खबर लहरिया जिला बांदा : गलाघोटू बीमारी से 3 बच्चों की मौत, स्वास्थ्य विभाग पर लापरवाही का आरोप, जानें क्या है बीमारी

बांदा : गलाघोटू बीमारी से 3 बच्चों की मौत, स्वास्थ्य विभाग पर लापरवाही का आरोप, जानें क्या है बीमारी

गलाघोटू बीमारी से बांदा जिले के त्रिवेणी गांव में 3 बच्चों की मौत हो चुकी है। गलाघोटू बीमारी की वजह कोराइन बैक्टीरियम डिप्थीरिया नामक जीवाणु होता है। यह संक्रमण बच्चों में एक-दूसरे की पेंसिल, लेखनी आदि वस्तुओं को मुंह में रख लेने से शरीर में प्रवेश करता है।

बांदा जिले के सदर तहसील के गांव त्रिवेणी में गलाघोटू बीमारी से 3 बच्चों की मौत होने की खबर सामने आई है। खबर लहरिया को गाँव की प्रधान पूर्वा के पति राम बहोरी ने फोन से बातचीत के दौरान बच्चों के मौत की संख्या के बारे में बताया। वहीं दो बच्चों के कानपुर अस्पताल में भर्ती होने की बात कही गयी।

खबर लहरिया को मिली ताज़ा जानकारी के अनुसार, एसडीएम रजत वर्मा द्वारा इस समय गांव में सफाई कर्मचारियों को भी तैनात किया गया है। वहीं आज वीरवार से एएनएम द्वारा 5 से 15 साल तक के बच्चों का टीकाकरण किया जा रहा है।

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गलाघोटू बीमारी से इस तरह हो रही मौत

इसके अलावा प्रधान पति ने हमें बताया कि पहले बच्चे को बुखार आता है और फिर गले में छाला पड़ने से बच्चों का दम घुटने लगता है जिससे उनकी मौत हो जाती है। अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गलाघोटू बीमारी पिछले दो हफ्ते से गाँव में पैर पसारे हुए है।

बस गोली दे रहें हैं – ग्रामीण

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                           गाँव में बच्चों के इलाज के लिए आई स्वास्थ्य विभाग की टीम

जब प्रधान पति से पूछा गया कि क्या गाँव में गलाघोटू बीमारी हेतु स्वास्थ्य विभाग की टीम आई है या नहीं। उनका कहना था कि टीम दो दिनों से गाँव में आई हुई है लेकिन उससे भी हालात में कुछ ख़ासा असर नहीं हुआ है।

कहते हैं, “गलाघोटू बीमारी का कोई इलाज थोड़ी है।” स्वास्थ्य विभाग की टीम बस बुखार है तो बुखार या दर्द की गोली दे रहें हैं। बस करने के लिए कर रहें हैं।

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स्वास्थ्य विभाग पर लापरवाही का आरोप

न्यूज़18 हिंदी की रिपोर्ट में गाँव वालों ने स्वास्थ्य विभाग पर आरोप लगाया है कि टीम इस मामले में लापरवाही कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार, गलाघोटू बीमारी की जानकारी बांदा स्वास्थ्य विभाग को दी गयी थी लेकिन जिला प्रशासन पूरे मामले में लापरवाह बना रहा। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जब पहले बच्चे की मौत हुई है तो स्वास्थ्य विभाग द्वारा बस खानापूर्ति करते हुए एक डॉक्टर की टीम गांव भेजी गयी थी। वह टीम सिर्फ गांव के बाहर ही खड़ी रहती थी। कहीं किसी बच्चे की जांच पड़ताल नहीं की गई।

क्या कहते हैं बांदा के अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी?

बांदा के अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजय कुमार ने बताया कि जैसे ही उन्हें जानकारी हुई कि त्रिवेणी गांव में एक बच्चे की मौत गलाघोटू की बीमारी से हुई है। उसके तुरंत बाद मौके पर डॉक्टरों की टीम भेजी गयी। गांव के सभी बच्चों को टीका लगाया जा रहा है। स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है। 3 बच्चों की मौत हुई है, लेकिन 2 बच्चों में लक्षण पाए गए हैं। जिला अस्पताल में उपचार कराने के बाद एक मृत बच्चे के परिजन को मेडिकल कॉलेज के लिए रेफ़र किया गया था, लेकिन उन्होंने प्राइवेट किसी जगह पर अपने बच्चे को दिखाया है।

गलाघोटू बीमारी के बारे में जानें

दैनिक जागरण की रिपोर्ट बताती है कि चिकित्सकों के अनुसार गलाघोटू यानी डिप्थीरिया उग्र संक्रामक रोग है, जो 2 साल से लेकर 10 साल तक की आयु के बच्चों को ज़्यादा होता है। हालांकि सभी आयु वालों को यह बीमारी हो सकती है। यह बीमारी गले में होती है। इससे टॉन्सिल भी संक्रमित हो जाते हैं। इस बीमारी से गला, नाक, आँख व बाहरी जननांग भी प्रभावित हो सकते हैं। इससे बुखार, अरुचि, सिर व शरीर में दर्द, गले में दर्द की दिक्कत होती है। इसका सबसे ज़्यादा असर हृदय पर पड़ता है। कुछ मामलों में इस बीमारी से हृदय के रुकने से लोगों की मौत भी हो जाती है।

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कैसे होती है गलाघोटू बीमारी

गलाघोटू बीमारी की वजह कोराइन बैक्टीरियम डिप्थीरिया नामक जीवाणु होता है। यह संक्रमण बच्चों में एक-दूसरे की पेंसिल, लेखनी आदि वस्तुओं को मुंह में रख लेने से शरीर में प्रवेश कर जाता है। इससे गले में झिल्ली बनने लगती है। यह बैक्टीरिया खांसी (cough) के ज़रिये से एक से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। यह शरीर पर खतरनाक असर डालता है। इससे हृदय की पेशियों में सूजन आ सकती है और गला भी खराब हो जाता है।

टीके के अभाव में फैलता है रोग

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट बताती है, गलाघोटू बीमारी मुख्य रूप से डीटीएपी के टीकाकरण की कमी प्रतिरक्षा प्रणाली नहीं लगवाने के चलते होती है। समय-समय पर टीकाकरण से रोग पर रोकथाम लग सकती है।

लोगों में बीमारी के टीके की जानकारी न होने की वजह से टीकाकरण नहीं हो पाता जिससे हमेशा ही बीमारी फैलने की संभावना बनी रहती है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग को सामने से आकर स्वयं प्रचार-प्रसार करने की ज़िम्मेदारी बनती है ताकि गलाघोटू बीमारी के फैलाव और इसे लेकर जानकारी के अभाव को कम किया जा सके।

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