खबर लहरिया जिला 6 महीने बाद भी दलित महिला प्रधान को नहीं मिला काम का अधिकार, राजनीति रस राय

6 महीने बाद भी दलित महिला प्रधान को नहीं मिला काम का अधिकार, राजनीति रस राय

नमस्कार दोस्तों, मैं हूँ मीरा देवी, खबर लहरिया की ब्यूरो चीफ। मेरे शो राजनीति रस राय में आपका बहुत बहुत स्वागत है। एक बार फिर से हाजिर हूँ मैं, आपके साथ राजनीति की चर्चा को लेकर। कैसे हैं सब और बताइये क्या चल रहा है। राजनीति को लेकर आप और आपके आसपास किस तरह की चर्चाएं हैं।

सरकारें दावा करती हैं कि जातिगत छुआछूत और भेदभाव खत्म हो गया है। मेरा एक सवाल है आप लोगों से कि क्या सही में जातिगत भेदभाव खत्म हो गया है? अगर आप मुझसे जानना चाहें तो मैं अपनी एक राजनीतिक रिपोर्टिंग के माध्यम से बताना चाहूंगी कि जातिगत भेदभाव अब भी कायम है। इसको तोड़ना नहीं चाहते लोग वरना आज तक यह खत्म हो गया होता। आप तोड़ना चाहेंगे? आइये रिपोर्टिंग का अनुभव शेयर करती हूं।

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उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव का रिजल्ट 2 मई को आया था। मई से जोड़ा जाए तो अब तक में 6 महीने बीत चुके हैं लेकिन जो अनुसूचित जाति के प्रधान हैं वह अब तक प्रधान कहलाने के जद्दोजहद में लगे हैं। उसमें भी अगर महिला प्रधान है तो उनको प्रधान माना ही नहीं जा रहा। उनको पंचायत से जिले जिले तक के अधिकारी इस अधिकार को दिलाने में अब तक नाकामयाब साबित हुए हैं। बता दूं कि बांदा जिले में 470 ग्राम पंचायतों में से लगभग 40 ग्राम पंचायतों में अनुसूचित जाति की महिला प्रधान चुनी गईं।

एक मामला है बदौसा ग्राम पंचायत का। यहां पर लालचन्द्र सरोज कई पंचायतों में प्रधान रहे। एक बार उनकी बेटी भी प्रधान बनी। इस कड़ी को यहां के निवासियों ने तोड़ा और इस बार सरोज सोनकर प्रधान बनीं। अपने इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि लगभग 6 महीने हो गए अब तक उनको कार्यभार नहीं दिया गया। सचिव अब भी पूर्व प्रधान के इशारों में काम करता है। वीडीओ का कहना है कि वह जांच कराएंगे लेकिन उनकी जांच खत्म ही नहीं हो रही। 18 सितम्बर को अतर्रा तहसील में लगने वाले सम्पूर्ण समाधान दिवस में शिकायती पत्र दिया। इसके अलावा मुख्यमंत्री को भी पत्र भेजा लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई।

यह मामला कोई अकेला नहीं है। अनूसूचित जाति के प्रधान चाहे वह महिला हों या पुरुष उनको खुद के अधिकार लेने में सरकार और प्रशासन क्यों कड़ी कार्यवाही नहीं कर पा रही है। ऐसे में सवाल उठाना और पूंछना हमारे लिए बहुत जरूरी हो जाता है कि क्या यही है आपका दलित प्रेम? चुनाव के समय क्यों उमड़ पड़ता है ये दलित प्रेम? फिर उनके घर में खाना खाना हो या फिर बड़े मंच में उनका पैर धुलना हो? ऐसा करके आप ठोंगी ही कहलायेंगे दलित हितैसी नेता तो कभी नहीं बन सकते।

साथियों इन्हीं विचारों के साथ मैं लेती हूं विदा, अगली बार फिर आउंगी एक नए मुद्दे के साथ। अगर ये चर्चा पसन्द आई हो तो अपने दोस्तों के साथ शेयर करें। लाइक और कमेंट करें। अगर आप हमारे चैनल पर नए हैं तो चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें। बेल आइकॉन दबाना बिल्कुल न भूलें ताकि सबसे पहले हर वीडियो का नोटिफिकेशन आप तक सबसे पहले पहुंचे। अभी के लिए बस इतना ही, सबको नमस्कार!

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