दिल्ली के जंतर-मंतर पर दिन बीत रहे हैं। हर गुजरते दिन के साथ सोनम वांगचुक का शरीर कमजोर होता जा रहा है। उनकी उम्र अब ऐसी नहीं है कि वे लंबी भूख हड़ताल को आसानी से झेल सकें। फिर भी वे डटे हुए हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर अब भी शिक्षा व्यवस्था पर गंभीरता से बात नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाएंगी।
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