उत्तर प्रदेश के महोबा ज़िले के बेलाताल में बसोर समुदाय के लोगों का आरोप है कि जॉब कार्ड होने के बावजूद उन्हें मनरेगा में काम नहीं मिलता और जाति के आधार पर भेदभाव किया जाता है। रोज़गार की कमी, समाज के दबाव और सीमित अवसरों के कारण कई परिवार पलायन करने और बच्चों की पढ़ाई छुड़ाने को मजबूर हैं। वहीं पंचायत और प्रशासन इन आरोपों से इनकार करते हुए दावा करते हैं कि काम मांगने वालों को काम दिया जाता है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकारी योजनाओं का लाभ सच में हर ज़रूरतमंद तक बराबरी से पहुंच पा रहा है?
रिपोर्ट – श्यामकली, रचना – लेखन – रचना
“यहां काम भी जाति देखकर बांटा जाता है। सरकार की तरफ से कोई योजना आती है तो उसका फायदा हमें नहीं मिलता क्योंकि हमें छोटी जाति का समझा जाता है।” अगर काम मिलता भी है तो अक्सर नाली साफ करने, झाड़ू लगाने या सफाई से जुड़े काम ही दिए जाते हैं। एक तो हम पहले से पिछड़ी जाति के हैं ऊपर से हमेशा ऐसे ही काम दिए जाते हैं तब लोग हमें और अछूत नजर से देखने लगते हैं।”
यह कोई कहानी, किस्सा या परदे पर दिखाया जाने वाला दृश्य नहीं है ये समाज के उस सच की तस्वीर है जिसे आज भी कई लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में जी रहे हैं। जहां मेहनत और हक की जगह अब भी जाति देखकर अवसर तय किए जाते हैं। जहां सरकारी योजनाएं कागजों पर सबके लिए बराबर दिखती हैं लेकिन जमीन पर उनका लाभ अक्सर कुछ लोगों तक पहुंचकर रुक जाता है। और जहां काम मिलने पर भी इंसान की पहचान उसके हुनर से नहीं उसकी जाति से जोड़ दी जाती है। ये बयान उत्तर प्रदेश के महोबा ज़िले के बेलाताल के निवासी ओम् का है।
भारत में जाति और काम का रिश्ता नया नहीं है। सदियों से यहां समाज को जातियों में बांटकर हर जाति के हिस्से में एक काम तय कर दिया गया। किसी को खेती, किसी को सेवा, किसी को सफाई और किसी को मेहनत-मजदूरी से जुड़े कामों तक सीमित कर दिया गया। यह व्यवस्था सिर्फ काम का बंटवारा नहीं थी ये लोगों को ऊंच-नीच में बांटने का तरीका भी बन गई। इसका सबसे बड़ा असर उन समुदायों पर पड़ा जिन्हें समाज ने सबसे नीचे रखा। उन समुदायों ने पीढ़ियों तक भेदभाव, शोषण और अपमान झेला और उनकी मेहनत के बावजूद उन्हें बराबरी का हक नहीं मिला।
देश में आजादी के बाद हालात बदलने की कोशिश हुई। संविधान में समानता का अधिकार दिया गया दलितों और आदिवासियों की सुरक्षा के लिए कानून बने हाथ से मैला ढोने जैसी अमानवीय प्रथाओं पर रोक लगी बंधुआ मजदूरी खत्म करने के लिए कानून बनाए गए और रोजगार में भेदभाव रोकने के लिए कई नीतियां लाई गईं। इसके बावजूद जाति और मजदूरी का पुराना रिश्ता पूरी तरह खत्म नहीं हो सका। आज भी कई दलित मजदूरों को कम मजदूरी, कम सम्मान वाले काम और रोजगार के कम अवसर मिलते हैं। योग्य होने के बावजूद उन्हें कई बार सिर्फ जाति की वजह से पीछे धकेल दिया जाता है।
जाति का असर अब सिर्फ निजी कामकाज तक सीमित नहीं रहा सरकारी योजनाएं भी इससे अछूती नजर नहीं आतीं। जिन योजनाओं को गरीबों मजदूरों और वंचित समुदायों को सहारा देने के लिए बनाया गया था अगर वहीं भेदभाव की दीवार खड़ी होने लगे तो सवाल सिर्फ समाज की सोच पर नहीं उठता है देश के व्यवस्था पर भी उठता है। उत्तर प्रदेश के महोबा ज़िले के बेलाताल से सामने आए आरोप कुछ ऐसी ही तस्वीर दिखाते हैं। यहां बसोर (अनुसूचित जाति) (डोमार) समुदाय के लोग रहते हैं जिनका कहना है कि मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, नया नाम विकसित भारत – रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन) के तहत काम देने के दौरान भी जाति देखी जाती है और नीचे कही जाने वाली जातियों के लोगों को काम पाने के लिए भटकना पड़ता है। आरोप यह भी हैं कि काम मांगने के बावजूद उन्हें नजरअंदाज किया जाता है जबकि दूसरे लोगों को आसानी से काम मिल जाता है। सोचिए जिस मनरेगा योजना का मकसद गांव के गरीब परिवारों को रोज़गार की गारंटी देना था अगर उसी योजना में जाति के आधार पर भेदभाव की शिकायतें सामने आएं तो यह सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं रह जाती।
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सरकार ने समय-समय पर मजदूरों की स्थिति सुधारने और मनरेगा की मजदूरी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। साल 2021-22 में मजदूर वेतन और मनरेगा की भुगतान व्यवस्था को लेकर नई पहलें भी की गईं ताकि मजदूरों को उनका हक समय पर और समान रूप से मिल सके। फिर भी सवाल आज भी कायम है क्या योजनाओं का लाभ हर जरूरतमंद तक बिना भेदभाव पहुंच पा रहा है?
