असाढ़ की बारिश शुरू होते ही खेतों, नहरों, पानी वाले इलाकों और नम जमीनों में एक ऐसी मौसमी भाजी उगने लगती है, जिसका इंतजार गांव से लेकर शहर तक के लोग करते हैं। यह है करेम की भाजी। गांवों में इसे करेमू, करमुआ, करमी, नारी या नाड़ी और कई जगह कलमी साग के नाम से भी जाना जाता है। अंग्रेजी में इसे वॉटर स्पिनच (Water spinach) या इपोमिया एक्वाटिका (Ipomoea aquatica) कहते हैं।
रिपोर्ट – सुनीता, लेखन – सुचित्रा
बुंदेलखंड और चित्रकूट से सटे प्रयागराज जिले के जसरा ब्लॉक और आसपास के क्षेत्रों में भी करेम की भाजी बरसात के मौसम में करेम अधिक मिलता है। बारिश के करीब तीन महीनों में यह ग्रामीण महिलाओं के लिए मौसमी रोजगार और घर चलाने का सहारा बन जाती है। सुबह महिलाएं खेतों, नहरों, रेलवे किनारे और पानी वाले इलाकों में पहुंचती हैं। घंटों मेहनत कर भाजी तोड़ती हैं, फिर उसे साफ पानी से धोकर गड्डियां बनाती हैं और स्थानीय बाजारों में बेचने पहुंच जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्र में इसे स्वाद और पौष्टिकता के कारण पसंद करते हैं, वहीं शहर के बाजारों में भी इसकी अच्छी मांग रहती है।
चंदकली निवासी कौशांबी कहती हैं “असाढ़ लगते ही करेम की भाजी फूटने (उगने) लगती है। सावन भर वह इसे तोड़कर प्रयागराज के बाजारों में बेचती हैं। उनके मुताबिक इससे होने वाली आमदनी से घर के छोटे-मोटे खर्च आसानी से निकल जाते हैं।”
कौशाम्बी जिले के जलालपुर गांव की उर्मिला भी इसी काम से जुड़ी हैं। उन्होंने बताया कि उनके गांव से जसरा ब्लॉक के सेहुड़ा गांव की दूरी करीब 60 किलोमीटर है। आने-जाने में लगभग 130 रुपये खर्च होने के बावजूद वह रोज करेम की भाजी तोड़ने निकलती हैं। खेत, नहर और रेलवे किनारे से भाजी जुटाकर वह उसे बाजार तक पहुंचाती हैं।
20 से 25 किलो तक भाजी, फिर बाजार में बिक्री
सविता बताती हैं कि वह एक दिन में करीब 20 से 25 किलो तक करेम की भाजी तोड़ लेती हैं। इसमें से कुछ भाजी वह थोक व्यापारियों को बेचती हैं और बाकी फुटकर ग्राहकों को। उनके मुताबिक भाजी का भाव आमतौर पर 10 से 15 रुपये किलो तक मिल जाता है।
आजीविका का साधन
करेम की भाजी की रोज की बिक्री से महिलाओं के लिए परिवार का खर्च चलाना कुछ हद तक आसान हो जाता है। बरसात के दिनों में यही छोटी-छोटी कमाई आटा, चावल, नमक, तेल और बच्चों की पढ़ाई जैसे जरूरी खर्चों में काम आती है।
ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि करेम की भाजी उनके लिए सिर्फ एक मौसमी साग नहीं, बल्कि रोजगार और आत्मनिर्भरता का जरिया भी है। खेतों, नहरों और पानी वाले इलाकों से इसे चुनना, साफ करना और बाजार तक पहुंचाना आसान नहीं होता। इसके बावजूद महिलाएं बारिश के मौसम में मेहनत करके करेम की भाजी जुटाती हैं और उसे बेचकर होने वाली आमदनी से घर की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करती हैं।
पारंपरिक खाद्य संस्कृति का हिस्सा
वहीं स्थानीय निवासी रमेश ने बताया कि करेम की भाजी वर्षों से इस क्षेत्र की पारंपरिक खाद्य संस्कृति का हिस्सा रही है। आधुनिक समय में जहां कई पारंपरिक खाद्य पदार्थ यानी जो पुराने समय से लोग भोजन के रूप में खाते आ रहे हैं, अब धीरे-धीरे लोगों की थाली से दूर होते जा रहे हैं। वहीं करेम की भाजी आज भी ग्रामीण संस्कृति, स्थानीय खान-पान और प्रकृति से जुड़े जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।
करेम की भाजी की तुड़ाई में खतरा
रानी बताती हैं कि करेम की भाजी तोड़ते समय कई तरह के खतरे भी रहते हैं। पानी और झाड़ियों के बीच सांप-बिच्छू, खुटी और कांटों का डर बना रहता है। इसके बावजूद महिलाएं रोज निकलती हैं, क्योंकि इसी मौसम में उन्हें आसानी से मिलने वाला यह रोजगार परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में मदद करता है।
रानी के मुताबिक, उनके घर में पांच लोगों का खर्च है। इसलिए बरसात में करेम की भाजी से होने वाली आमदनी उनके लिए काफी मायने रखती है। वह बताती हैं कि हर मौसम में अलग-अलग तरह की जंगली और मौसमी भाजियां मिलती हैं और महिलाएं उन्हें तोड़कर बेचती रहती हैं।
भाजी तोड़ने से लेकर गड्डी बनाने तक पूरा काम
महिलाओं का काम सिर्फ भाजी तोड़ने तक सीमित नहीं है। पहले उन्हें पानी और झाड़ियों के बीच से कोमल हिस्से तलाशने पड़ते हैं। इसके बाद भाजी को घर या बिक्री की जगह पर लाकर साफ पानी से धोया जाता है। फिर उसकी गड्डियां बनाई जाती हैं और सब्जी दुकानदारों या थोक व्यापारियों को बेच दिया जाता है।
कई महिलाएं एक-दो दिन भाजी तोड़कर बेचने के बाद दोबारा उसी इलाके में जाती हैं। इस तरह सावन का पूरा महीना उनके लिए लगातार काम और आमदनी का समय बन जाता है।
करेम की भाजी में पौष्टिक तत्व
करेम की भाजी यह सलाद, पकौड़े और साग के रूप में खाई जाने वाली एक स्वादिष्ट सब्जी है। इसमें विटामिन ए, विटामिन सी और आयरन जैसे पोषक तत्व काफी मात्रा में पाए जाते हैं। इसमें कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे खनिज भी पाए जाते हैं। इसकी पत्तियों में विटामिन C पाया जाता है। हरी पत्तेदार सब्जी होने के कारण इसमें फाइबर होता है।
असाढ़-सावन की यह भाजी ग्रामीण महिलाओं के हाथों में सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि अपने परिवार को सहारा देने और आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी देती है। महिलाओं को साग तोड़ने के लिए कई बार घुटनों तक पानी में उतरना पड़ता है, उसे साफ करना, गड्डियां बनाना और बाजार तक ले जाने में उन्हें परेशानी भी होती है। इसके बावजूद महिलाएं मौसम की परवाह किए बिना मेहनत करती हैं। करेमुआ से होने वाली छोटी-सी आमदनी भी उनके लिए बड़ा सहारा है।
यदि आप हमको सपोर्ट करना चाहते है तो हमारी ग्रामीण नारीवादी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करें और हमारे प्रोडक्ट KL हटके का सब्सक्रिप्शन लें’



