खबर लहरिया Hindi Chitrakoot News: बच्चों के रोने की समस्या कैसे हुई दूर? चित्रकूट के सरकारी अस्पताल ने ऐसा क्या किया? 

Chitrakoot News: बच्चों के रोने की समस्या कैसे हुई दूर? चित्रकूट के सरकारी अस्पताल ने ऐसा क्या किया? 

जहां कई अस्पतालों में आज भी बुनियादी सुविधाओं की कमी है, वहीं चित्रकूट का एक सरकारी अस्पताल ऐसी छोटी लेकिन अनोखी पहल की है जिसने माताओं की परेशानी काफी हद तक कम कर दी है। चित्रकूट के सोनेपुर स्थित सरकारी अस्पताल में बच्चों के लिए बनाई गई छोटी-सी खेल की जगह ने अस्पताल आने वाले बच्चों और उनके परिवारों का अनुभव बदल दिया है।

चित्रकूट के सोनेपुर स्थित सरकारी अस्पताल में बच्चों के लिए बनाई गई छोटी-सी खेल की जगह (फोटो साभार: नाज़नी)

बच्चे को लेकर माँ का संघर्ष 

एक मां के लिए बच्चे की देखभाल के साथ उसे समय पर इलाज और टीकाकरण के लिए अस्पताल ले जाना आसान नहीं होता। अस्पताल की भीड़ और इंतजार के बीच बच्चे अक्सर परेशान होकर रोने लगते हैं। ऐसे में मां के लिए बच्चे को संभालना और अपना इलाज या टीकाकरण कराना बड़ी चुनौती बन जाता है। 

सीएमएस कार्यालय के सामने परिवार परामर्श वार्ड के पास अस्पताल के फर्श पर बच्चों के खेलने के लिए गार्डन जैसी जगह तैयार की गई है। यहां बच्चों के लिए घोड़ा गाड़ी, छोटी गाड़ियां, फिसलने वाला झूला और खेलने की कई दूसरी चीजें रखी गई हैं। बच्चे यहां खेलते हैं और कुछ देर के लिए अस्पताल के माहौल को भूल जाते हैं। यह जगह डी एम पुलकित गर्ग के आदेश पर मार्च 2026 में बनाई गई है। 

बच्चों के इलाज और टीकाकरण के लिए अनोखी पहल 

अस्पताल में आने वाले कई बच्चे पहले डॉक्टर, दवा या टीके के नाम से ही रोने लगते थे। इससे उनके साथ आई माताओं को भी परेशानी होती थी। खासकर गर्भवती महिलाओं के लिए यह समस्या ज्यादा होती थी। बच्चे के लगातार रोने के कारण महिलाएं परेशान हो जाती थीं और कई बार बिना टीका लगवाए ही वापस लौट जाती थीं।

टीकाकरण में बढ़ोत्तरी 

परिवार परामर्श केंद्र की काउंसलर कल्पना खरे बताती हैं कि “बच्चों के लिए खेल की जगह बनने के बाद स्थिति में काफी बदलाव आया है। अब महिलाएं आराम से अपना टीकाकरण करा लेती हैं, जबकि बच्चे खेल में व्यस्त रहते हैं। इससे टीकाकरण कराने वाली महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है। पहले महिलाएं 55 से 60% आती थी लेकिन अब 70 से 75 परसेंट तक महिलाएं टीकाकरण के लिए आती हैं।”

छह महीने में बढ़ा लोगों का भरोसा

काउंसलर के मुताबिक, इस खेल की जगह को बने करीब छह महीने हुए हैं। शुरुआत में यहां वही बच्चे आते थे, जो टीकाकरण के लिए अस्पताल आने वाली महिलाओं के साथ आते थे। धीरे-धीरे लोगों को इस जगह के बारे में जानकारी हुई तो दूसरे मरीज भी अपने बच्चों को यहां खेलने के लिए लाने लगे।

अस्पताल में पर्चा बनवाने या दवा लेने के लिए लंबी लाइन लगती है। ऐसे में परिवार का एक सदस्य लाइन में रहता है और दूसरा बच्चे को खेल की जगह पर ले आता है। बच्चा खेल में इतना व्यस्त हो जाता है कि उसका रोना-धोना बंद हो जाता है और परिवार के लोगों को भी राहत मिलती है।

एक घंटे से खेल रहा है बच्चा, अब जाने को तैयार नहीं

अस्पताल में अपने परिजन का इलाज कराने आई सोनम ने कहा, “मैं करीब एक घंटे से यहां बच्चे के साथ हूँ। पहले अस्पताल आते ही ये (बच्चा) रोने लगता था, लेकिन यहां खेलने की चीजें देखकर वह खुश रहता है। यहां दूसरे बच्चों के साथ खेलने का मौका भी मिल जाता है।”

सोनम कहती हैं कि पहले उन्हें लगता था कि किसी तरह जल्दी से पर्चा कटे, दवा मिले और अस्पताल से निकल जाएं। बच्चे के रोने के कारण अस्पताल में बिताया समय और लंबा लगता था। अब पर्चा भी कट गया, दवा भी मिल गई और इलाज से जुड़ा काम भी पूरा हो गया, लेकिन बच्चा खेल की जगह से जाने को तैयार नहीं है।

टीका लगवाते समय बच्चों को संभालना हुआ आसान

बड़ी घाट से आई विमला भी इस बदलाव को महसूस कर रही हैं। वह बताती हैं कि पहले बच्चे को टीका लगवाने अस्पताल लाती थीं तो पहुंचते ही वह रोने लगता था। उसे चुप कराना मुश्किल हो जाता था। अब वह बच्चे को खेल की जगह पर छोड़कर आराम से टीका लगवा लेती हैं। टीकाकरण के बाद बच्चा खुद ही वहां से जाने को तैयार नहीं होता।

छोटी पहल, बड़ा असर

अस्पताल में बच्चों के लिए बनाई गई यह जगह भले ही छोटी है, लेकिन इसका असर बच्चों के साथ आने वाले परिवारों पर साफ दिखाई दे रहा है। इलाज और टीकाकरण के दौरान बच्चों को व्यस्त रखने से माताओं का तनाव कम हुआ है। बच्चों के लिए अस्पताल अब सिर्फ डॉक्टर, दवा और टीके की जगह नहीं रह गया है, बल्कि खेलने की जगह भी बन गया है।

अस्पताल का माहौल कई बच्चों को डराता है। डॉक्टर, इंजेक्शन, दवा और भीड़ उनके लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। ऐसे में खेल जैसी गतिविधियां उनका ध्यान डर और बेचैनी से हटाकर खुशी की ओर ले जाती हैं। सोनेपुर अस्पताल की यह छोटी-सी पहल बताती है कि बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखकर की गई साधारण व्यवस्था भी अस्पताल आने वाले परिवारों के अनुभव को काफी बेहतर बना सकती है।

 

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