खबर लहरिया Blog जंगल से जंतर-मंतर तक: दो भूख हड़तालें, दो भारत

जंगल से जंतर-मंतर तक: दो भूख हड़तालें, दो भारत

मैं जंगलों से लौट रही हूं बस पहाड़ों की घुमावदार सड़कों से होकर आगे बढ़ रही है। बाहर काले बादल हैं। बारिश की फुहारें और ठंडी हवा मेरे बालों और चेहरे को छू रही हैं। चारों तरफ़ घने जंगल हैं। कहीं-कहीं धुंध ने पहाड़ियों को ढक रखा है। बस के स्पीकर पर धीमी आवाज़ में एक गीत बज रहा है लेकिन मेरे भीतर गहरी ख़ामोशी है। खिड़की से बाहर भागते जंगलों से भी तेज़ मेरे मन में पिछले चार दिनों की तस्वीरें दौड़ रही हैं।

लेखन – मीरा देवी 

फोटो साभार: खबर लहरिया

मन अब भी वहीं अटका है…..

बार-बार उन्हीं आदिवासी महिलाओं के चेहरे याद आ रहे हैं। शायद वे अपना नाम तक लिखना नहीं जानतीं लेकिन अपने हक़ के लिए भूख, बारिश और अनिश्चित भविष्य से लड़ना जानती हैं। उनके लिए जंगल सिर्फ़ पेड़ नहीं उनका घर है। ज़मीन सिर्फ़ खेत नहीं बल्कि पुरखों की निशानी है और आज वही उनसे छीनी जा रही है।
बस आगे बढ़ रही है लेकिन मेरा मन अब भी वहीं अटका है। उस निर्माणाधीन पुल के नीचे नदी किनारे बने अस्थायी डेरों में। जहां कभी घर थे वहां अब मिट्टी और पत्थरों का ढेर है। जहां कभी खेतों में फसलें लहलहाती थीं वहां अब मशीनें चल रही हैं। जहां कभी बच्चों की हंसी गूंजती थी, वहां अब सिर्फ़ विस्थापन की चिंता है। इन लोगों का सबसे बड़ा सवाल है अब हमारा घर कहां होगा?

सालों से आदिवासी इलाकों की गवाही

साल 2018 से मैं मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में लगातार रिपोर्टिंग कर रही हूं। इन सालों में मैंने उनके त्योहार देखे, गीत सुने, उनके सुख-दुख को करीब से जाना लेकिन इस बार की रिपोर्टिंग अलग थी। इस बार मैंने सिर्फ़ एक आंदोलन नहीं देखा बल्कि अपनी जड़ों से उखड़ते लोगों का दर्द महसूस किया।

अमित भटनागर: चार दशक का संघर्ष

इसी धरने में मेरी मुलाकात अमित भटनागर से हुई। करीब 55 साल की उम्र में भी वे भूख हड़ताल पर बैठे हैं। चार दशक से ज़्यादा समय से वे आदिवासी समुदायों के साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने अपना जीवन जंगलों और गांवों में लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए बिताया है। आज उनका शरीर कमजोर है लेकिन इरादा पहले जितना ही मज़बूत है। उनका कहना है कि जब तक विस्थापितों को न्याय नहीं मिलेगा तब तक यह लड़ाई जारी रहेगी।

जंतर-मंतर की याद क्यों आई?

उन्हें सुनते-सुनते मुझे दिल्ली का जंतर-मंतर याद आने लगा।
कुछ दिन पहले मैं वहां भी रिपोर्टिंग कर रही थी। वहां भी भूख हड़ताल थी। छात्र और उनके सामर्थ में आए देश भर से लोग अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे। इन दोनों धरनों के बीच सिर्फ़ 600 किलोमीटर की दूरी नहीं थी बल्कि दो अलग-अलग भारत खड़े थे।

सोनम वांगचुक के साथ खड़ा युवा भारत

दिल्ली में सोनम वांगचुक देश भर से जुट युवकों के साथ भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनके साथ छात्र हैं, प्रोफेसर हैं, डॉक्टर हैं और बड़ी संख्या में युवा हैं। शिक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े सवालों को लेकर वे संघर्ष कर रहे हैं। दिल्ली के धरने में सोशल मीडिया था। कैमरों की भीड़ थी। हर घंटे स्वास्थ्य की खबरें थीं। देशभर से समर्थन भी था और विरोध भी।

क्या जंगल की आवाज दिल्ली तक पहुंचेगी?

