केंद्र सरकार ने 1 जुलाई 2026 से मनरेगा खत्म कर उसकी जगह VB–G RAM G Act 2025 लागू करने का फैसला लिया है। सरकार इसे गांवों में रोजगार, विकास और स्किल ट्रेनिंग से जोड़कर बड़ा बदलाव बता रही है, लेकिन मजदूर संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को डर है कि इससे रोजगार की कानूनी गारंटी कमजोर हो सकती है।
अब तक देश में ग्रामीण रोजगार के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), 2005 लागू था। इसी कानून के तहत गांवों में लोगों को रोजगार की गारंटी दी जाती थी लेकिन अब केंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी कर कहा है कि मनरेगा कानून को 1 जुलाई 2026 से खत्म कर दिया जाएगा। इसकी जगह “विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन, ग्रामीण” यानी VB–G RAM G Act 2025 लागू होगा। सरकार के इस फैसले को ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। ऐसे में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि नए कानून में क्या बदलाव होंगे, गांवों में काम करने वाले मजदूरों और रोजगार व्यवस्था पर इसका कितना असर पड़ेगा और लोगों को पहले की तरह काम की गारंटी मिल पाएगी या नहीं।
सरकार का कहना है कि साल 2005 में शुरू हुआ मनरेगा उस समय गांवों में रोजगार देने की बड़ी जरूरत को पूरा करने के लिए लाया गया था। पर अब अब गांवों की जरूरतें बदल चुकी हैं। इसलिए सिर्फ रोजगार देने के बजाय अब काम को गांव के विकास, बेहतर सुविधाओं और लोगों के कौशल विकास से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार का मानना है कि इससे गांवों में लंबे समय तक फायदा पहुंचाने वाले काम बढ़ेंगे। सरकार इस नई योजना को “विकसित भारत 2047” के बड़े लक्ष्य का हिस्सा भी बता रही है।
नए कानून में क्या-क्या बदलेगा?
मनरेगा की जगह आने वाले VB–G RAM G Act 2025 में कई बड़े बदलाव किए गए हैं। जहां मनरेगा मुख्य रूप से गांवों में मजदूरी देकर रोजगार देने की योजना थी वहीं नई व्यवस्था को रोजगार के साथ गांव के विकास और लोगों की आजीविका सुधारने वाली योजना बताया जा रहा है। सरकार के मुताबिक अब सिर्फ मजदूरी देने पर नहीं गांवों में लंबे समय तक फायदा पहुंचाने वाले कामों पर भी जोर बताया जा रहा है।
नाम और योजना का तरीका बदला – पहले मनरेगा सिर्फ ग्रामीण रोजगार देने वाली योजना थी। अब VB–G RAM G Act 2025 को रोजगार के साथ गांव के विकास और आजीविका सुधार से जोड़कर पेश किया जा रहा है।
रोजगार के दिन बढ़ाए गए – मनरेगा में साल में 100 दिन काम की गारंटी थी। नई व्यवस्था में इसे बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है।
स्किल ट्रेनिंग पर जोर – नई योजना में सिर्फ मजदूरी नहीं अब लोगों को कौशल प्रशिक्षण (स्किल ट्रेनिंग) देने की बात भी कही गई है ताकि आगे बेहतर रोजगार के मौके मिल सकें।
काम का तरीका बदलेगा – अब सिर्फ मिट्टी खुदाई या सामान्य मजदूरी वाले काम नहीं होंगे। सरकार जल संरक्षण, खेती सुधार, ग्रामीण सड़क और गांवों के विकास से जुड़े कामों पर ज्यादा ध्यान देगी।
तकनीक से निगरानी होगी – GPS ट्रैकिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जरिए काम की निगरानी की जाएगी। सरकार का कहना है कि इससे फर्जी जॉब कार्ड और भ्रष्टाचार रोकने में मदद मिलेगी।
ग्राम पंचायतों को ज्यादा अधिकार – पंचायतों को अपने गांव की जरूरत के हिसाब से काम तय करने और योजनाएं बनाने में पहले से ज्यादा जिम्मेदारी दी जाएगी।
देखा जाए तो पिछले कुछ समय में मनरेगा से जुड़े कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां लोगों ने काम न मिलने, मजदूरी का भुगतान समय पर न होने और जॉब कार्ड नहीं बनने जैसी समस्याओं की शिकायत की है। कई जगहों पर लोगों ने यह आरोप भी लगाए हैं कि सरकारी योजना होने के बावजूद काम देने में भेदभाव किया जा रहा है। कुछ मामलों में जाति के आधार पर काम देने या लोगों को योजना का लाभ न मिलने जैसी बातें भी सामने आई हैं। ऐसे में नई व्यवस्था को लेकर ग्रामीण मजदूरों और लोगों के मन में कई सवाल और चिंताएं बनी हुई हैं।
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Bill 2025 Explained: मनरेगा खत्म, VB G Ram G योजना से बदलेगा ग्रामीण रोजगार या सिर्फ नाम?
