रोज़गार की तलाश में शहरों में आए मजदूर अब मजबूरी में वापस अपने गांव लौट रहे हैं। कई लोगों के पास घर जाने तक के पैसे नहीं हैं—कोई पैदल निकल पड़ा है तो कोई जैसे-तैसे सफर कर रहा है। इस बीच गैस सिलेंडर की कमी ने हालात और खराब कर दिए हैं। दिल्ली के रेलवे स्टेशन और बस अड्डों पर लंबी लाइनें लग रही हैं—ये लाइनें सफर के लिए नहीं, बल्कि गैस के लिए हैं। सरकार का दावा है कि गैस की कोई कमी नहीं है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। छोटे दुकानदार और ठेले वाले, जो रोज़ कमाकर अपना घर चलाते हैं, अब गैस की जगह कोयले पर काम करने को मजबूर हैं। महंगाई बढ़ रही है, कमाई घट रही है… और सबसे कमजोर तबका एक बार फिर इस संकट की सबसे बड़ी कीमत चुका रहा है। क्या हर संकट में मजदूर ही सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।
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