वहीं मध्य प्रदेश के जंगलों में ज़्यादातर अनपढ़ आदिवासी महिलाएं थीं। उनके पास न सोशल मीडिया था, न कोई बड़ा मंच, न कोई बड़ी राजनीतिक ताकत। वे सिर्फ़ अपना घर, खेत, जंगल, नदी और पुरखों की विरासत बचाने के लिए बैठी थीं। एक तरफ़ लोग आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे। दूसरी तरफ़ लोग आने वाली पीढ़ियों का घर, ज़मीन, जंगल और अपनी पहचान बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे।
दोनों जगह भूख हड़ताल थी। दोनों जगह न्याय की उम्मीद थी। लेकिन दोनों संघर्षों को मिलने वाली पहचान और चर्चा एक जैसी नहीं थी। इन दोनों आंदोलनों ने मुझे एक पत्रकार के तौर पर भी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया।

पत्रकारिता या संवेदनशीलता?

दिल्ली में मुझसे कहा गया कि भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक के पास बैठकर पीटूसी करूं ताकि कैमरे में हमारी मौजूदगी साफ़ दिखाई दे। मगर उस समय मुझे लगा कि जो इंसान कई दिनों से भूखा है, जिनकी सांसे धीमी पड़ रही हैं, उसके चेहरे के सामने कैमरा और माइक लेकर खड़ा होना मुझे ठीक नहीं लगा। हो सकता है पेशेवर नज़र से यह मेरी कमी हो मगर उस समय मेरी संवेदनशीलता ने मुझे ऐसा करने से रोक दिया। जंगल में भी मुझे यही महसूस हुआ। कैमरा आंसू तो रिकॉर्ड कर सकता है लेकिन उजड़ते घर का दर्द नहीं। माइक्रोफोन आवाज़ तो रिकॉर्ड कर सकता है लेकिन वह ख़ामोशी नहीं। जो अपना गांव घर छोड़ने से पहले किसी बूढ़ी मां की आंखों में उतर आती है।
रिपोर्टिंग करते-करते कई बार हम ख़बर के इतने करीब पहुंच जाते हैं कि दर्द भी हमें सिर्फ़ एक विजुअल लगने लगता है। लेकिन इन दोनों धरनों ने मुझे याद दिलाया कि पत्रकार होने से पहले इंसान होना ज़रूरी है। हमारी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ सबसे पहले ख़बर दिखाना नहीं बल्कि उसे सबसे पहले समझना भी है। इस तरह का अनुभव मैंने अपनी बीस साल की रिपोर्टिंग कैरियर में बार बार महसूस किया है।

कुछ संघर्ष सुर्खियां बन जाते हैं और क्या हर संघर्ष बराबर दिखता है?

जंतर-मंतर से लेकर मध्य प्रदेश के जंगलों तक की इस यात्रा ने मुझे एक बात सिखाई है। भूख एक जैसी होती है। दर्द एक जैसा होता है। न्याय की उम्मीद भी एक जैसी होती है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि कुछ संघर्ष सुर्खियां बन जाते हैं और कुछ जंगलों की ख़ामोशी में दबे रह जाते हैं। एक पत्रकार के तौर पर मेरी कोशिश रहेगी कि कैमरा सिर्फ़ वहां न पहुंचे जहां पहले से रोशनी है जबकि वहां भी पहुंचना जरूरी है जहां अंधेरे में बैठे लोग सालों से किसी के सुनने का इंतज़ार कर रहे हैं। पत्रकारिता का असली काम सिर्फ़ ख़बर दिखाना नहीं जबकि उन आवाज़ों को सामने लाना है जो सबसे कम सुनाई देती हैं।

 

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