गांव, गरीब, आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों के जीवन में दिखाई देती है। आज देश में बैंकिंग से लेकर राशन, पेंशन और दूसरी कई जरूरी सेवाएं ऑनलाइन और कागजी प्रक्रियाओं से जुड़ गई हैं। सवाल यह है कि जिन लोगों तक आज भी पूरी शिक्षा, जानकारी और तकनीकी समझ आसानी से नहीं पहुंच पाई वे इन जटिल प्रक्रियाओं को कैसे समझें और अपना हक कैसे हासिल करें?

ओडिशा के जीतू मुंडा आदिवासी समुदाय से आते हैं। ऐसे में यह सोचने वाली बात है कि क्या व्यवस्था ने उन लोगों के लिए रास्ते आसान किए हैं जो पढ़े-लिखे नहीं हैं या जिन्हें सरकारी नियम-कायदे समझने में दिक्कत होती है? कई बार गरीब और कमजोर तबके के लोगों की बात पर आसानी से भरोसा नहीं किया जाता। उनकी परेशानी को समझने के बजाय उनसे सबूत मांगे जाते हैं। यही वजह है कि अपने सच को साबित करने के लिए किसी को श्मशान तक जाना पड़ता है तो किसी को बीमारी की हालत में भी दफ्तर पहुंचना पड़ता है।

अगर अपने ही हक के लिए किसी को गड़े मुर्दे उखाड़कर बैंक जाना पड़े और किसी बीमार महिला को सलाइन के साथ हाजिरी लगाने पहुंचना पड़े तो यह उस व्यवस्था का आईना हैं जहां गरीब की बात सुनने से पहले उससे सबूत मांगा जाता है। सवाल यही है कि क्या अब गरीब लोगों की आवाज और उनके सच पर भरोसा नहीं किया जाता? अगर ऐसा है तो फिर यह व्यवस्था, ये सिस्टम, ये सरकार आखिर किसके लिए है?

 

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