खबर लहरिया Blog Bihar News: तपती धूप में प्याज को बीनने और छाटने में जुटी महिलाऐं, रोजगार का मिला अवसर

Bihar News: तपती धूप में प्याज को बीनने और छाटने में जुटी महिलाऐं, रोजगार का मिला अवसर

इस वक्त तपती गर्मी लोगों पर भारी पड़ रही है। तेज धूप और लू ने लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों में खेतों में महिलाएं काम करती नज़र आती हैं। बिहार की बात करें तो इस समय दिन का तापमान 38°C से 42°C के बीच है। वहीं कुछ जगहों पर 43–44°C तक भी पहुंच रहा है।

खेत में प्याज उखाड़ती महिलाऐं फोटो साभार: सुमन)

रिपोर्ट – सुमन, लेखन – सुचित्रा 

गर्मी में महिलाएं और बच्चे खेतों में प्याज उखाड़ने और बीनने में जुटे हैं। कोई मजदूरी के भरोसे काम कर रहा है, तो कोई खेतों में बचा हुआ प्याज इकट्ठा कर अपने घर का खर्च चलाने की कोशिश में है। दरअसल, यह खेती का व्यस्त समय है। कहीं गेहूं की कटाई चल रही है तो कहीं फसल को घर तक लाने का काम जारी है। इसी के साथ इस समय प्याज निकालने का काम भी तेज़ी से हो रहा है। पटना जिले के फुलवारी, पुनपुन और मसौढ़ी प्रखंड के कई गांव ऐसे हैं, जहां बड़े पैमाने पर प्याज की खेती की जाती है।

प्याज की खेती का समय

प्याज की फसल को लगाने का सही समय दिसंबर होता है, जबकि अप्रैल के पहले सप्ताह से इसकी खुदाई शुरू हो जाती है। यह फसल लगभग 90 दिनों में तैयार हो जाती है और इसे निकालने का काम करीब एक महीने तक चलता है, यानी अप्रैल की शुरुआत से लेकर मई तक।

महिलाओं के लिए रोजगार

प्याज की फसल जब तैयार हो जाती है तब महिलाओं के बीच खुशी का अलग ही मौहाल रहता है क्योंकि यही समय होता है जब उन्हें रोजगार मिलता है। प्याज को खेत से निकालने के काम में बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार मिलता है, जिससे उनकी आमदनी का एक अहम साधन बनता है।

महिलाओं को प्याज के खेतों से तीन तरह से रोजगार मिलता है।

पहला जो महिलाएं सीधे किसान के खेत में काम करती हैं, उन्हें मजदूरी के बदले 2–3 बोरा प्याज मिल जाता है। एक बोरा करीब 100 किलो का होता है, जिसमें से कुछ घर के लिए रखकर बाकी बाजार में बेच देती हैं, जिससे उन्हें पैसे भी मिलते हैं और कई महीनों तक प्याज खरीदना नहीं पड़ता।

एक बोरा करीब एक कुंतल (100 किलो) के बराबर होता है। महिलाएं बताती हैं कि वे इसमें से करीब 50 किलो घर के लिए रख लेती हैं, जबकि बाकी 150–200 किलो प्याज बाजार में बेच देती हैं। बाजार में प्याज का भाव करीब 20 रुपए प्रति किलो मिलता है। वे सारा प्याज एक साथ नहीं बेचतीं, बल्कि जरूरत के हिसाब से धीरे-धीरे बेचती हैं। इससे उन्हें करीब 4 महीने तक प्याज खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। खेत में मौजूद तराजू से ही पूरे बोरे की नाप-तौल करके उन्हें प्याज दिया जाता है।

बोर में रखे प्याज और तोलने के लिए रखी गई मशीन (फोटो साभार: सुमन)

