खबर लहरिया Blog ‘One District, One Cuisine’ : यूपी में ‘एक जिला, एक व्यंजन’ (ओडीओसी) योजना को मंजूरी, 208 व्यंजनों की सूची में नॉन वेज न शामिल करने पर उठे सवाल

‘One District, One Cuisine’ : यूपी में ‘एक जिला, एक व्यंजन’ (ओडीओसी) योजना को मंजूरी, 208 व्यंजनों की सूची में नॉन वेज न शामिल करने पर उठे सवाल

उत्तर प्रदेश अपने अलग-अलग प्रसिद्ध व्यंजनों के लिए जाना जाता है। खासकर नॉन-वेज खाने में लखनऊ का गलावटी कबाब, मुरादाबाद की बिरयानी और आज़मगढ़ का हांडी मटन काफी लोकप्रिय हैं। लेकिन अब यूपी सरकार की ‘एक जिला, एक व्यंजन’ (ODOP) योजना को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इस योजना के तहत तैयार की गई 208 व्यंजनों की सूची में किसी भी नॉन-वेज व्यंजन को शामिल नहीं किया गया है।

‘एक जिला, एक व्यंजन’ (ODOP)

यूपी में प्रसिद्ध नॉन वेज व्यंजन (फोटो साभार: एआई द्वारा निर्मित)

सोमवार 4 मई 2026 को मंत्रिमंडल ने ‘एक जिला, एक व्यंजन’ योजना को मंजूरी दे दी। इस योजना का मकसद उत्तर प्रदेश के पारंपरिक और मशहूर खाने को बढ़ावा देना है। इसके तहत व्यंजनों की ब्रांडिंग, अच्छी पैकेजिंग और मार्केटिंग की जाएगी, ताकि वे ज्यादा लोगों तक पहुंच सकें। इससे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा पिछले साल 2025 दिसंबर में पहली बार इस योजना की चर्चा की गई थी। इसके बाद इस योजना का शुभारंभ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 24 जनवरी 2026 को लखनऊ में उत्तर प्रदेश दिवस समारोह के दौरान किया गया।

यह योजना ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (‘One District, One Cuisine’/ODOP) की तर्ज पर शुरू की गई है। इस योजना में प्रदेश के 18 मंडलों और 75 जिलों के कुल 208 पारंपरिक व्यंजनों को शामिल किया गया है। उदाहरण के तौर पर, लखनऊ जिले के लिए रेवड़ी, चाट, मलाई मक्खन और आम से बने उत्पादों को चुना गया है। वहीं मुरादाबाद मंडल में दाल और हांडी हलवा जैसे व्यंजनों को शामिल किया गया है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश के अवस्थी द्वारा साझा की गई व्यंजनों की सूची (फोटो साभार: सोशल मीडिया X/@AwasthiAwanishK)

नॉन वेज (मांसहारी खाना) खाना शामिल न करने पर सवाल

‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (‘One District, One Cuisine’/ODOP) योजना सामने आने पर सूची में शामिल किए गए व्यंजन पर सवाल उठे। ऐसा इसलिए यूपी में अधिकतर व्यंजन जो प्रसिद्ध है वो मांसहारी खाना है और उन्ही को सूची से बाहर कर दिया गया है।

इस पर खाद्य समीक्षक और इतिहासकार पुष्पेश पंत ने सवाल उठाया। उन्होंने कहा “भारत सरकार भी मानती है कि 68% आबादी मांसाहारी है और इतना ही नहीं, ये लोग न सिर्फ मुसलमान हैं बल्कि दलित, कायस्थ और यहां तक ​​कि कश्मीरी ब्राह्मण, मैथिली ब्राह्मण या गोवा के सारस्वत ब्राह्मण भी हैं। इसके अलावा, आप भोजन को मानव निर्मित सीमाओं में नहीं बांध सकते। उदाहरण के लिए, भोजन के मामले में लाहौर और अमृतसर जुड़वां शहर हैं।”

उन्होंने लखनऊ में गलाउटी कबाब के अलावा अन्य नॉन वेज खाने की बात करते हुए कहा “यहां काकोरी कबाब या चार मगज का मुर्गा भी मिलता है, जो लखनऊ के कायस्थ घरों में बनाया जाने वाला एक विशिष्ट अवधी व्यंजन है।”

लखनऊ के लेखक हिमांशु बाजपेयी ने कहा कि “मैं शाकाहारी हूं, लेकिन जब लोकप्रिय व्यंजनों की सूची तैयार की जाती है, तो ‘मुंह में घुल जाने वाली’ बनावट के लिए विश्व प्रसिद्ध गलाउती कबाब का उसमें शामिल न होना आश्चर्य की बात है।”

लेखक हिमांशु बाजपेयी ने चुने गए व्यजनों की स्पष्टता की भी मांग की है। उनका कहना है कि “यदि उद्देश्य कम प्रसिद्ध व्यंजनों को बढ़ावा देना है, तो यह समझ में आता है। लेकिन यदि भोजन के चयन में कोई पक्षपात है, तो उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए।”

इस योजना का मकसद भले ही पारंपरिक खाने को बढ़ावा देना है, लेकिन सिर्फ शाकाहारी व्यंजनों तक सीमित रहना कहीं पक्षपात तो नहीं? क्योंकि आए दिन खबरों में आता है कि यूपी में धार्मिक पर्व पर नॉन वेज बेचने पर अक्सर रोक टोक नज़र आती है। यदि इसका जुड़ाव यहां से है तो भोजन को धर्म या पसंद के आधार पर नहीं बांटना चाहिए, क्योंकि यह भी कहीं न कहीं संस्कृति का हिस्सा है।

 

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