बिहार में इस बार बाढ़ ने कई जिलों को प्रभावित किया। इसकी वजह से कई नदियां उफान पर रही। हालाँकि अब पानी का स्तर घटने लगा है। इसके बावजूद कई परिवारों के लिए मुसीबत अभी बाकी है। पटना के पुनपुन इलाके में नदी का पानी बढ़ने से 5 कच्चे घरों की दीवारें और छप्पर गिर गए। जिन घरों में कभी चूल्हा जलता था, वहां अब मलबा और पानी है। घर टूटने के बाद कुछ परिवार पन्नी तानकर रहने को मजबूर हैं, तो कुछ खुले आसमान के नीचे खाना बना रहे हैं।
रिपोर्ट – सुमन, लेखन – सुचित्रा
पटना जिले के पुनपुन प्रखंड के चकिया पर गांव में भी बाढ़ और बारिश का असर दिखाई दे रहा है। यह गांव बारहवां पंचायत के अंतर्गत आता है। लगातार बारिश और पुनपुन नदी का जलस्तर बढ़ने के कारण नदी किनारे बसे परिवारों के कच्चे मकानों को नुकसान पहुंचा है। ग्रामीणों के मुताबिक, कई घरों की दीवारें गिर गईं और घर में रखा सामान भी पानी की वजह से खराब हो गया।
बिहार बाढ़ की स्थिति
बिहार में बाढ़ की स्थिति अभी भी गंभीर बनी हुई है। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार 13 सितंबर तक राज्य के 15 जिलों में करीब 48.35 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित थे। 87 प्रखंडों और 575 ग्राम पंचायतों में बाढ़ का असर दर्ज किया गया था। पटना के अलावा भोजपुर, सारण, वैशाली, भागलपुर, बेगूसराय, बक्सर, समस्तीपुर, मुंगेर, कटिहार, लखीसराय, खगड़िया, पूर्णिया, मधेपुरा और अररिया प्रभावित जिलों में शामिल हैं। हालांकि कई इलाकों में पानी धीरे-धीरे कम होने लगा है।
गंगा, कोसी, घाघरा और कुछ अन्य नदियों के कई स्थानों पर भी जलस्तर खतरे या चेतावनी स्तर से ऊपर दर्ज किया गया है।
बाढ़ के बीच प्रशासन की ओर से राहत और बचाव अभियान भी जारी है। 12 सितंबर तक राज्य में 1,245 सामुदायिक रसोई और 13 राहत शिविर चल रहे थे। प्रभावित इलाकों में नावों और SDRF-NDRF SDRF-NDRF (राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल –राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल) की टीमों की भी तैनाती की गई थी।
लेकिन कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां तक मदद नहीं पहुंच पाई है और लोग खुद से घरों की पन्नी के जरिये मरम्मत करने में लगे हुए हैं। पुनपुन नदी से सटे इस गांव में लोगों का जीवन अस्त व्यस्त हो चुका है।
दीवार गिरी तो बच्चों को लेकर बाहर भागी मीना देवी
चकिया पर गांव की रहने वाली मीना देवी बताती हैं कि पुनपुन नदी का पानी गांव में घुसने के बाद उनके मिट्टी के घर की दीवार अचानक गिर गई। यह घटना 6 और 7 सितंबर के बीच हुई थी। उस समय उनका बेटा, जिसका पैर टूटा हुआ है, घर के अंदर लेटा था। घर में बच्चों समेत परिवार के दूसरे लोग भी मौजूद थे।
दीवार गिरते ही परिवार के लोग घबराकर बाहर भागे। गनीमत रही कि किसी को गंभीर चोट नहीं आई। गांव के लोगों और स्थानीय समाजसेवी नवीन साहनी को जब घर गिरने की जानकारी मिली तो उन्होंने मौके पर पहुंचकर परिवार की स्थिति देखी और मदद की।
घर की दीवार गिरने के बाद मीना देवी के परिवार ने पन्नी के सहारे एक छोटी-सी झोपड़ी बना ली है। यही अब उनका अस्थायी घर है। गांव में उनके घर के अलावा करीब चार और घर भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं। इनमें साधु माझी और गुड़िया माझी के परिवार भी शामिल हैं। कुछ परिवारों की महिलाएं और बच्चे सुरक्षित रहने के लिए मायके चले गए हैं।
बिहार बाढ़: टूटे घर के बीच चूल्हा जलाने की कोशिश
इसी गांव में शांति देवी के घर की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। उनके बेटे कैलेंदर और दर्शनीय परिवार के साथ इसी मकान में रहते हैं। घर का एक हिस्सा टूट चुका है और आसपास पानी जमा है। परिवार मेहनत-मजदूरी करके अपना घर चलाता है। बाढ़ और बारिश के बीच भी वह और मीना देवी दूसरे लोगों के खेतों में घास निकालने का काम करने गई थीं। खेत से लौटने के बाद दोनों टूटे घर के पास चूल्हा जलाकर खाना बनाने की कोशिश कर रही थीं।
