सोचिए, दर्द से कराहते हुए आप इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचें और वहां आपको बताया जाए कि “इस बीमारी का डॉक्टर यहां है ही नहीं।” मसौढ़ी के सरकारी अस्पताल की हकीकत कुछ ऐसी ही है, जहां हड्डी के इलाज के डॉक्टर ऑर्थोपेडिक (Orthopedic doctor ) नहीं है। हर दिन मरीज उम्मीद लेकर आते हैं, लेकिन मजबूरी और निराशा लेकर लौट जाते हैं।
रिपोर्ट – सुमन, लेखन – सुचित्रा
मसौढ़ी प्रखंड स्तर पर बने सरकारी अस्पताल में पिछले तीन साल से हड्डी (ऑर्थोपेडिक) डॉक्टर की कमी बनी हुई है। इस वजह से मरीजों को पटना के बड़े सरकारी अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है।
हड्डी के डॉक्टर न होने की वजह से मरीज परेशान
सुशीला देवी (50 वर्षीय) जो महमदपुर गांव की रहने वाली हैं और धनरूआ प्रखंड से आती हैं, बताती हैं कि वे अपनी बहू को दिखाने के लिए मसौढ़ी आई थीं। रास्ते में एक ऑटो चालक ने उन्हें टक्कर मार दी, जिससे वे गिर गईं और उन्हें गंभीर चोट लग गई।
चोट लगने के बाद वे इलाज के लिए अस्पताल पहुंचीं, जहां डॉक्टर ने उन्हें एक्स-रे कराने की सलाह दी। इस बात से सुशीला देवी चिंता में आ गई उन्होंने कहा “एक्स-रे तो करवा लेंगे, लेकिन अगर कोई गंभीर दिक्कत निकली तो हम कहां जाएंगे? यहां तो हड्डी का डॉक्टर ही नहीं है, जो ठीक से देख सके।”
सीमा देवी (35 वर्षीय) जो कराई पंचायत की रहने वाली हैं। वह बताती हैं कि वे अपनी ननद के साथ अस्पताल आई हैं और पहले भी 2–3 बार यहां आ चुकी हैं। उनके सिर के पास, कान के आसपास चोट लगी थी, जिसके कारण उन्हें लगातार दर्द बना हुआ है।
वे बताती हैं, “डॉक्टर हर बार एक्स-रे कराने को कहते हैं—कभी दाहिने कान की तरफ, कभी बाएं, तो कभी पीछे की तरफ। लेकिन अब तक यह साफ नहीं हो पाया कि असली समस्या कहां है।”
ओपीडी में भी हड्डी के डॉक्टर नहीं
सीमा ने बताया ओपीडी में जो भी डॉक्टर बैठते हैं, वही सभी मरीजों को देखते हैं, कोई विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं है। उन्होंने कहा “हमें यह भी नहीं पता कि जो डॉक्टर देख रहे हैं, वे हड्डी के हैं या नहीं। अगर इस बार भी सही इलाज नहीं मिला, तो हमें मजबूरी में प्राइवेट डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा, ताकि सही तरीके से पता चल सके कि समस्या कहां है।”
विकलाँगता का प्रमाण पत्र बनवाना मुश्किल
मसौढ़ी के निवासी पिंटू कुमार जोकि 30 साल के हैं। उन्होंने बताया कि 2 साल पहले उनके हाथ में लकवा मार गया, जिससे उनकी उंगलियां ठीक से काम नहीं करतीं। इसके इलाज के लिए वे कई बार अस्पताल गए, लेकिन हड्डी का डॉक्टर न होने की वजह से हर बार उन्हें वापस लौटना पड़ा। उन्हें दिव्यांग प्रमाण पत्र भी बनवाना था, जिसके लिए डॉक्टर की जांच जरूरी होती है। इसके लिए उन्हें एक दूसरे, पुराने अस्पताल जाना पड़ा, जहां केवल एक ही डॉक्टर उपलब्ध था। ज्यादा भीड़ होने के कारण वहां भी सही समय पर जांच नहीं हो पाई।
पिंटू कुमार कहते हैं, “एक सर्टिफिकेट बनवाने के लिए मुझे बार-बार चक्कर लगाने पड़े। करीब 6 महीने से 1 साल के बीच में कहीं जाकर मेरा दिव्यांग प्रमाण पत्र बन पाया।”
अन्य मरीजों का भी कहना है कि घुटनों और कमर दर्द जैसी समस्याओं के लिए उन्हें सिर्फ दवा देकर भेज दिया जाता है, लेकिन बीमारी की जड़ तक इलाज नहीं हो पाता।
डॉक्टरों की कमी की वजह से इलाज अधूरा
प्रखंड स्तर के अस्पताल ग्रामीण इलाकों के लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। यहां डिलीवरी से लेकर ऑपरेशन तक की सुविधाएं दी जाती हैं, लेकिन डॉक्टरों की कमी होने से यह व्यवस्था अधूरी रह जाती है।
दूसरे अस्पताल में करना पड़ता है रेफर
प्रबंधक नलिनी सिन्हा के अनुसार हर दिन लगभग 50 से 60 एक्स-रे किए जाते हैं। इनमें से 10 से 15 मरीज हड्डियों से जुड़ी समस्याओं के कारण आते हैं। कई मरीजों को सामान्य दवा देकर घर भेज दिया जाता है। गंभीर मामलों की बात करें तो महीने में लगभग 2 से 3 ऐसे मरीज सामने आते हैं, जिन्हें आगे के इलाज के लिए पटना के सरकारी अस्पताल में रेफर किया जाता है।
उन्होंने यह भी बताया कि अस्पताल में महिला रोग, आंख, दांत, आयुर्वेद, होम्योपैथी समेत कई सुविधाएं मौजूद हैं। ऑपरेशन, दवाइयां, बेड और साफ-सफाई की व्यवस्था भी है। लेकिन सबसे बड़ी कमी हड्डी के डॉक्टर की है।
पहले डॉक्टर मौजूद थे, तब ऐसी समस्या नहीं थी। अब किसी भी फ्रैक्चर या गंभीर चोट के मामले में मरीजों को पटना के गर्दनीबाग अस्पताल रेफर करना पड़ता है। उन्होंने कई बार विभाग को पत्र लिखकर डॉक्टर की नियुक्ति की मांग की है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
हाल ही में आई निरीक्षण टीम ने भी माना कि अस्पताल में हड्डी के डॉक्टर की कमी है। टीम ने आश्वासन दिया कि इस समस्या को आगे बढ़ाया जाएगा और जल्द समाधान की कोशिश की जाएगी। हालांकि कब तक डॉक्टर की नियुक्ति होगी, यह स्पष्ट नहीं है।
ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए प्रखंड अस्पताल ही सबसे बड़ा सहारा होता है। ऐसे में अगर वहां जरूरी डॉक्टर ही न हों, तो मरीजों को इलाज के लिए दूर-दूर भटकना पड़ता है। सवाल यह है कि तीन साल से चली आ रही इस समस्या का समाधान आखिर कब होगा और कब मरीजों को अपने ही इलाके में सही इलाज मिल पाएगा?
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