कानून क्या कहता है?
कागज़ों पर मजदूरों, दलित समुदायों और वंचित वर्गों के अधिकारों को लेकर कानून साफ हैं। भारत का संविधान हर नागरिक को बराबरी और सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 14 – कानून की नजर में सभी बराबर हैं और सभी को समान संरक्षण का अधिकार है।
- अनुच्छेद 15 – धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान या किसी भी आधार पर भेदभाव करने पर रोक लगाता है।
- अनुच्छेद 17 – छुआछूत को पूरी तरह खत्म घोषित करता है और इसे कानूनन अपराध मानता है।
- मनरेगा कानून, 2005 – ग्रामीण परिवारों को साल में तय दिनों का मजदूरी वाला रोजगार मांगने का कानूनी अधिकार देता है। काम न मिलने की स्थिति में बेरोजगारी भत्ता देने का भी प्रावधान है।
कानून बराबरी की बात करता है लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बराबरी ज़मीन पर हर मजदूर तक सच में पहुंच पा रही है?
बसोर समुदाय की कहानी
डोमार या बसोर समुदाय का इतिहास भी संघर्ष, मेहनत और बदलते समय के साथ ढलने की कहानी कहता है। इस समुदाय की आबादी पूरे देश में फैली हुई है हालांकि इनकी सही संख्या बताना आसान नहीं है। इसकी एक वजह यह है कि अलग-अलग इलाकों में यह समुदाय अपनी जाति अलग-अलग नामों से दर्ज कराता है जिससे सरकारी आंकड़ों में स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाती। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों में भी डोमार या बसोर समुदाय के लोग रहते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या सबसे अधिक मानी जाती है खासकर बुंदेलखंड और आसपास के इलाकों में इनकी अच्छी-खासी मौजूदगी है।
माना जाता है कि बुंदेलखंड और बघेलखंड इस समुदाय की मूल धरती रहे हैं। करीब दो सौ साल पहले जब उत्तर भारत में अकाल और रोज़गार का संकट बढ़ा तब इस समुदाय के कई परिवार अपने गांव छोड़कर दूसरे इलाकों की ओर जाने लगे। बेहतर जीवन और काम की तलाश में वे उन जगहों पर पहुंचे जहां शहर बस रहे थे रेलवे लाइनें बिछ रही थीं और नए काम के अवसर बन रहे थे। जहां जैसा काम मिला लोगों ने वही काम अपनाया और धीरे-धीरे वहीं बसते चले गए।
शुरुआत में इस समुदाय का जीवन खेती-किसानी, बांस से सामान बनाना, दाई का काम करना, बैंड बजाना, से जुड़े काम जैसे पारंपरिक पेशों से जुड़ा था। समय के साथ हालात बदले और रोज़गार की मजबूरी में समुदाय के कुछ लोग सफाईकर्मी बने, कुछ मैला ढोने जैसे कठिन और अपमानजनक कामों में भी धकेल दिए गए।
सन् 1947 में देश आजाद होने के बाद इस समुदाय के भीतर एक नई सोच पैदा हुई। लोगों को यह समझ आने लगा कि जिन गंदे और अपमानजनक कामों से उन्हें जोड़ दिया गया वे उनकी असली पहचान या पुश्तैनी पेशा नहीं थे। यह मजबूरी और सामाजिक व्यवस्था का बोझ था जिसे बदलना जरूरी था। इसके बाद समुदाय के लोगों ने धीरे-धीरे इन कामों से बाहर निकलने और अपने बच्चों के लिए बेहतर जीवन और सम्मानजनक रोज़गार की राह तलाशने की कोशिश शुरू की।
समाज में गहरी जड़ें जमा चुका जातिगत भेदभाव अब सिर्फ सामाजिक व्यवहार तक सीमित नहीं रहा अब इसका असर मनरेगा जैसी सरकारी योजनाओं में भी महसूस किया जा रहा है।
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मनरेगा क्या है और इसके नियम क्या कहते हैं?
