अयोध्या, सावन का महीना शुरू होते ही रामनगरी अयोध्या में श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं। राम मंदिर में दर्शन के लिए लंबी कतारें लग रही हैं, जबकि प्रमुख मंदिरों, घाटों और धार्मिक स्थलों पर भी दिनभर चहल-पहल बनी हुई है।
रिपोर्ट व लेखन- गीता
अयोध्या में बढ़ती भीड़ सिर्फ धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में शहर की तस्वीर तेजी से बदली है। सड़क, रेलवे, हवाई सेवा, घाट, होटल और पर्यटकों से जुड़ी सुविधाओं के विस्तार ने अयोध्या को एक बड़े धार्मिक और पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित किया है।
छोटी धार्मिक नगरी से नए शहर तक का सफर
एक समय अयोध्या फैजाबाद जिले की छोटी नगर पंचायत के रूप में जानी जाती थी। लेकिन राम मंदिर के निर्माण और तेजी से हुए विकास के बाद अब अयोध्या एक नए और विकसित शहर के रूप में अपनी अलग पहचान बना रहा है। शहर की पहचान सरयू के शांत किनारे, मंदिरों की घंटियों, साधु-संतों की कुटियों और संकरी गलियों में बसी एक पुरानी धार्मिक नगरी के रूप में थी। सावन या किसी बड़े धार्मिक पर्व के दौरान ही यहां बड़ी भीड़ दिखाई देती थी।
राम मंदिर बनने के बाद अयोध्या में क्या बदलाव आया?
अब स्थिति काफी बदल चुकी है। अयोध्या धाम जंक्शन, महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा, रामपथ और भक्तिपथ जैसी परियोजनाओं ने शहर की तस्वीर बदल दी है। चौड़ी सड़कें, नई पार्किंग, होटल और अन्य सुविधाएं इस बदलाव को साफ तौर पर दिखाती हैं।
लेकिन अयोध्या का यह बदलाव केवल नई सड़कों और इमारतों तक सीमित नहीं है। शहर अब पर्यटन, रोजगार, कारोबार और शहरी अर्थव्यवस्था के नए केंद्र के रूप में भी अपनी पहचान बना रहा है।
‘पहले सावन में भीड़ होती थी, अब हर दिन रहती है’
सरयू घाट पर बैठे 80 वर्षीय उमाकांत अयोध्या के पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि एक समय अयोध्या बहुत शांत हुआ करती थी। जिस तरह की भीड़ केवल सावन में देखने को मिलती थी, आज उससे कहीं ज्यादा भीड़ लगभग हर दिन दिखाई देती है। उनके मुताबिक अयोध्या की पहचान अब देश-दुनिया में बन चुकी है।
दुकानदारों की बढ़ी कमाई
हनुमानगढ़ी में मिठाई और प्रसाद की दुकान चलाने वाले अनिल यादव बताते हैं कि पहले कारोबार को लेकर काफी सोच-विचार करना पड़ता था। रोज की कमाई कितनी होगी, इसका भरोसा नहीं रहता था पर अब स्थिति बदल गई है। स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाहर से आए कारोबारियों की संख्या भी बढ़ी है। ग्राहक बढ़े हैं और कारोबार का दायरा भी पहले से काफी बड़ा हो गया है।
सरयू किनारे बढ़ी भीड़, कम हुआ सुकून
गोरखपुर से अयोध्या आईं 55 वर्षीय सुमित्रा हर साल यहां आती हैं। वह कहती हैं “पहले सरयू के घाटों पर काफी शांति रहती थी। वह घंटों घाट पर बैठकर समय बिताती थीं और उन्हें यहां सुकून मिलता था। अब उन्हें अयोध्या में विकास और सुविधाएं तो ज्यादा दिखाई देती हैं, लेकिन भीड़ भी काफी बढ़ गई है। उनका कहना है कि कारोबार के लिए यह बदलाव अच्छा है, लेकिन पुरानी अयोध्या वाला सुकून अब कम हो गया है।
सावन में बढ़ जाती है रौनक
बिहार के मिथिला से आईं कुसुम पिछले तीन वर्षों से लगातार अयोध्या आ रही हैं। वह बताती हैं कि बिहार और अयोध्या के बीच धार्मिक और भावनात्मक जुड़ाव है। सावन में यहां की रौनक उन्हें खास तौर पर पसंद आती है।
वह कहती हैं “अब अयोध्या पहुंचना भी आसान हो गया है। लोग हवाई जहाज, ट्रेन या बस से आसानी से यहां पहुंच सकते हैं। हम कई दिनों तक रुककर मंदिरों और दूसरे धार्मिक स्थलों पर घूमने जाया करते हैं।”