दूसरा जो महिलाएं खेतों में बचा हुआ प्याज बीनने जाती हैं, वे रोज 5–10 किलो तक प्याज इकट्ठा कर लेती हैं। महीने भर में यह करीब 150–200 किलो हो जाता है। तीसरा जो महिलाएं मजदूरी करती हैं, उन्हें करीब 10,000 रुपए तक काम मिलता है, लेकिन कई बार उनका 2,000–4,000 रुपए तक पैसा बकाया रह जाता है। किसानों ने बताया कि मजदूरी यदि वह 100 रुपए प्रति क्यारी लेंगे तो उन्हें मजदूरी के रूप में प्याज नहीं मिलेगा या फिर 17 बोरे पर 1 बोरा प्याज। ज्यादातर महिलाएं प्याज लेना ही पसंद करती हैं।

शोभा देवी और क्रांति बताती हैं कि प्याज निकालने का काम जब दूसरे सप्ताह में शुरू हुआ, तब उनके गांव की करीब 15–20 महिलाएं हसनपुर पंचायत के बेटवा गांव के पास खेतों में काम करने गई थीं। हर साल इसी मौसम में वे यही काम करती हैं, क्योंकि यही उनके लिए रोजगार का समय होता है।

महिलाओं के अनुसार, उन्हें इस काम के लिए लगभग 100 रुपए प्रतिदिन मजदूरी तय हुई थी। वे सुबह 6 बजे से काम शुरू कर दोपहर 12 बजे तक काम करती थीं, फिर थोड़ा आराम करने के बाद दोपहर 3 बजे से शाम 7 बजे तक काम करती थीं। ये सभी ढ़ननाचक गांव के रहने वाले हैं। ज्यादातर महिलाएं मुसहर समुदाय से हैं, जो अपने परिवार के साथ यहां प्याज बीनने आई हैं।

प्याज को खेत में से निकालने के बाद प्याज में से मिट्टी हटाते हुए (फोटो साभार: सुमन)

नाम निभा देवी बताती हैं, उनके साथ उनकी छोटी बेटी भी है, जो प्याज ढूंढने में उनकी मदद कर रही है। जब तक खेत में प्याज के बोरे रखे होते हैं और मजदूर काम कर रहे होते हैं, तब तक उन्हें वहां जाने की अनुमति नहीं होती। लेकिन जैसे ही किसी हिस्से से बोरे हट जाते हैं, वे उस जगह पर बचा हुआ प्याज बीन लेती हैं। वह कहती हैं कि वह और उनकी बेटी मिलकर एक दिन में लगभग 10 किलो तक प्याज इकट्ठा कर घर ले जाते हैं।

उनका कहना है कि अगर अभी प्याज नहीं बीन पाए, तो आने वाले 3–4 महीनों तक उन्हें बाजार से खरीदना पड़ेगा। इसलिए हर साल वे इसी तरह खेतों में बचा हुआ प्याज इकट्ठा करते हैं, ताकि घर का खर्च कुछ हद तक कम हो सके।

तेज धूप में काम कर रहीं महिलाऐं

महिलाऐं बिना धूप की चिंता किए खेत में उतर जाती है। ऐसे में साड़ी का पल्लू उन्हें धूप से बचाता है। वे बार-बार साड़ी को सिर पर रखती हैं और इसी पल्लू से चेहरे पर आए पसीनें को पोछ लेती हैं।

कड़ी धूप में प्याज को इक्कठा करते हुए (फोटो साभार: सुमन)

महिला ने बताया कि आज इस काम को समेटने की उम्मीद है। वे कहती हैं कि जब मालिक के 17 बोरे प्याज तैयार हो जाते हैं, तब उन्हें मेहनताना के रूप में एक बोरा प्याज दिया जाता है। हालांकि यह भी तय नहीं होता कि चार दिनों में 17 बोरे पूरे हो ही जाएं—ऐसे में उन्हें और दिन काम करना पड़ सकता है। उनके अनुसार, एक बोरे में करीब 100 किलो प्याज होता है। अगर उन्हें एक बोरा मिल जाता है, तो यह उनके परिवार के लिए 4–6 महीने तक चल सकता है। हालांकि वे बताती हैं कि प्याज ज्यादा समय तक सुरक्षित नहीं रह पाता, इसलिए इसे लंबे समय तक स्टॉक करके रखना संभव नहीं होता।