शांति देवी बताती हैं कि घर का छप्पर टूटने के बाद परिवार काफी डर गया था। घर को लेकर परिवार में विवाद भी हुआ और उनकी बहू बच्चों को लेकर मायके चली गई। उनका कहना है कि पानी कम होने के बाद ही वह वापस आएंगी।
पहले भी मिली थी घर गिरने पर मदद
गांव की टुल्लू देवी बताती हैं कि करीब आठ साल पहले भी उनके गांव में बाढ़ आई थी। उस समय भी उनके घर को नुकसान हुआ था और सरकार की ओर से उन्हें 7 हजार रुपये की सहायता मिली थी।
इस बार उनका घर फिर क्षतिग्रस्त हुआ है। वह बताती हैं कि उन्होंने मुखिया से मदद की बात कही तो उन्हें बताया गया कि घर क्षति की सूची तैयार की जा रही है। नए सिरे से जिन लोगों के घर क्षतिग्रस्त हुए हैं, उनके नाम सूची में शामिल किए जाएंगे और जांच के बाद सहायता दी जाएगी।
टुल्लू देवी बताती हैं कि उनके पति का काफी समय पहले निधन हो चुका है। वह खेतों में मजदूरी करके अपने बच्चों का पालन-पोषण करती हैं। तेज हवा और बारिश के दौरान उनके घर का छप्पर गिर गया। चूल्हा और घर में रखा कई सामान पानी में बह गया या खराब हो गया। घर के अंदर रहने की जगह नहीं बची तो उन्होंने बाहर एक मचाननुमा जगह बनाई। पानी कम होने के बाद वहीं खाना बनाया जाता है और रात भी उसी के सहारे गुजरती है।
वह कहती हैं कि घर गिरने के बाद सबसे बड़ी चिंता यह है कि इसे दोबारा कैसे बनाया जाए। परिवार में एक बेटा बीमार है, उसके इलाज और खाने का खर्च भी है। ऐसे में घर बनाना उनके लिए आसान नहीं है।
मीना देवी भी अपनी परेशानी बताते हुए कहती हैं कि घर में रखा मिट्टी का चूल्हा, दरवाजे और दूसरी जरूरी चीजें पानी की वजह से खराब हो गईं। उनका कहना है कि अगर उनका घर पक्का होता तो शायद इतनी परेशानी नहीं होती। वह चाहती हैं कि ऐसे गरीब परिवारों को पक्का मकान बनाने में सरकारी मदद मिले।
मुखिया ने कहा – जाँच के आधार पर होगी मुआवजे की प्रक्रिया
गांव के मुखिया मुकेश ने फोन पर बताया कि चकिया पर गांव में करीब पांच घर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं। आसपास के दूसरे गांवों में भी एक-दो घरों के गिरने की सूचना है। सभी प्रभावित घरों की सूची तैयार कर ब्लॉक में जमा कर दी गई है। अधिकारियों की टीम जांच के लिए आएगी और जांच के आधार पर मुआवजे की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
सर्वे के बाद 7 हजार रुपये की सहायता
पुनपुन के अंचल पदाधिकारी प्रभात रंजन ने बताया कि जिन गांवों में घर क्षतिग्रस्त हुए हैं, वहां सर्वे के लिए टीम गठित की गई है। टीम की रिपोर्ट के आधार पर जिन लोगों के घर पूरी तरह या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं, उन्हें 7 हजार रुपये की सहायता दी जाएगी। उन्होंने बताया कि पक्का मकान बनाने के लिए अलग से आवास योजना के तहत आवेदन की प्रक्रिया है। इसके लिए लोगों को ब्लॉक स्तर पर आवेदन करना होगा।
बिहार बाढ़ पर प्रशासन का फोकस
पुनपुन के बीडीओ उदय कुमार ने बताया कि घरों को हुए नुकसान का सर्वे अंचल स्तर से किया जा रहा है। प्रखंड प्रशासन की ओर से सर्वे में जरूरी सहयोग दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि फिलहाल प्राथमिकता बाढ़ से प्रभावित लोगों को राहत और सहायता पहुंचाना है। पुनपुन नदी का बांध नहीं टूटने से बड़ी तबाही टली है। आवास से जुड़े मामलों पर बाढ़ की स्थिति सामान्य होने के बाद आवेदन के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।
यदि आप हमको सपोर्ट करना चाहते है तो हमारी ग्रामीण नारीवादी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करें और हमारे प्रोडक्ट KL हटके का सब्सक्रिप्शन लें’