अब मनरेगा (MGNREGA) की जगह नया VB-GRAMG कानून | क्या यह ग्रामीण रोज़गार पर डालेगा बड़ा असर?
वहीं दूसरी ओर नरेगा संघर्ष मोर्चा और लिबटेक की ओर से 8 मई को जारी एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि साल 2025-26 के दौरान मनरेगा की पहुंच और इसके तहत मिलने वाले काम में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। रिपोर्ट के मुताबिक पहले की तुलना में कम लोगों को काम मिल रहा है और योजना का असर भी कई इलाकों में घटता दिखाई दे रहा है।
वायर के रिपोर्ट के मुताबिक मनरेगा के तहत मिलने वाले रोजगार और मजदूरी से जुड़े कई अहम आंकड़ों में गिरावट की बात कही गई है। ‘वित्त वर्ष 2025-26 में मनरेगा के तहत घटता रोजगार और आय’ नाम की इस 14 पन्नों की रिपोर्ट में बताया गया है कि देशभर में मनरेगा के काम में कमी देखने को मिली है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल के मुकाबले इस बार मनरेगा के तहत पैदा होने वाले कुल मानव-दिवस (यानी लोगों को मिले काम के दिनों) में करीब 21.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
इंजीनियरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सामाजिक वैज्ञानिकों के समूह लिबटेक का कहना है कि 100 दिन का पूरा काम पाने वाले परिवारों की संख्या भी काफी कम हुई है। वित्त वर्ष 2024-25 में जहां करीब 37 लाख परिवारों ने 100 दिन का काम पूरा किया था वहीं 2025-26 में यह संख्या घटकर करीब 22 लाख रह गई। यानी इसमें लगभग 40 प्रतिशत से ज्यादा की कमी आई है। रिपोर्ट के मुताबिक कई राज्यों में मनरेगा के काम में बड़ी गिरावट देखने को मिली। तमिलनाडु में सबसे ज्यादा 42.8 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इसके अलावा हरियाणा में 41.7 प्रतिशत, हिमाचल प्रदेश में 41 प्रतिशत और तेलंगाना में 40.2 प्रतिशत गिरावट देखी गई। वायर के खबर अनुसार नरेगा संघर्ष मोर्चा और लिबटेक ने कहा है कि यह रिपोर्ट मनरेगा के आधिकारिक डेटा के आधार पर तैयार की गई है। उनके मुताबिक गिरावट सिर्फ एक-दो राज्यों तक सीमित नहीं है देश के कई हिस्सों में देखने को मिली है। अध्ययन में शामिल 20 बड़े राज्यों में से 15 राज्यों में काम के दिनों की संख्या कम पाई गई।
हालांकि किसी भी नई योजना की असली तस्वीर जमीन पर लागू होने के बाद ही साफ होती है। VB–G RAM G Act 2025 भी 1 जुलाई 2026 से पूरी तरह लागू होगा जिसके बाद ही पता चलेगा कि यह व्यवस्था गांवों और मजदूरों के लिए कितनी फायदेमंद साबित होती है। अगर लोगों को समय पर काम और मजदूरी मिली, गांवों में स्थायी विकास हुआ और रोजगार के मौके बढ़े, तो यह भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकता है।
लेकिन अगर काम कम मिला भुगतान में देरी हुई या रोजगार की कानूनी गारंटी कमजोर पड़ी, तो ग्रामीण मजदूरों में नाराजगी भी बढ़ सकती है। ऐसे में कहा जा सकता है कि करीब 20 साल पुरानी मनरेगा की जगह आने वाली यह नई योजना सिर्फ नाम बदलने भर का फैसला नहीं है यह भारत की ग्रामीण रोजगार व्यवस्था और विकास के नजरिए में बड़ा बदलाव मानी जा रही है।
आखिर कितना अलग है नया कानून?