मनरेगा पर जाति का असर जानने से पहले ये जानते हैं मनरेगा के कुछ नियम। ग्रामीण इलाकों में बेरोज़गारी कम करने और लोगों को गांव में ही रोज़गार देने के मकसद से साल 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) लागू किया गया। इस योजना के तहत ग्रामीण परिवारों को साल में तय दिनों तक मजदूरी वाला काम देने का प्रावधान है ताकि लोगों को रोज़गार के लिए गांव छोड़कर पलायन न करना पड़े। योजना के तहत जॉब कार्ड बनवाने वाले परिवार काम की मांग कर सकते हैं और तय समय के भीतर काम देना पंचायत और प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। अगर समय पर काम नहीं मिलता तो बेरोज़गारी भत्ता देने का भी नियम है।
समय के साथ इस योजना में कई बदलाव किए गए। काम मांगने और हाजिरी दर्ज करने की प्रक्रिया को डिजिटल किया गया जॉब कार्ड को आधार और बैंक खाते से जोड़ने की व्यवस्था आई, ताकि मजदूरी सीधे खाते में पहुंचे और भुगतान में पारदर्शिता बढ़े।
वैसे अब मनरेगा का नाम बदल कर इसे ‘जी राम जी’ के नाम से जाना हैं। इस योजना में खेत समतलीकरण, मेड़बंदी, तालाब खुदाई, जल संरक्षण और गांव के सार्वजनिक काम जैसे कई तरह के रोजगार शामिल किए गए, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को काम मिल सके। कागज़ों पर यह योजना ग्रामीण मजदूरों के लिए बड़ा सहारा दिखती है लेकिन जब जॉब कार्ड होने के बावजूद लोगों को काम न मिले मजदूरी के लिए इंतज़ार करना पड़े या काम देने में भेदभाव के आरोप सामने आएं तो ये मनरेगा और सरकारी योजना पर फिर से सवाल उठता है। बेलाताल के बसोर समुदाय की कहानी इसी सवाल को सामने लाती है कि योजना का हक़ क्या सच में हर जरूरतमंद तक बराबरी से पहुंच रहा है?
इस जातिगत काम का असर अब मनरेगा पर भी
जाति के आधार पर होने वाला भेदभाव अब भी इस समुदाय का पीछा नहीं छोड़ रहा। अब यह जातिगत काम मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनिय) जैसे सरकारी योजना में भी देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश के महोबा ज़िले के बेलाताल में रहने वाले बसोर समुदाय के लोगों का कहना है कि जातिगत भेदभाव के कारण उन्हें मनरेगा में भी काम नहीं दिया जाता। लोगों ने बताया कि उनके जॉब कार्ड सालों पहले बन गए लेकिन आज तक उन कार्डों में काम की एक एंट्री तक नहीं हुई। कई जॉब कार्ड अब भी लगभग खाली पड़े हैं।
खबर लहरिया टीम ने इस बेलाताल में लम्बे समय से रहने वाले बसोर समुदाय के लोगों से बात की जिसमें कई नई चीजें सामने आई।
“हमारी पहुंच वहां तक नहीं, हमारी पहुंच तो जंगल तक है” यह कहते हुए महोबा ज़िले के बेलाताल के मलपुरा बस्ती निवासी बाल किशन अपनी जिंदगी की उस सच्चाई को सामने रखते हैं जो सरकारी योजनाओं और ज़मीनी हकीकत के बीच का फर्क साफ दिखाती है। बाल किशन बताते हैं कि उनके पास जॉब कार्ड तो है लेकिन उससे कोई फायदा मिला हो ऐसा उन्हें याद नहीं। उन्हें यह तक नहीं पता कि उनका जॉब कार्ड चालू है या बंद क्योंकि उससे कभी काम मिला ही नहीं। वे कहते हैं “हमारा जॉब कार्ड बने दस-बारह साल हो गए लेकिन इतने सालों में उसमें एक दिन का भी काम नहीं मिला। कार्ड बस कागज बनकर रह गया।”
उनका आरोप है कि मनरेगा में काम उन्हें मिलता है जिनकी पहचान होती है जिनकी पहुंच होती है। जो लोग सिस्टम तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं उनके लिए रास्ते खुल जाते हैं। बाल किशन कहते हैं “हमारी पहुंच वहां तक नहीं है। हमारी पहुंच तो जंगल तक है। हम और हमारा समुदाय जंगल से बांस लाते हैं उससे टोकरी बनाते हैं और उसे बेचकर घर चलाते हैं। उसी से किसी तरह जीवन कट रहा है।” उनकी बातों में सिर्फ शिकायत नहीं एक गहरी बेबसी भी झलकती है। वे कहते हैं “हम किससे शिकायत करें? चुनाव के समय लोग आते हैं हाथ जोड़ते हैं भरोसा देते हैं। उस समय हम भी गिड़गिड़ाकर कहते हैं कि हमारी मदद कीजिए हमारी सुनिए। चुनाव बीतते ही सब खत्म हो जाता है। फिर न कोई पूछने आता है न कोई बताने कि हमारे लिए कौन-सी योजना है क्या हक है और उसे कैसे लिया जाए।”
जब उनसे पूछा गया कि मनरेगा में काम के बदले तय मजदूरी मिलने की व्यवस्था के बारे में क्या जानते हैं तो वे कड़वी हकीकत बताते हैं। “हमें क्या पता काम के बदले कितना दाम मिलेगा। हमें तो कई बार काम करने के बाद भी मेहनताना नहीं मिलता। पैसे के लिए चक्कर लगवाए जाते हैं इंतजार कराया जाता है। हमारे समुदाय के लोग शादी-ब्याह में बैंड बजाने का काम भी करते हैं वह भी मजदूरी ही है। मैं भी शादी ब्याह में बैंड बजाने का काम करता हुं मेरी एक टीम है। वहां भी कई बार मेहनत के बाद पूरा पैसा नहीं मिलता। ऐसे में उम्मीद किससे करें?”
