गुरगवाँ और आसपास के गांवों के बच्चे रोज सुबह इसी नाव से नदी पार कर चिल्ला के संगम स्कूल पढ़ने जाते हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस नाव को कोई अनुभवी नाविक नहीं सिर्फ 14 साल का एक लड़का चलाता है। स्कूल जाने की उम्र में वह खुद बच्चों को एक किनारे से दूसरे किनारे पहुंचाने की जिम्मेदारी निभा रहा है।
शिक्षा किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत होती है। यही वह आधार है जिस पर एक जागरूक समाज और बेहतर भविष्य की नींव रखी जाती है। लेकिन आज देश में शिक्षा को लेकर सवाल सिर्फ स्कूल, किताबों और पढ़ाई तक सीमित नहीं रह गए हैं। एक तरफ शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार, सिस्टम की खामियों और प्रशासनिक लापरवाही से परेशान लाखों युवा जंतर-मंतर पर एक महीने तक प्रदर्शन करते रहे। अलग-अलग राज्यों से आए युवाओं ने अपनी-अपनी समस्याएं सामने रखीं और एक बेहतर शिक्षा व्यवस्था की मांग की।
लेकिन दूसरी तरफ अब शिक्षा से जुड़ी मुश्किलें सिर्फ भर्ती परीक्षाओं या सिस्टम की गड़बड़ियों तक सीमित नहीं हैं। देश के कई गांवों में आज भी बच्चों के लिए सिर्फ स्कूल जाना ही सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। कहीं उन्हें उफनती नदी पार करनी पड़ती है कहीं तेज बहाव वाले नाले और कहीं जर्जर लकड़ी के पुल के सहारे जान जोखिम में डालकर स्कूल जाना पड़ता है तो कहीं बड़े नाले खुले पड़े हुए हैं जहां तेज बारिश आने पर नाले का बहाव बढ़ जाता है। देखा जाए तो शहरों में वाहनों की आवाजाही के लिए तो बड़े-बड़े पुल तेजी से बन जाते हैं पर जहां बच्चों को रोज स्कूल जाने के लिए एक सुरक्षित पुल की जरूरत होती है वहां सालों तक पुल का इंतजार करना पड़ता है। तो क्या सिर्फ स्कूल खोल देना ही शिक्षा का अधिकार पूरा कर देता है या फिर बच्चों का सुरक्षित स्कूल तक पहुंचना भी उतना ही जरूरी है?
यह समस्या अब कोई नई समस्या नहीं है। ये समस्या से हर बारिश में अलग-अलग राज्यों से ऐसे वीडियो सामने आते हैं जिनमें बच्चे डंडे का सहारा लेकर किसी बड़े के कंधे पर बैठकर या तेज बहाव वाली नदी-नालों को पार करके स्कूल जाते दिखाई देते हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से एक घटना सामने आई है जहां कक्षा चार की एक छात्रा चारु कश्यप स्कूल से घर लौटते समय बारिश के तेज बहाव में खुले नाले में बह गई। 48 घंटे तक चले रेस्क्यू अभियान के बाद भी उस लड़की का पता नहीं चल सका। इस घटना के बाद चार अधिकारियों को निलंबित तो कर दिया गया है लेकिन ये सवाल अब भी बाकी है कि अगर रास्ता सुरक्षित होता है तो इस घटना से बाकी बच्चे खतरे से बाहर होंगे। घटना नगर कोतवाली क्षेत्र की है। 28 जुलाई 2026 बारिश के दौरान कक्षा 4 की छात्रा चारु कश्यप स्कूल से घर लौट रही थी। रास्ते में खुले नाले में तेज बहाव के कारण वह उसमें बह गई। सूचना मिलते ही प्रशासन और पुलिस की टीमें मौके पर पहुंचीं और तत्काल बचाव अभियान शुरू कराया गया। दैनिक भास्कर के रिपोर्ट अनुसार उस छात्रा का अब तक कोई पता नहीं लग पाया है।
ये खबर बुलंदशहर की है दूसरी तरफ ऐसे और भी खबरें हैं जहां लोग खूद से ही पुल का निर्माण कर चलने का रास्ता बना रहे हैं। खबर लहरिया द्वारा कई रिपोर्ट में देखी गई है कि पुल की समस्या से कई गांव के लोग समस्या झेल रहे हैं।
गांव वाले खुद बनाते हैं पुल
बांदा जिले की तस्वीर भी कुछ अलग नहीं है। ग्राम पंचायत अतरहट के ग्रामीण पिछले करीब 20 वर्षों से लकड़ी के अस्थायी पुल के सहारे आते जाते हैं। वहां के लोगों का कहना है कि कई बार पुल बनाने की मांग की गई है लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन दिया जाता है। बारिश आते ही यह पुल और खतरनाक हो जाता है।
