खबर लहरिया Blog Bihar News: बिहार में डोम समुदाय की पारंपरिक बांस कला

Bihar News: बिहार में डोम समुदाय की पारंपरिक बांस कला

 

सदियों से बांस की खुशबू, हाथों की मेहनत और पारंपरिक हुनर को संजोए हुए डोम समुदाय अपनी कला और संस्कृति को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाता आया है। बांस से बनने वाले सूप, डलिया, पेटारी और डोला जैसे सामान सिर्फ रोज़मर्रा की जरूरत नहीं, बल्कि उनकी पहचान और जीवन का हिस्सा हैं। इसी परंपरा को निभाते हुए आज भी यह समुदाय अपने हाथों के हुनर से अपनी आजीविका चला रहा है। चलिए फोटो के माध्यम से इनकी कहनियों और हुनर के बारे में जानते हैं।

रंग बिरंगे बांस की पतली धारियों से बना डोला (फोटो साभार: सुमन)

रिपोर्ट – सुमन, लेखन – सुचित्रा 

बिहार के खगड़िया जिले के अलौली प्रखंड अंतर्गत रौन पंचायत के बथनाहा गांव में सड़क किनारे करीब 10 घरों की एक छोटी बस्ती है, जहां मलिक (डोम) समुदाय के लोग रहते हैं। इनका मुख्य काम बांस से बने सामान तैयार करना और लोगों को उपलब्ध कराना है।

अमरजीत मलिक कहते हैं कि “यह हमारा पुश्तैनी पेशा है,ये हमारे परदादाओं के समय से चला आ रहा है। हमें सालभर काम मिलता रहता है—लोग यहां ऑर्डर देकर जाते हैं और हम तैयार सामान घर-घर पहुंचा देते हैं।”

अमरजीत मलिक डोला बनाते हुए (फोटो साभार: सुमन)

वे अपने परिवार के साथ मिलकर बांस से डोला, पेटारी, सूप, गिनी, डाला, डलिया जैसे कई तरह के सामान बनाते हैं। यही काम उनके परिवार की आजीविका का मुख्य आधार है।

सड़क किनारे बसा गांव

नीचे दी गई तस्वीर में पटना में सड़क किनारे बसा बथनाहा गांव (ग्राम पंचायत रौन) दिखाई दे रहा है। यहां महिलाएं, पुरुष और बच्चे मिलकर बांस से डाला, पेटारी, सूप और डलिया जैसे सामान बना रहे हैं, जो शादी-ब्याह और छठ जैसे पर्वों में इस्तेमाल होते हैं।

बथनाहा गांव (ग्राम पंचायत रौन) फोटो साभार: सुमन

नीचे तस्वीर में एक बुजुर्ग व्यक्ति सड़क किनारे बैठे नजर आ रहे हैं। उनके हाथ में बांस का टुकड़ा है और वे सुबह से काम करने के कारण थके हुए दिख रहे हैं। पास में उनके बनाए कुछ बांस के सामान भी रखे हैं। इनका नाम कारी मलिक है, जो इसी गांव के निवासी हैं।

कारी मलिक (फोटो साभार: सुमन)

वे बताते हैं कि बांस उन्हें गांव से करीब 25 किलोमीटर दूर से लाना पड़ता है -कभी खगड़िया तो कभी अलौली से। उनका कहना है कि बांस हमेशा हरा और लचीला होना चाहिए, तभी उसे आसानी से काटकर अच्छा सामान बनाया जा सकता है।

बांस का पेड़ (फोटो साभार: विकिपीडिआ)

बांस से बना पेटारी (बर्तन)

नीचे तस्वीर में दादा बांस से एक टोकरी जैसा बर्तन बना रहे हैं, जिसे पेटारी कहा जाता है। यह खास तौर पर शादी के दौरान इस्तेमाल होती है और इस समय शादी का सीजन शुरू होने से इन्हें ऑर्डर भी मिलने लगे हैं।

दादा सड़क किनारे बिना चप्पल, एक छोटे लकड़ी के तख्ते पर बैठकर दिनभर काम करते हैं। लगातार मेहनत की वजह से उनके हाथ सख्त हो चुके हैं और पैरों की हालत भी खराब दिखती है, क्योंकि बांस को काटने और आकार देने में काफी मेहनत लगती है।

बांस की पट्टियों से बर्तन बनाने की कला

तस्वीर में एक महिला स्टील के उल्टे बर्तन को आधार बनाकर बांस की पट्टियों (फिकरी) को हाथ से सेट कर रही है। इसी प्रक्रिया से बड़ा पेटारी तैयार किया जाता है, जिसका ढक्कन भी इसी तरह बनाया जाता है।

एक परत तैयार करने में एक दिन और पूरे पेटारी (ढक्कन सहित) को बनाने में लगभग दो दिन लगते हैं।

बांस के बने सामान पर रंगाई का काम

इन टोकरियों को आकर्षक बनाने के लिए रंग बिरंगे रंगों से रंगा जाता है। इसमें आमतौर पर दो रंग लाल और हरा पानी में घोलकर ब्रश से लगाए जाते हैं।

यह पेटारी शादी के लिए बनाई जाती है। लड़की का परिवार मलिक (डोम) समुदाय से इसे बनवाता है, जिसमें लड़की के ससुराल जाते समय सामान रखकर विदाई दी जाती है। यह शादी का एक अहम हिस्सा होता है।

डोला बनाने की प्रक्रिया

इसकी शुरुआत सबसबे पहले बांस को छीलकर पतले हिस्से करने से होती है। नीचे तस्वीर में एक पुरुष हाथ में औजार लेकर बांस को चीरते हुए नजर आ रहे हैं। इनका नाम अमरजीत मलिक है। वे बताते हैं कि बांस को काटने और छांटने का काम पुरुष करते हैं, जबकि रंगाई और बुनाई का काम महिलाएं संभालती हैं। डोला बनाने के लिए बांस से लंबी पट्टियां निकाली जाती हैं, जिन्हें वे मार्या गोटक कहते हैं।

बाँस को चीरते हुए (फोटो साभार: सुमन)

एक डोला तैयार करने के लिए कई हिस्से बनाने पड़ते हैं, जैसे—

  • 15 जलेबी

इसे जलेबी कहा जाता है (फोटो साभार: सुमन)

  • 1 घिरनी

इसे घिरनी कहा जाता है (फोटो साभार: सुमन)

  • पालकी
  • मार्या गोयट

इसे मार्या गोयट कहा जाता है (फोटो साभार: सुमन)

  • सूरजमुखी

  • सुवा
  • तोता

इसे तोता कहा जाता है (फोटो साभार: सुमन)

इन सभी हिस्सों को जोड़कर एक पूरा डोला तैयार किया जाता है। बनने के बाद यह कुछ इस तरह का दिखता है।

रिक्शे में रखकर जिन्होंने इसे बनवाने का आर्डर दिया था उसके यहां पहुंचाने जाते हुए (फोटो साभार: सुमन)

इस डोल की कीमत कम से कम 2 हजार तक होती है लेकिन कई बार डोम समुदाय के कलकार को 1500 रुपए के साथ कुछ अनाज दे दिया जाता है।

 

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