बाल किशन बताते हैं कि बेलाताल में उनके समुदाय के करीब पांच सौ लोग हैं लेकिन रोज़गार की कमी ने इस बस्ती को भी बिखेर दिया है। इनमें से सिर्फ सौ से डेढ़ सौ लोग ही गांव में रह गए हैं बाकी लोग काम की तलाश में बाहर चले गए। कोई कंपनी में मजदूरी कर रहा है कोई मिक्सर मशीन पर काम कर रहा है तो कोई ठेला लगाकर अपना घर चला रहा है। गांव छोड़ना उनकी पसंद नहीं मजबूरी है क्योंकि अपने ही इलाके में उन्हें मेहनत करने का मौका नहीं मिल रहा।
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“नाली का काम भी होना चाहिए सफाई भी होनी चाहिए लेकिन वह काम सभी जातियों के लोगों में बराबरी से बांटना चाहिए।”
महोबा जिले के बेलाताल के जैधपुर में रहने वाले ओम अपने समुदाय की हालत बताते हुए कहते हैं कि यहां उनके समुदाय के करीब डेढ़ से दो सौ लोग रहते हैं, लेकिन रोज़गार की कमी ने कई परिवारों को गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। कुछ लोग बाहर शहरों में जाकर मजदूरी कर रहे हैं क्योंकि गांव में पेट भरने लायक काम नहीं मिलता। वे कहते हैं “यहां न मजदूरी है, न रोजगार। घर चलाना है, परिवार पालना है, इसलिए लोग बाहर जाते हैं। मजबूरी इंसान से बहुत कुछ करवा देती है।” ओम बताते हैं कि उनके पास जॉब कार्ड तो है लेकिन वह सिर्फ एक कागज बनकर रह गया है। उसमें काम का कोई रिकॉर्ड नहीं क्योंकि उन्हें काम मिला ही नहीं। “जब से मनरेगा का नाम बदला है जिसे जी राम जी (विकसित भारत – रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन) कर दिया गया है उसमें साल में 125 दिन काम देने का प्रावधान है लेकिन हमें 25 दिन का काम भी नहीं मिला। हमारा जॉब कार्ड आज भी लगभग खाली पड़ा है उसमें एक लाइन तक नहीं भरी गई।” उनके मुताबिक गांव के प्रधान की जिम्मेदारी है कि लोगों को काम मिले लेकिन काम मांगो तो जवाब मिलता है काम निकलेगा तो कर लेना।
वे बताते हैं कि मनरेगा में काम पाने के लिए कई बार शिकायत भी की यहां तक कि जब जॉब कार्ड की KYC करवाई गई तब भी अपनी बात अधिकारियों तक पहुंचाई। जी राम जी का नया नियम यह कहता है कि काम के दिनों में उपस्थिति दर्ज होना जरूरी है चाहे वह एक दिन ही क्यों न हो लेकिन ओम कहते हैं “जब काम मिला ही नहीं तो हाजिरी कहां से लगेगी? इसी वजह से लोग मनरेगा से उम्मीद छोड़कर खेती-किसानी, दिहाड़ी मजदूरी या जो भी छोटा-मोटा काम मिल जाए उसी से जीवन चला रहे हैं।
ओम की बातों में सबसे बड़ा दर्द जातिगत भेदभाव को लेकर है। वे साफ कहते हैं “यहां काम भी जाति देखकर बांटा जाता है। सरकार की तरफ से कोई योजना आती है तो उसका फायदा हमें नहीं मिलता क्योंकि हमें छोटी जाति का समझा जाता है।” उनका कहना है कि अगर काम मिलता भी है तो अक्सर नाली साफ करने, झाड़ू लगाने या सफाई से जुड़े काम ही दिए जाते हैं। “एक तो हम पहले से पिछड़ी जाति के हैं ऊपर से हमेशा ऐसे ही काम दिए जाते हैं तब लोग हमें और अछूत नजर से देखने लगते हैं।” वे यह भी कहते हैं कि सफाई का काम छोटा नहीं है यह जरूरी काम है और समाज के लिए अहम भी। लेकिन सवाल यह है कि अगर यह काम जरूरी है तो सिर्फ एक ही जाति के हिस्से क्यों आता है? “नाली का काम भी होना चाहिए सफाई भी होनी चाहिए, लेकिन वह काम सभी जातियों के लोगों में बराबरी से बांटना चाहिए।
सरकारी काम में भी सबको हर तरह का काम मिले तभी भेदभाव खत्म होगा।” वे याद करते हैं कि कई बार उनके समुदाय के लोगों को सिर्फ ऐसे ही काम दिए गए जिसके विरोध में एक बार लोगों ने मिलकर वह काम छोड़ दिया था। “सफाई करना गलत नहीं है। जैसे हम अपने घर की सफाई करते हैं वैसे बाहर की भी कर सकते हैं। फर्क बस इतना है कि काम सम्मान से मिले बराबरी से मिले और जाति देखकर न बांटा जाए।”
जॉब कार्ड हटने के बढ़ते आंकड़े भी खड़े करते हैं सवाल
मनरेगा को गांव के गरीब और मजदूर परिवारों के लिए रोज़गार की गारंटी देने वाली योजना माना जाता है लेकिन हाल के आंकड़े इस योजना की पहुंच और पात्र लोगों के शामिल रहने पर नए सवाल खड़े करते हैं। 9 दिसंबर 2025 को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लोकसभा में जानकारी देते हुए बताया कि साल 2019-20 से 2024-25 के बीच देशभर में 4.57 करोड़ मनरेगा जॉब कार्ड हटाए गए जबकि इसी अवधि में 6.54 करोड़ नए जॉब कार्ड जोड़े गए। मंत्री ने कहा कि जॉब कार्ड हटाना एक नियमित प्रक्रिया है जिसके पीछे फर्जी पंजीकरण, दोहरा नाम, स्थायी पलायन, गलत जानकारी या कार्डधारक की मृत्यु जैसी वजहें हो सकती हैं।
लेकिन सवाल यह है कि इस प्रक्रिया में कहीं ऐसे परिवार तो बाहर नहीं हो रहे जो सच में काम के हकदार हैं और जिन्हें इस योजना की सबसे ज्यादा जरूरत है। उत्तर प्रदेश में इसी अवधि के दौरान 91 लाख से ज्यादा जॉब कार्ड हटाए गए जो देश में सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में शामिल है। ऐसे में जब बेलाताल जैसे गांवों में लोग कहते हैं कि उनके पास जॉब कार्ड तो है लेकिन उसमें काम की एक भी एंट्री नहीं हुई या कई लोगों को योजना का लाभ नहीं मिला तो यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या मनरेगा अपने असली लाभार्थियों तक बराबरी से पहुंच पा रही है या फिर प्रक्रियाओं और व्यवस्था के बीच कहीं मजदूर छूटते जा रहे हैं?