गांव की निशा बताती हैं “यह लकड़ी का पुल कभी भी गिर सकता है और इससे सबसे ज्यादा परेशानी बच्चों को होती है। कई बार वे स्कूल ही नहीं जा पाते।” वहीं ग्रामीण विंदा जो 60 से 70 साल के बुजुर्ग हैं कहते हैं कि जब बार-बार शिकायत के बाद भी कुछ नहीं हुआ तो गांव वालों ने खुद मिलकर लकड़ी का पुल बना लिया। पिछले करीब दस साल से लोग इसी लकड़ी का बना हुआ अस्थायी पुल के भरोसे आ-जा रहे हैं। भले ही ग्राम प्रधान खुद पुल न बनवा सकते हों लेकिन गांव की सबसे बड़ी जरूरत को सरकार और प्रशासन तक लगातार पहुंचाना भी उनकी जिम्मेदारी है।
नाव से नदी पार कर बच्चे जाते हैं स्कूल
ठीक इसी तरह एक और समस्या है। बांदा जिले के चिल्ला क्षेत्र में यमुना नदी पर आज भी कोई पुल नहीं है। नदी के दोनों किनारों पर बसे गांवों के लोगों को आने जाने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है। बाजार जाना हो, अस्पताल पहुंचना हो या बच्चों को स्कूल पहुँचना हो हर काम के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है। बारिश के दिनों में जब नदी का पानी बढ़ जाता है तब यह सफर और भी खतरनाक हो जाता है। इसके अलावा लोगों के पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है।
गुरगवाँ और आसपास के गांवों के बच्चे रोज सुबह इसी नाव से नदी पार कर चिल्ला के संगम स्कूल पढ़ने जाते हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस नाव को कोई अनुभवी नाविक नहीं सिर्फ 14 साल का एक लड़का चलाता है। स्कूल जाने की उम्र में वह खुद बच्चों को एक किनारे से दूसरे किनारे पहुंचाने की जिम्मेदारी निभा रहा है। वह बताता है कि पूरे साल यही काम करता है। इसके बदले उसे पैसे नहीं मिलते बल्कि गांव वाले गेहूं जैसा अनाज दे देते हैं। पैसे भी कभी-कभी मिल जाते हैं। एक बार में करीब 22 बच्चे उसी नाव में बैठकर नदी पार करते हैं। जब उससे पूछा गया कि इतने बच्चों की जिम्मेदारी उठाते हुए डर नहीं लगता तो उसने सिर्फ इतना कहा “करना पड़ता है।” इस एक जवाब में उसकी मजबूरी भी छिपी है और व्यवस्था की असफलता भी।
उसी नाव में सफर कर रहीं राजकुमारी बताती हैं कि उनके गांव से दूसरे गांव जाने का यही एकमात्र रास्ता है। दस-बीस रुपये देकर नाव से नदी पार करनी पड़ती है। वे कहती हैं, “अभी तो बारिश कम है पानी और बढ़ेगा तब भी इसी नाव से जाना पड़ेगा। दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है।” उनकी बात साफ बताती है कि यहां लोगों ने खतरे के साथ जीना सीख लिया है क्योंकि विकल्प कभी मिला ही नहीं।
बता दें इसके अलावा भी सोशल मीडिया में कई ऐसे तस्वीर सामने आते हैं जहां बच्चे अपनी जान लगा कर उफनती नदी पार कर स्कूल जाते दिखते हैं। उनका ये जज़्बा क्या ये नहीं दिखाती कि उनके लिए स्कूल और शिक्षा कितना जरुरी है।
छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले के प्रतापपुर क्षेत्र में सोनगरा-खड़गवां मुख्य मार्ग पर बनी पुलिया टूटने के बाद स्कूली बच्चों की मुश्किलें बढ़ गई । बारिश के दिनों में नाला उफान पर होता है पर बच्चों की पढ़ाई रुक न जाए इसलिए वे जान जोखिम में डालकर उसे पार करने को मजबूर हैं। छोटे-छोटे बच्चों को परिजन अपने कंधों पर बैठाकर नाले के तेज बहाव से निकालते हैं और फिर स्कूल तक पहुंचाते हैं। हर दिन का यह सफर किसी हादसे का इंतजार करता हुआ नजर आता है।
इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि पढ़ाई के लिए निकले मासूमों को सुरक्षित रास्ता तक नसीब नहीं है।
सोचिए जिस उम्र में एक बच्चा किताबों के साथ स्कूल जाने का सपना देखता है उसी उम्र का दूसरा बच्चा घर चलाने के लिए नाव चला रहा है। और जिन बच्चों को पढ़ने जाना है उनके लिए हर सुबह स्कूल पहुंचना किसी परीक्षा से कम नहीं। यह पुल न होने की कहानी व्यवस्था की तस्वीर है जहां शिक्षा तक पहुंचने का रास्ता आज भी सुरक्षित नहीं हो पाया है। जब तक बच्चों के लिए सुरक्षित पुल और रास्ते नहीं बनेंगे तब तक शिक्षा का अधिकार सिर्फ कानून की किताबों में लिखा रहेगा जमीन पर नहीं।
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