अगर मनरेगा और VB–G RAM G Act 2025 की तुलना करें तो दोनों योजनाओं के बीच सबसे बड़ा फर्क “रोजगार के अधिकार” और “विकास आधारित योजना” के नजरिए में दिखाई देता है। मनरेगा एक कानूनी गारंटी वाला कानून था जिसमें ग्रामीण परिवारों को 100 दिन काम देने की जिम्मेदारी सरकार पर तय थी। काम नहीं मिलने पर बेरोजगारी भत्ता देने का भी प्रावधान था। यही वजह थी कि मनरेगा को गांवों के गरीब परिवारों के लिए सुरक्षा कवच माना जाता रहा।
वहीं नई व्यवस्था में सरकार रोजगार के साथ गांवों के विकास, कौशल प्रशिक्षण और तकनीक आधारित निगरानी की बात कर रही है। 125 दिन काम और स्किल ट्रेनिंग जैसी बातें योजना को पहले से बड़ा और आधुनिक दिखाती हैं। लेकिन सामाजिक संगठनों और मजदूर अधिकार कार्यकर्ताओं का सवाल है कि क्या नई योजना में पहले जैसी कानूनी जवाबदेही और काम मांगने का अधिकार उतना मजबूत रहेगा या नहीं।
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीण लोगों का मानना है कि नई व्यवस्था में सबसे बड़ी चिंता उन लोगों को लेकर है जो पढ़े-लिखे नहीं हैं, बुजुर्ग हैं, दिव्यांग हैं या पहले मनरेगा के तहत काम पाने के पात्र माने जाते थे। मनरेगा की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि गांव का कोई भी जरूरतमंद व्यक्ति बिना ज्यादा तकनीकी प्रक्रिया के मजदूरी वाला काम मांग सकता था और यह योजना गरीब परिवारों के लिए मुश्किल समय में सहारा बनती थी। लेकिन अब नई योजना में स्किल ट्रेनिंग, डिजिटल निगरानी, GPS ट्रैकिंग और तकनीक आधारित व्यवस्था पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि जो लोग तकनीक, प्रशिक्षण या नई प्रक्रियाओं के हिसाब से फिट नहीं बैठ पाएंगे, वे धीरे-धीरे योजना से बाहर हो सकते हैं। लोगों का कहना है कि सरकार को मनरेगा में मौजूद भ्रष्टाचार, मजदूरी भुगतान में देरी और काम की कमी जैसी समस्याओं को सुधारना चाहिए था, न कि पूरी योजना को नए नाम और नए ढांचे के साथ लागू करना चाहिए था। क्योंकि गांवों के गरीब मजदूरों के लिए सबसे जरूरी चीज योजना का नाम नहीं बल्कि जरूरत पड़ने पर आसानी से मिलने वाला भरोसेमंद रोजगार है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर नई योजना में पंचायतों को मजबूत भूमिका, समय पर भुगतान और पारदर्शिता सच में लागू हुई तो गांवों में स्थायी रोजगार और विकास दोनों को फायदा मिल सकता है। लेकिन अगर रोजगार गारंटी कमजोर हुई और योजना ज्यादा कागजी या तकनीक पर निर्भर बन गई, तो सबसे ज्यादा असर उन गरीब मजदूर परिवारों पर पड़ेगा जिनके लिए मनरेगा आज भी मुश्किल समय का सहारा है।
यानी आने वाले समय में असली सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि योजना का नाम क्या है, बल्कि यह होगा कि क्या गांव के मजदूर को जरूरत पड़ने पर सम्मानजनक और भरोसेमंद रोजगार मिल पा रहा है या नहीं।
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