“रोज़गार की कमी का सबसे बड़ा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है”
जाति का असर केवल रोज़गार तक सीमित नहीं रहता यह लोगों की पढ़ाई, पहचान और आगे बढ़ने के अवसरों को भी गहराई से प्रभावित करता है। समाज में बनी ऊंच-नीच की सोच के चलते कई समुदायों को अच्छी शिक्षा और सम्मानजनक काम के बराबर मौके नहीं मिल पाते। इसका असर सिर्फ उनके जीवन पर नहीं पड़ता देश भी इसकी कीमत चुकाता है क्योंकि जब मेहनती और काबिल लोगों को उनकी योग्यता के मुताबिक अवसर नहीं मिलते तो उनकी क्षमता दब जाती है और विकास की रफ्तार भी धीमी पड़ जाती है।
वे अपना दर्द बताते हुए कहती हैं “जब मेरी शादी हुई थी तभी मेरा जॉब कार्ड बना था आज पांच साल हो गए लेकिन इतने सालों में एक दिन का भी काम नहीं मिला।” यह सिर्फ एक महिला की शिकायत नहीं है उस बस्ती में लगभग सभी महिलाओं की शिकायत यही है कि जॉब कार्ड है मगर काम नहीं।
रामकुमारी बताती हैं कि रोज़गार की कमी का सबसे बड़ा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है। काम की तलाश में परिवार को कभी गांव तो कभी शहर भटकना पड़ता है और इस सफर में बच्चे भी साथ होते हैं। वे कहती हैं “जब रहने की कोई तय जगह ही नहीं होती तो बच्चों का स्कूल में दाखिला कैसे कराएं? वे पढ़ ही नहीं पाते।” यही वजह है कि उनके चार बच्चों में सिर्फ एक ही पढ़ पाया बाकी बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट गई। खासकर लड़कियों की शिक्षा सबसे पहले पीछे छूट जाती है।
इसी बस्ती की एक 15 साल की लड़की जिसने नाम न बताने की शर्त पर अपनी बात रखी उसकी कहानी इस दर्द को और गहरा कर देती है। “मेरा मन पढ़ने का है। मैं आर्मी में जाना चाहती हूं लेकिन घर की हालत ऐसी नहीं कि पढ़ाई कर सकूं।” वह बताती है कि स्कूल में उसके साथ भेदभाव भी हुआ जिससे पढ़ाई में मन टूटता गया। किताबें खरीदने के पैसे नहीं थे सहारा देने वाला माहौल नहीं था और आखिरकार उसकी पढ़ाई सातवीं के बाद रुक गई। अब वह घर के कामों में हाथ बंटाती है।
गरीबी, पलायन और भेदभाव मिलकर एक ऐसा चक्र बना देते हैं जिसमें अगली पीढ़ी भी उसी संघर्ष में फंस जाती है जहां से निकलने का रास्ता शिक्षा हो सकती थी।
“दूसरे शहरों में काम करने जाते हैं तो वहां कोई जाति नहीं पूछता”
बेलाताल की रहने वाली कुसुम बाई कहती हैं “हमारे पास जॉब कार्ड तो है लेकिन उससे कभी काम नहीं मिला। अब डलिया (बांस की टोकरी) बनाकर जो थोड़ा-बहुत पैसा मिलता है उसी से घर चलाएं या बच्चों की पढ़ाई कराएं समझ नहीं आता क्या करें।” वे बताती हैं कि उनके मोहल्ले में न सफाई की व्यवस्था है न नालियों की और न ही पानी की सुविधा। उनका कहना है कि जरूरत पड़ने पर प्रधान से शिकायत की जाती है फिर भी उनके मोहल्ले तक कोई मदद नहीं पहुंचती। उनके मोहल्ले में कोई आना नहीं चाहता।
