बांदा जिले में स्वास्थ्य विभाग की ओर से राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन (टीबी उन्मूलन) कार्यक्रम के तहत 100 दिवसीय टीबी मुक्त भारत अभियान तेजी से चलाया जा रहा है। यह अभियान देश को टीबी मुक्त बनाने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है।
रिपोर्ट – गीता, लेखन – रचना
टीबी एक ऐसी बीमारी है जिसे लोग अक्सर सामान्य खांसी-बुखार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं लेकिन अगर समय पर जांच और इलाज न हो तो यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है। अच्छी बात यह है कि सरकारी अस्पतालों में इसकी जांच और इलाज मुफ्त में उपलब्ध है। इसी से संबंधित उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्वास्थ्य विभाग की ओर से राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन (टीबी उन्मूलन) कार्यक्रम के तहत 100 दिवसीय टीबी मुक्त भारत अभियान तेजी से चलाया जा रहा है। यह अभियान देश को टीबी मुक्त बनाने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है। इसका सबसे बड़ा मकसद उन लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना है जो किसी वजह से अस्पताल तक नहीं पहुंच पाते और समय रहते अपनी जांच नहीं करा पाते।
इस अभियान के तहत जिले के आठ ब्लॉकों के 169 गांवों को चिन्हित किया गया है। यह अभियान 24 मार्च 2026 से शुरू हुआ है जो जून 2026 तक चलेगा। इस दौरान गांव-गांव जाकर जागरूकता कार्यक्रम, स्क्रीनिंग कैंप और इलाज की सुविधाओं पर खास ध्यान दिया जा रहा है ताकि लोगों को टीबी के बारे में सही जानकारी मिल सके और मरीजों का समय पर इलाज शुरू हो सके।
इसी क्रम में जिला क्षय रोग उन्मूलन केंद्र, बांदा के मार्गदर्शन में टीबी यूनिट बहेरी, नरैनी और बड़ोखर समेत सभी टीमें शैक्षणिक संस्थानों और ग्रामीण इलाकों में लगातार जागरूकता शिविर लगा रही हैं। इन शिविरों के जरिए लोगों को टीबी के लक्षण, कारण और बचाव के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है ताकि लोग बीमारी को पहचानें और समय रहते जांच कराएं।
शिविर के माध्यम से होती है जानकारी और जागरूकता
बांदा जिला क्षय अस्पताल के जिला पीपीएम समन्वयक गणेश प्रसाद से इस बारे में बातचीत की गई उन्होंने बताया कि इन शिविरों के जरिए छात्रों, शिक्षकों और ग्रामीणों को टीबी के बारे में जागरूक किया जा रहा है। खासतौर पर लोगों को समझाया जा रहा है कि अगर किसी व्यक्ति को दो हफ्ते से ज्यादा खांसी, खून वाली खांसी, लगातार बुखार, वजन घटना या रात में ज्यादा पसीना आने जैसे लक्षण दिखें तो इन्हें नजरअंदाज न करें और तुरंत जांच कराएं।
वहीं जिले में टीबी की जांच और इलाज की सुविधाएं भी व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराई गई हैं। आधुनिक नॉट मशीन के जरिए तेज और सटीक जांच की सुविधा सीएचसी बबेरू, अतर्रा, नरैनी, जसपुरा और पीएचसी तिंदवारी, कमासिन समेत कई स्वास्थ्य केंद्रों पर निःशुल्क उपलब्ध है। इसके अलावा टीबी मरीजों को डॉट्स योजना के तहत उनके नजदीकी केंद्रों पर नियमित दवाएं दी जाती हैं ताकि इलाज बीच में न रुके और मरीज पूरी तरह ठीक हो सकें।
