केन-बेतवा लिंक परियोजना पर बुंदेलखंड में नाराज़गी गहराती जा रही है। सरकार इसे क्षेत्र के लिये पानी, सिंचाई और बिजली का समाधान बता रही है, लेकिन स्थानीय आबादी का कहना है कि परियोजना के चलते 7,000 परिवार विस्थापित होंगे, 75% आदिवासी प्रभावित होंगे और पन्ना टाइगर रिज़र्व के 98 वर्ग किलोमीटर जंगल डूब जाएंगे। 30-40 लाख पेड़ कटने का अनुमान है। मुआवज़े के दावे, ग्राम सभा की स्वीकृति के दावों पर अनिश्चितता और भ्रष्टाचार के आरोप विरोध की जड़ हैं। धरना, घरों के ध्वंस और गिरफ्तारियों ने आंदोलन में उबाल ला दिया है। सरकार की पारदर्शिता की कमी और विरोधी आवाज़ों पर अंकुश विकास के दावे को संदिग्ध बनाते हैं। अब प्रश्न यह है: क्या ये योजना सचमुच लोगों के हित में है या बड़े पैमाने पर संसाधनों व जमीन के पुनर्वितरण का माध्यम बन रही है, जबकि स्थानीय समुदायों के जीवन-धारों को अंडरमाइन किया जा रहा है?
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