घर चलाने के लिए कुसुम बाई पचास किलो तक की रेत की बोरी सिर पर उठाकर मजदूरी करती हैं। “जहां जो काम मिल जाए वही कर लेते हैं क्योंकि पेट पालना जरूरी है।” उनका दर्द यह भी है कि गांव में कई बार जाति के कारण काम नहीं दिया जाता।
वे बताती हैं “जब निजी काम के लिए पूछते हैं जैसे किसी बर्तन या कपड़ों की दुकान में काम करने के लिए पूछा जाता है तो कहा जाता है ‘तुम बसोर हो’’ और अगर किसी चीज़ का दुकान खोल भी लें तो एक भी ग्राहक नहीं आते हैं इसी वजह से काम की तलाश में बाहर जाना पड़ता है।” कुसुम बाई कहती हैं कि दूसरे शहरों में काम करने जाते हैं तो वहां कोई जाति नहीं पूछता क्योंकि वहां मजदूर की जरूरत होती है जाति की नहीं। यही फर्क उन्हें सबसे ज्यादा चुभता है अपने ही गांव में पहचान जाति से होती है मेहनत से नहीं।
बेलाताल की रहने वाली अनिता बताती हैं कि उनका परिवार लंबे समय से रोज़गार की कमी से जूझ रहा है। वे अपने जेठ के घर में रहती हैं क्योंकि परिवार की आर्थिक हालत ऐसी नहीं कि सभी का गुज़ारा आसानी से हो सके। वे बताती हैं कि उनका परिवार डलिया बनाकर किसी तरह घर चला रहा है, उनके दो छोटे बच्चे भी हैं। इसी काम से जो थोड़ी-बहुत कमाई होती है उसी से रोज़मर्रा की जरूरतें पूरी होती हैं। हालांकि अनिता को जीआईसी पार्क में देखरेख का काम मिला है लेकिन यह जॉब कार्ड या मनरेगा के तहत नहीं बल्कि अलग काम है जिसमें उन्हें छह हजार रुपये महीने मिलते हैं। उनका कहना है कि यह काम प्रधान की मदद से मिला जिससे घर चलाने में कुछ सहारा मिला है।
जातिगत मज़दूरी में समाज का रुख़
बसोर समुदाय के लोगों से बातचीत में एक अहम बात सामने आई। एक तरफ़ गांव में पहले से ही काम की कमी है और मनरेगा में भी नियमित काम नहीं मिल पा रहा है जिससे लोगों के सामने रोज़गार का संकट बना हुआ है। वहीं दूसरी तरफ़ जब पेट पालने के लिए लोग झाड़ू लगाने नाली साफ़ करने या सफाई से जुड़े दूसरे काम करने के बारे में सोचते हैं तो समाज के अपने नियम उनके रास्ते में खड़े हो जाते हैं।
बसोर समाज में इस तरह के काम को लेकर एक सख़्त सामाजिक नियम बना हुआ है। अगर कोई व्यक्ति झाड़ू लगाने या नाली साफ़ करने जैसा काम करता है तो उसे समाज से बाहर करने की बात कही जाती है या फिर समाज को जुर्माने के तौर पर पैसा देना पड़ता है। समाज के बहिष्कार का डर इतना गहरा है कि लोग मजबूरी में भी इस तरह का काम करने से पीछे हट जाते हैं। लोग इस नियम को मानते हैं क्योंकि समाज से कट जाना गांव में अकेले पड़ जाने जैसा है।
ऐसे में बसोर समुदाय के लोग दोहरी मार झेल रहे हैं। एक ओर मनरेगा में काम नहीं मिलने से रोज़गार के मौके सीमित हैं दूसरी ओर समाज के नियम उन्हें दूसरे छोटे-मोटे काम अपनाने से रोक देते हैं। नतीजा ये है कि कई लोगों को रोज़गार की तलाश में गांव छोड़कर बाहर जाना पड़ रहा है। जब काम के मौके कम हों और समाज भी कुछ कामों पर रोक लगा दे, तो फिर लोग अपने परिवार का गुज़ारा कैसे करें?