खेत में काम करते हुए महिलाओं के हाथ भी इस बात का सबूत है कि वे कितनी मेहनत करती हैं। लगातार मेहनत के कारण वे काफी खुरदरे हो गए हैं। वह हंसिया से प्याज काटने का काम कर रही हैं।

प्याज के पत्तों को हसिया से अलग करती हुई (फोटो साभार: सुमन)

इस महिला का नाम मुनिया है और वह चिलबिल्ली गांव की रहने वाली हैं। मुनिया बताती हैं कि वह पिछले चार दिनों से लगातार काम कर रही हैं। अन्य महिलाओं की तरह वह भी अपने परिवार के साथ खेतों में आई हैं। उनके साथ उनकी बेटी है, जबकि बेटे मजदूरी के लिए बाहर गए हुए हैं।

खेती के साथ जिम्मेदारी भी – मुनिया

मुनिया कहती हैं कि खेती के काम के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियां भी बहुत होती हैं, जिन्हें संभालना आसान नहीं है। इसके बावजूद वह मेहनत करती हैं, क्योंकि इससे उनके घर का खर्च चलता है। वह बताती हैं कि अगर अच्छी तरह काम हो जाए तो 5–6 महीने के लिए प्याज मिल जाता है। साथ ही कुछ प्याज बेचकर रोजमर्रा के खर्च भी पूरे किए जाते हैं। उनके अनुसार, एक व्यक्ति की कमाई से घर नहीं चलता, इसलिए पति और बेटे बाहर मजदूरी करते हैं और वह खुद खेतों में काम कर परिवार का सहयोग करती हैं।

खेतों के मालिक शैलेंद्र कुमार, जो चिलबिल्ली गांव के वार्ड नंबर 13 के निवासी हैं, बताते हैं कि वे बचपन से ही प्याज की खेती से जुड़े हुए हैं। उन्होंने लगभग 10 साल की उम्र में अपने पिता के साथ इस खेती को करना सीखा था और अब खुद खेती संभाल रहे हैं। उनकी उम्र करीब 32 वर्ष है।

वे बताते हैं कि जिस खेत में अभी प्याज की खुदाई चल रही है, वह लगभग तीन बीघा का है। इसमें करीब 40–50 मजदूर काम कर रहे हैं और पिछले तीन दिनों से प्याज निकालने का काम जारी है। इसके अलावा, सड़क के उस पार उनकी करीब चार बीघा जमीन और है, जहां केवल प्याज की ही खेती की गई है।

शैलेंद्र कुमार के अनुसार, जिस खेत में अभी खुदाई हो रही है, उसमें लगभग 10 दिन पहले पानी लगाया गया था, ताकि प्याज को आसानी से निकाला जा सके। दूसरी तरफ वाले खेत में भी पानी दे दिया गया है और वहां करीब 10 दिन बाद खुदाई शुरू की जाएगी।

वे बताते हैं कि प्याज की खेती में उन्होंने लगभग 5 लाख तक खर्च किया है, क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में मजदूरों की जरूरत पड़ती है। मजदूरों को काम मिल जाता है और उनका काम भी समय पर पूरा हो जाता है। प्याज निकालने से लेकर उसे इकट्ठा करने, बाजार तक पहुंचाने और गोदाम में रखने तक का सारा काम मजदूर ही करते हैं।

महिलाऐं अपने घर का खर्चा चलाने के लिए कुछ न कुछ उपाय ढूंढ ही लेती है जहां भी उन्हें पैसा कमाने का मौका मिलता है वह करती हैं। चाहे इसके लिए उन्हें चिलचिलाती धूप में ही क्यों न मेहनत करना पड़े। महिलाऐं अपने घर के काम के साथ बाहर के काम में भी मुख्य भूमिका निभाती हैं।

 

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