आज भी कई लोग टीबी जैसी बीमारी को खुलकर बताने से बचते हैं। समाज में इसे लेकर एक तरह की झिझक और बदनामी का डर बना रहता है। कई बार लोग यह सोचकर बीमारी छिपा लेते हैं कि कहीं लोग उनसे दूरी न बनाने लगें या उन्हें अलग नजर से न देखें। ऐसे में बीमारी छिपाने से घर के दूसरे सदस्य भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि टीबी के लक्षण दिखते ही जांच कराई जाए बीमारी को छिपाया न जाए और समय पर इलाज शुरू किया जाए ताकि मरीज भी ठीक हो सके और दूसरों को भी संक्रमण से बचाया जा सके।
टीबी के मरीजों को खाने-पीने के लिए मिलते हैं एक हजार रुपए
सरकार की निक्षय पोषण योजना के तहत टीबी मरीजों को इलाज के दौरान हर महीने 1000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खाते में भेजी जाती है। इस योजना का उद्देश्य मरीजों को बेहतर पोषण मिल सके और उनका इलाज प्रभावी ढंग से पूरा हो सके।
इसके साथ ही स्वास्थ्य विभाग उच्च जोखिम वाले समूहों जैसे बुजुर्ग, मधुमेह के मरीज और एचआईवी संक्रमित लोगों पर विशेष ध्यान दे रहा है ताकि उनमें समय रहते टीबी की पहचान की जा सके और इलाज शुरू हो सके।
ग्रामीण स्तर पर भी इस अभियान को मजबूती से लागू किया जा रहा है। 4 मई 2026 को ग्राम पंचायत करतल में आयोजित निक्षय शिविर में हैंड-हेल्ड एक्स-रे मशीन के जरिए लोगों की जांच की गई। इसके साथ ही ब्लड प्रेशर, शुगर, बीएमआई और हीमोग्लोबिन (खून) की जांच भी की गई। ऐसे शिविर गांवों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
तीन ब्लॉकों में अभियान का काम हुआ पूरा
गणेश प्रसाद द्वारा ये जानकारी दी गई कि जिले के आठ ब्लॉकों में चल रहे अभियान में अब तक बड़ोखर और जसपुरा ब्लॉक का काम पूरा हो चुका है और नरैनी ब्लॉक का काम 4 मई को पूरा हो गया है। इस समय तिंदवारी, महुआ और बहेरी क्षेत्रों में अभियान जारी है। जिन गांवों को चिन्हित किया गया है वहां टीम के द्वारा लोगों की हीमोग्लोबिन, बीएमआई, हाइट, वजन समेत अन्य जरूरी जांचें की जाती हैं। जिन लोगों में किसी बीमारी की आशंका दिखती है उन्हें आगे इलाज के लिए स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ा जाता है।
इस अभियान में विभाग की ओर से दो लोग रहते हैं जबकि गांव स्तर पर आरबीएसके टीम, आशा कार्यकर्ता और एएनएम लोगों को एकत्र करने और कैंप तक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके बाद कैंप में स्टैंडर्ड टेस्टिंग प्रोग्राम के तहत एक्स-रे, ब्लड टेस्ट और अन्य जरूरी जांचें की जाती हैं। अगर किसी व्यक्ति में टीबी की पुष्टि होती है तो उसे तुरंत सूचित कर इलाज शुरू कराया जाता है।
गणेश प्रसाद ने बताया कि गांवों में ऐसे बहुत से लोग हैं जो तब तक अस्पताल नहीं जाते जब तक बीमारी गंभीर न हो जाए। ऐसे में कई बार बीमारी का पता देर से चलता है। यही वजह है कि इस तरह के अभियान बेहद जरूरी हैं ताकि बीमारी की पहचान समय रहते हो सके और इलाज शुरू किया जा सके। ऐसे अभियान कब और कितने समय तक चलेंगे यह शासन स्तर पर तय होता है। पिछले साल यह अभियान दिसंबर में चला था जबकि इस बार 24 मार्च से शुरू किया गया है।
बांदा जिले में स्वास्थ्य विभाग शैक्षणिक संस्थानों और स्थानीय समुदाय के साझा प्रयासों से टीबी उन्मूलन की दिशा में लगातार काम हो रहा है। जागरूकता, समय पर जांच और निःशुल्क इलाज की सुविधाओं के कारण टीबी के खिलाफ लड़ाई मजबूत हुई है और “टीबी मुक्त भारत” के लक्ष्य की ओर बांदा जिला आगे बढ़ता हुआ नजर रहा है।
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