जब मेहनत एक है तो मज़दूरी में फर्क क्यों? यह सवाल आज भी हमारे समाज के सामने खड़ा है। संविधान ने भले ही सबको बराबरी का अधिकार दिया हो लेकिन ज़मीन पर सच्चाई यह है कि आज भी कई जगहों पर मज़दूरी तय करते समय इंसान की मेहनत नहीं उसकी जाति देखी जाती है। खासकर दलित और छोटी कही जाने वाली जातियों के लोगों को आज भी काम पाने, बराबर मजदूरी लेने और सम्मान के साथ काम करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
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समाज और रोजगार के बीच पिसते बसोर समाज के लोग
बेलाताल की सुखदेवी कहती हैं कि वे सत्तर-अस्सी साल से जैतपुर में रह रही हैं उनके परिवार और पुरखे भी यहीं रहते आए हैं। वे मनरेगा में काम करना चाहती हैं ताकि घर का खर्च कुछ संभल सके लेकिन आज तक उन्हें उसमें काम नहीं मिला।
उनकी मुश्किल सिर्फ इतनी नहीं है कि काम नहीं मिलता परेशानी यह भी है कि जो काम दिया जाता है वह उनके समाज के नियमों से टकराता है। सुखदेवी बताती हैं “प्रधान हमें झाड़ू लगाने या सफाई का काम देते हैं लेकिन हमारे समाज में यह काम नहीं किया जाता। जो करेगा उस पर जुर्माना लगाया जाता है यहां तक कि समाज से बाहर भी कर दिया जाता है।” “हमारे यहां तो यह तक कहा जाता है कि जो झाड़ू का काम करेगा उसकी बेटी की शादी तक मुश्किल हो जाएगी।”
यही इस समुदाय की सबसे बड़ी विडंबना है एक तरफ रोजगार नहीं दूसरी तरफ समाज के अपने बंधन भी हैं। काम चाहिए तो ऐसा काम मिलता है जिसे करने पर समाज सवाल खड़ा करता है और समाज की बात मानें तो घर चलाने का रास्ता बंद हो जाता है। न व्यवस्था साथ दे रही है न परंपराएं ढीली पड़ रही हैं बीच में पिस रहा है सिर्फ मजदूर। ऐसे में परिवार सिर्फ सरकारी पेंशन या छोटे-मोटे कामों के सहारे चलता है।
सुखदेवी की आख़िरी बात इस पूरे दर्द को एक लाइन में कह देती है “सब कहते हैं छुआछूत खत्म हो गया लेकिन ऐसा नहीं है। आज भी जात-पात देखी जाती है फर्क किया जाता है।” यह बताता है कि समाज पूरी तरह नहीं टूटा जातिगत सोच भी नहीं टूटी है और अगर कोई टूट रहा है तो सिर्फ मज़दूर जो दोनों तरफ़ से दबाव झेलते हुए भी किसी तरह जिंदगी ढो रहा है।
रोज़गार की तलाश में पलायन और वहां भी वही स्थिति
हर साल 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस मनाया जाता है। यह दिन उन मेहनतकश लोगों के संघर्ष, उनके अधिकारों और सम्मानजनक जीवन की मांग को याद करने का दिन है। खेतों में अन्न उगाने से लेकर इमारतें खड़ी करने तक, सड़क बनाने से लेकर फैक्ट्रियों की मशीनें चलाने तक देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा मजदूरों के कंधों पर टिका है। मजदूर दिवस यह याद दिलाता है कि मेहनत करने वाले हर हाथ को बराबरी का हक़ सम्मानजनक मजदूरी, सुरक्षित कामकाजी माहौल और भेदभाव से मुक्त अवसर मिलना चाहिए।
लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इससे अलग तस्वीर दिखाती है। यही वे मज़दूर हैं जो गांव में काम न मिलने पर रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर जाते हैं इस उम्मीद में कि वहां मेहनत का सही दाम मिलेगा। लेकिन शहरों में भी उनकी हालत बहुत अलग नहीं होती। कई बार काम कराने के बाद भी मेहनताना समय पर नहीं मिलता अपने हक के लिए उन्हें सड़क पर उतरकर आवाज़ उठानी पड़ती है। हाल ही में नोएडा में मजदूरों का प्रदर्शन इसकी एक मिसाल है जहां लोग अपने वेतन और काम की घंटो की मांग को लेकर आंदोलन करते दिखे।
यही मज़दूर बड़ी फैक्ट्रियों, निर्माण स्थलों और खतरनाक कामों में अपनी जान जोखिम में डालकर काम करते हैं। हादसा होने पर कई बार उनकी जान चली जाती है और पीछे उनका परिवार मुआवज़े और न्याय के लिए भटकता रह जाता है। वहीं कोरोना और वर्तमान के गैस संकट जैसे संकट के समय यही मजदूर खाली हाथ, पैदल और मजबूरी में अपने गांव लौटने को मजबूर हुए थे। साफ है कि गांव हो या शहर मजदूर आज भी सबसे ज्यादा संघर्ष और सबसे कम सुरक्षा के बीच जीवन जी रहा है।
ग्राम पंचायत अधिकारी का दावा
इस विषय पर ग्राम पंचायत अधिकारी और प्रधान से भी बात की गई तो जैतपुर के ग्राम पंचायत अधिकारी दयाशंकर जायसवाल बताते हैं कि साल 2011 की जनगणना के अनुसार जैतपुर की आबादी 18,753 है। उनके मुताबिक 2006 से चल रही नरेगा योजना के तहत अब तक 3375 जॉब कार्ड ऑनलाइन दर्ज हैं जिनमें करीब ढाई सौ सक्रिय मजदूर ऐसे हैं जो काम करने के इच्छुक रहते हैं। उनका कहना है “जो भी ग्राम पंचायत से काम मांगता है उसे काम दिया जाता है और भुगतान जॉब कार्ड के जरिए किया जाता है। नियम के अनुसार अगर कोई काम करने की स्थिति में नहीं है तो उसे भत्ता देने का भी प्रावधान है हालांकि अभी ऐसी स्थिति सामने नहीं आई है।”