कुसुम का कहना है कि राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है और अब इसकी पहचान देश-दुनिया में और मजबूत हुई है।
स्थानीय युवाओं को मिला रोजगार
राम दर्शन के लिए गाइड का काम करने वाले मनीष विश्वकर्मा बताते हैं कि पहले रोजगार के लिए उन्हें सूरत जाना पड़ा था। परिवार में सात लोगों का खर्च चलाना आसान नहीं था।
राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या में ही रोजगार के अवसर बढ़े तो उन्होंने वापस आकर गाइड का काम शुरू किया। वह बताते हैं कि सामान्य दिनों में उनकी रोजाना करीब 1,000 से 1,500 रुपये तक कमाई हो जाती है। कुछ समय पहले की घटनाओं के कारण कारोबार पर असर पड़ा था, लेकिन सावन शुरू होते ही श्रद्धालुओं की संख्या फिर बढ़ने लगी है। उनका कहना है कि सबसे बड़ी खुशी इस बात की है कि अब परिवार चलाने के लिए दूसरे शहर में जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
आस्था की वजह से मजबूत हुई अयोध्या की अर्थव्यवस्था
महाराष्ट्र के उडुपी से आए राघव उर्फ राघवेंद्र कहते हैं कि अयोध्या में देशभर से लोग आ रहे हैं। इसका सीधा असर होटल, होम-स्टे, परिवहन, फूल, प्रसाद, पूजा सामग्री, भोजनालय और छोटे कारोबार पर पड़ा है।
उनके मुताबिक अयोध्या में बड़ी संख्या में बाहरी लोग भी आकर कारोबार कर रहे हैं। होटल और अस्पताल जैसे बड़े कारोबार में बाहरी निवेशकों की मौजूदगी अधिक दिखाई देती है। वहीं शहर और आसपास के स्थानीय लोग भी होम-स्टे और छोटे कारोबार के जरिए कमाई के नए रास्ते तलाश रहे हैं।
इस तरह अयोध्या का विकास केवल इमारतों और सड़कों का विकास नहीं है, बल्कि इसके साथ एक नई ‘आस्था की अर्थव्यवस्था’ भी आकार ले रही है।
पुरानी अयोध्या कहां खो गई?
गीता रिपोर्टर अपना अनुभव साझा करते हुए बताती हैं कि वह 2012 से अयोध्या आती रही है। पहले फैजाबाद से अयोध्या पहुंचने के लिए संकरी सड़कों और गलियों से गुजरना पड़ता था। होटल और होम-स्टे बहुत कम थे। सरयू किनारे धर्मशालाओं में लोग ठहरते थे।
आज उसी जगह चौड़ी सड़कें, बड़ी पार्किंग, नए होटल और आधुनिक सुविधाएं दिखाई देती हैं। जिस जगह कभी धर्मशाला हुआ करती थी, वहां अब बड़ी पार्किंग नजर आती है। यह बदलाव अयोध्या के विकास की बड़ी तस्वीर पेश करता है, लेकिन इसके साथ एक सवाल भी खड़ा करता है कि क्या विकास के बीच पुरानी अयोध्या की पहचान भी बच पाएगी?
विकास के साथ विरासत बचाने की चुनौती
अयोध्या आज धार्मिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बन रही है। यहां श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या से कारोबार और रोजगार के अवसर बढ़े हैं। लेकिन इस विकास के साथ स्थानीय संस्कृति, पर्यावरण, पुरानी गलियों, घाटों और स्थानीय लोगों के जीवन को सुरक्षित रखना भी जरूरी है।
सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नई अयोध्या बनाते समय पुरानी अयोध्या पूरी तरह पीछे न छूट जाए। विकास ऐसा हो जिसमें स्थानीय लोगों को रोजगार और कारोबार का लाभ मिले, पर्यावरण सुरक्षित रहे और सदियों पुरानी धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान भी कायम रहे।
अयोध्या आज तेजी से बदल रही है। नई सड़कें, नई सुविधाएं और बढ़ती भीड़ इसकी नई पहचान हैं। लेकिन इस चमक के बीच यह देखना भी जरूरी होगा कि विकास की इस दौड़ में वह शांत, पुरानी और आध्यात्मिक अयोध्या कहीं सिर्फ नाम बनकर न रह जाए, जिसकी पहचान सरयू के शांत किनारे और मंदिरों की घंटियों से हुआ करती थी।
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