एक समय था जब गांवों की जिंदगी साप्ताहिक बाजारों के इर्द-गिर्द चलती थी। हफ्ते में एक दिन तय होता था जब लोग एक जगह इकट्ठा होते थे। कोई सब्जी बेचने आता था तो कोई पशु खरीदने-बेचने। इन बाजारों का इंतजार पूरे हफ्ते किया जाता था क्योंकि यहीं से लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती थीं और यही उनके छोटे-छोटे कारोबार का सहारा भी था लेकिन समय के साथ ये परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है और कई जगहों पर तो ये बाजार लगभग खत्म ही हो गए हैं। फिर भी अगर बिहार के पटना जिले की बात करें तो यहां के कई प्रखंडों में आज भी साप्ताहिक पशु बाजार लगते हैं। यहां दूर-दूर से लोग अपने जानवर लेकर आते हैं और खरीद-फरोख्त करते हैं। ये बाजार आज भी गांव की पुरानी परंपरा और जीविका का अहम हिस्सा बने हुए हैं।
पशु बाजार के छोटे व्यापारी
इस पशु बाजार में खरीद-बिक्री करने वाले कई छोटे व्यापारी आज भी अपनी रोजी-रोटी इसी काम से चलाते हैं। ऐसे ही करीब 12 – 13 व्यापारी इस बाजार में अलग-अलग जगहों से जानवर खरीदकर दूसरी जगह बेचने का काम करते हैं। इनमें से एक हैं उमेश राय जो जहानाबाद जिले के धामपुर गांव के रहने वाले हैं। करीब 60 साल की उम्र पार कर चुके उमेश बताते हैं कि बचपन से ही वह देखते आ रहे हैं कि मसौढ़ी में हर शुक्रवार को यह बाजार लगता है।
जहां गाय-भैंस और उनके बछड़ों की खरीद-फरोख्त होती है। उनका कहना है कि जिसे जरूरत होती है वह यहां से जानवर खरीदता है और जिसे बेचना होता है वह यहां लाकर बेच देता है। उमेश खुद भी एक जगह से जानवर खरीदकर दूसरी जगह बेचने का काम करते हैं। वह बताते हैं कि पिछले महीने उन्होंने जहानाबाद के पास एक गांव से एक गाय खरीदी थी जो एक समय में करीब 8 लीटर दूध देती है। अब उन्हें पैसों की जरूरत है और यहां अच्छा दाम मिलने की उम्मीद है इसलिए वे उसे बेचने के लिए मसौढ़ी के इस बाजार में आए हैं।
खरीदारों की मेहनत
दीनानाथ बिन जो पटना जिले के नुसरतपुर गांव और धनरुआ ब्लॉक के रहने वाले हैं। वे इसी बाजार में पहुंचे थे ख़रीदारी करने। वे कई सालों से इसी बाजार से पशु की ख़रीदारी करते हैं। उन्होंने बताया कि वे भैंस खरीदने के लिए सुबह-सुबह ही अपने घर से निकल पड़े थे। इसके लिए वे करीब 4 बजे उठ कर बाजार के लिए रवाना हुए।
मसौढ़ी का यह पशु बाजार उनके गांव से करीब 15 – 20 किलोमीटर दूर है इसलिए जानवर को वापस ले जाने के लिए उन्हें पिकअप गाड़ी करनी पड़ती है जिसका किराया करीब 500 से 600 रुपये तक आता है। दीनानाथ बताते हैं कि यहां से जानवर खरीदने पर एक रसीद भी दी जाती है ताकि रास्ते में किसी तरह की परेशानी न हो। यही वजह है कि लोग भरोसे के साथ यहां आकर खरीदारी करते हैं।
मसौढ़ी के इस पशु बाजार में अलग-अलग कहानियां नजर आती हैं। धनरूआ ब्लॉक के चक्रमासी गांव के रहने वाले नीतीश कुमार जिनकी उम्र करीब 30 – 35 साल है। वे अपनी पाली हुई गाय बेचने के लिए यहां आए हैं। वे बताते हैं कि यह दूसरी या तीसरी बार है जब वे बाजार में बेचने आए हैं। अभी उन्हें पैसों की जरूरत है इसलिए अपनी गाय को लेकर पहुंचे हैं। उन्होंने 32 हजार रुपये कीमत रखी है। हालांकि दोपहर तक उन्हें मनचाहा दाम नहीं मिला। नीतीश कहते हैं कि जरूरत होने के बावजूद वे कम दाम में गाय नहीं बेचेंगे क्योंकि उन्होंने इसे खुद पाला है और यह अच्छी दूध देने वाली स्वस्थ गाय है।
वे इस बाजार पर भरोसा भी जताते हैं और कहते हैं कि यहां लेन-देन सुरक्षित रहता है अगर कोई खरीदार पैसे देने में देर करता है तो बाजार के संचालक किसी न किसी तरह भुगतान दिलवा देते हैं।
वहीं भदौरा गांव के फागो सिंह बताते हैं कि यह काम उनके परिवार में पीढ़ियों से चला आ रहा है। उनके पूर्वज भी जानवरों की खरीद-बिक्री करते थे। वे कहते हैं कि बाजार में जानवरों के लिए छांव, पानी और खड़े होने की अच्छी व्यवस्था है जिससे लोगों को सुविधा मिलती है। इस काम में उन्हें अच्छा मुनाफा भी हो जाता है। एक जानवर खरीदकर बेचने पर 5 से 10 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है।
इस्लाम बस्ती नादोल के पास से आए ओम प्रकाश अपनी गाय बेचने पहुंचे थे। उनकी गाय की कीमत 45 हजार रुपये थी। वे सुबह 9 बजे बाजार पहुंचे और उनकी गाय करीब 11 बजे ही बिक गई जिससे वे काफी खुश नजर आए।
ओम प्रकाश कहते हैं कि पहले के मुकाबले अब बाजार में रौनक कम हो गई है पहले यहां हर नस्ल के बड़े-बड़े जानवर आते थे लेकिन अब ज्यादातर गाय और भैंस ही दिखती हैं। वे यह भी बताते हैं कि कई लोग सिर्फ बाजार देखने भी आते हैं जिससे भीड़ ज्यादा नजर आती है। ओम प्रकाश आगे कहते हैं कि जिस गाय को उन्होंने बेचा उसे उन्होंने एक हफ्ते पहले ही खरीदा था और अच्छे दाम मिलने पर बेच दिया। बाजार में खड़ी ज्यादातर गाड़ियां पिकअप होती हैं जिनसे व्यापारी अपने-अपने गांव से जानवर लाते हैं और फिर बेचकर वापस जाते हैं। उनके मुताबिक यही इस बाजार की असली तस्वीर है जहां हर दिन किसी के लिए मुनाफा है तो किसी के लिए जरूरत पूरी करने का जरिया।
बाजार संभाल रहे मालिक ने क्या कहा?