बसोर समुदाय की ओर से लगाए गए जातिगत भेदभाव और काम न मिलने के सवाल करने पर वे आरोपों को खारिज कर देते हैं। उनका कहना है “यहां छुआछूत जैसी कोई बात नहीं है। जात-पात अब लगभग खत्म होने की कगार पर है। सबको सम्मान दिया जाता है। अगर किसी ने शिकायत की होती कि उसे काम नहीं मिला तो हम जरूर कार्रवाई करते।”
प्रधान का पक्ष: “काम है, जो करना चाहता है उसे मिलता है”
ग्राम पंचायत अधिकारी ने गांव की आबादी 18,753 बताया वहीं बेलाताल के प्रधान छोटेलाल बताते हैं कि साल 2011 की जनगणना के अनुसार गांव की आबादी करीब 20 से 22 हजार के बीच है। उनका कहना है कि मनरेगा के तहत गांव में लगातार काम निकलते रहते हैं जैसे खेतों में मेड़ बनाना और जमीन समतलीकरण। “मार्च के बाद खेत खाली होने लगते हैं तब मेड़ और समतलीकरण का काम शुरू हो जाता है जो चार-पांच महीने तक चलता है। जितने लोग काम के लिए आते हैं उन्हें काम मिल जाता है।”
गांव वालों के जातिगत भेदभाव के आरोपों पर प्रधान साफ इनकार करते हैं। “यह पूरी तरह गलत है। गांव में किसी के साथ भेदभाव नहीं होता। अगर कोई ऐसा कह रहा है तो सामने आकर बात करे।” प्रधान का दावा है कि गांव में काम की कमी नहीं है काम करने वालों को काम मिलता है और इसकी जानकारी रोजगार सेवक के जरिए लोगों तक पहुंचाई जाती है।
बेलाताल की ज़मीनी हक़ीक़त कई परतों को खोलती है।जहां मेहनत करने वाले हाथ काम की तलाश में भटक रहे हैं बराबरी की मांग कर रहे हैं और सम्मान के साथ जीने के अधिकार के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं।
गांव में मनरेगा के तहत काम करने वाले ज़्यादातर लोग ऐसे ग्रामीण मज़दूर होते हैं जो सिर्फ खेती पर निर्भर होकर अपना घर नहीं चला सकते। उनके पास या तो बहुत कम ज़मीन होती है या कई बार ज़मीन होती ही नहीं है। खेती के मौसम में वे खेतों में काम करते हैं लेकिन साल का एक बड़ा समय ऐसा भी आता है जब खेती का काम ठप पड़ जाता है या मौसम, पानी और दूसरी दिक्कतों के कारण खेती से आमदनी नहीं हो पाती। ऐसे समय में मनरेगा जैसी योजना उनके लिए सहारा बनती है ताकि गांव में ही कुछ दिनों का काम मिल सके और परिवार का खर्च चल सके। इसलिए मनरेगा से जुड़े लोगों को सिर्फ किसान कहना सही नहीं होगा। ये दरअसल ग्रामीण मज़दूर हैं जिनकी ज़िंदगी खेती और मजदूरी दोनों के सहारे चलती है। ऐसे में जब गांव के यही ग्रामीण मज़दूर जिनके लिए मनरेगा सहारे की तरह लाई गई थी काम के लिए भटकते नजर आएं या उन्हें बराबरी से काम न मिलने की शिकायतें सामने आएं तो सवाल उठता है कि जिस योजना को उनकी जरूरतों के लिए बनाया गया था क्या वह सच में उन्हीं तक पूरी तरह पहुंच पा रही है?
दूसरी तरफ़ ग्राम पंचायत अधिकारी और प्रधान के दावों में भी फर्क दिखाई देता है। गांव की आबादी से लेकर जॉब कार्ड और सक्रिय मजदूरों की संख्या तक दोनों के आंकड़े अलग-अलग हैं। एक ओर समुदाय के लोग लगातार भेदभाव काम न मिलने और नजरअंदाज किए जाने की बात कह रहे हैं तो दूसरी ओर अधिकारी और प्रधान साफ इनकार करते हुए कहते हैं कि गांव में कोई भेदभाव नहीं है और जो काम मांगता है उसे काम दिया जाता है। ऐसे में आखिर सच किसके साथ खड़ा है उन लोगों के साथ जो सालों से काम के इंतजार में हैं या उस व्यवस्था के साथ जो दावा करती है कि सबको बराबरी से काम मिल रहा है?
इस पूरी कहानी का एक और पहलू समाज के भीतर का दबाव भी है। एक तरफ़ लोग काम चाहते हैं दूसरी तरफ़ समाज के अपने नियम और बहिष्कार का डर उन्हें कुछ काम करने से रोकता है। यानी रास्ता बंद करने वाली दीवार सिर्फ व्यवस्था में नहीं समाज के भीतर भी खड़ी है। सरकारी योजनाओं में भेदभाव के आरोप, समाज का दबाव, रोज़गार की कमी, पलायन, बच्चों की छूटती पढ़ाई और सम्मान के साथ काम पाने की लड़ाई ये सब मिलकर बताते हैं कि मजदूर का संघर्ष सिर्फ पेट भरने का नहीं बराबरी और सम्मान के साथ जीने का संघर्ष भी है।
ऐसे समय में 1 मई, अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस है तब यह सवाल और जरूरी हो जाता है कि क्या मजदूर दिवस सिर्फ मेहनतकश लोगों के सम्मान में भाषण देने का दिन बनकर रह गया है या यह उस व्यवस्था से जवाब मांगने का दिन भी है जहां आज भी मेहनत की कीमत जाति, पहुंच और पहचान देखकर तय होती है? जब तक मजदूर को बिना भेदभाव काम पूरा दाम और सम्मान नहीं मिलेगा तब तक मज़दूर दिवस का मतलब अधूरा ही रहेगा।
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