इस बाजार का संचालन संभाल रहे मुकेश कुमार ने भी कुछ बातें कहीं। वे बताते हैं कि इसकी शुरुआत उनके दादा स्वर्गीय लक्ष्मण प्रसाद ने की थी। उस समय यह जगह एक बड़े मेले की तरह हुआ करती थी जहां दूर-दूर के गांवों से लोग अपने जानवर बेचने और खरीदने आते थे। अब आसपास पक्के घर बन गए हैं इसलिए बाजार थोड़ा सिमट गया है लेकिन पहले जब यहां से ट्रेन गुजरती थी तो लोग दूर से ही इस मेले की रौनक देख लेते थे। यह बाजार नगर निगम के अंतर्गत आता है और इसके रखरखाव के लिए वे हर साल करीब 9 हजार रुपये टैक्स भी देते हैं। साल 2010 में दादा के निधन के बाद से वे खुद ही इसकी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
वे बताते हैं कि करीब दो बीघा जमीन पर हर शुक्रवार को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक यह बाजार लगता है जहां न सिर्फ आसपास के प्रखंडों बल्कि दूसरे जिलों से भी लोग आते हैं। यहां जानवरों के लिए छांव और पानी की व्यवस्था की गई है ताकि लोगों को दिक्कत न हो। मुकेश के अनुसार गर्मियों में बाजार थोड़ा कमजोर रहता है जबकि बरसात के मौसम में यहां सबसे ज्यादा रौनक होती है। उस समय ज्यादा जानवर बिकने आते हैं और खरीदारों की भी भीड़ रहती है। क्योंकि वो किसान के लिए खेती का समय होता है।
बाजार में लेन-देन को सुरक्षित बनाने के लिए एक रसीद भी दी जाती है जिससे यह साबित होता है कि जानवर की खरीद-बिक्री उनकी निगरानी में हुई है। यह रसीद इसलिए जरूरी होती है ताकि अगर कोई जानवर लेकर दूसरे जिले जाता है तो उसे रास्ते में कोई परेशानी न हो। मुकेश साफ कहते हैं कि यह पूरी तरह प्राइवेट बाजार है जिसे उनके परिवार ने किसानों और व्यापारियों की जरूरत को देखते हुए शुरू किया था और आज भी यह परंपरा उसी तरह जारी है।
आज भी ये साप्ताहिक पशु बाजार गांव की एक पुरानी परंपरा के रूप में नजर आता हैं लेकिन बदलते समय के साथ इनकी तस्वीर भी बदल रही है। पहले जहां खेती-बाड़ी के लिए बैलों की सबसे ज्यादा जरूरत होती थी वहीं अब मशीनों ने उनकी जगह ले ली है। किसान अब ट्रैक्टर और दूसरे आधुनिक साधनों पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं जिसकी वजह से बैलों जैसे पशुओं की मांग लगातार कम होती जा रही है। एक समय था जब बैलों की बहुत कद्र होती थी लोग उनकी भरोसे के तौर पे कसम तक खाते थे लेकिन आज वही बैल बाजार में अपनी कीमत खोते नजर आते हैं।
इन बदलावों के बीच ये बाजार अब सिर्फ परंपरा का हिस्सा भर नहीं रह गया है अब ये लोगों की जरूरत और मजबूरी का भी आईना बन गए हैं। जहां कोई अपनी जरूरत के लिए जानवर बेचता है तो कोई अपने काम के लिए खरीदता है। बदलते दौर में भले ही इन बाजारों की रौनक कुछ कम हुई हो लेकिन ये अब भी गांव की अर्थव्यवस्था और जीवन का अहम हिस्सा बने हुए हैं।
यदि आप हमको सपोर्ट करना चाहते हैतो हमारी ग्रामीण नारीवादी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करें और हमारे प्रोडक्ट KL हटके का सब्सक्रिप्शन लें’






