हरेली तिहार छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, खेती-किसानी और प्रकृति से जुड़े गहरे रिश्ते को दिखाता है। छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता से तो है ही साथ ही यहां की लोक परंपराओं से भी है। हरेली के मौके पर गांवों में खुशी का माहौल रहता है। लोग पारंपरिक खेल खेलते हैं, मिल-जुलकर त्योहार मनाते हैं और प्रकृति की इस हरियाली को अपनी जिंदगी का हिस्सा मानकर उसका आभार जताते हैं।
रिपोर्ट – पिंकी, लेखन – रचना
छत्तीसगढ़ी संस्कृति में लोक-त्योहारों की एक समृद्ध परंपरा रही है, जिसमें प्रकृति, कृषि और जीव-जंतुओं के प्रति गहरा सम्मान झलकता है। इन्हीं त्योहारों में सबसे पहला और प्रमुख त्यौहार है हरेली तिहार (त्योहार) बारिश के मौसम में जब छत्तीसगढ़ की धरती चारों तरफ से हरी चादर ओढ़ लेती है खेतों में धान की फसल लहलहाने लगती है उसी समय आता है ये हरेली त्योहार। सावन महीने की अमावस्या को मनाया जाने वाला हरेली तिहार छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, खेती-किसानी और प्रकृति से जुड़े गहरे रिश्ते को दिखाता है। छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता से तो है ही साथ ही यहां की लोक परंपराओं से भी है। हरेली के मौके पर गांवों में खुशी का माहौल रहता है। लोग पारंपरिक खेल खेलते हैं, मिल-जुलकर त्योहार मनाते हैं और प्रकृति की इस हरियाली को अपनी जिंदगी का हिस्सा मानकर उसका आभार जताते हैं।इसे छत्तीसगढ़ का सबसे पहला त्योहार माना जाता है। इसके बाद ही राज्य के प्रमुख लोक पर्वों की शुरुआत होती है।बता दें हरेली शब्द का संबंध हरियाली से माना जाता है। बारिश के बाद खेतों में आई हरियाली और अच्छी फसल की उम्मीद के बीच आने वाला यह त्योहार किसानों के लिए खास महत्व रखता है। इस साल हरेली का त्योहार 12 अगस्त 2026 बुधवार को मनाया जाएगा।
क्या है हरेली त्योहार
हरेली के दिन किसान अपने खेती करने के औजारों की पूजा करते हैं। हल से लेकर कुदाली, फावड़ा और गैंती तक को साफ कर घर के आंगन में रखा जाता है और पूजा के बाद उन्हें पारंपरिक व्यंजन गुड़ के चीले और नारियल का भोग लगाया जाता है। खेती के लिए इस्तेमाल कर रहे औज़ार किसान के लिए ये बस एक औजार नहीं है ये उसकी मेहनत और रोजी-रोटी कमाने का सहारा भी है। इसी तरह उस दिन गाय, बैल और बछड़ों को भी नहलाकर सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। कई जगह बैल और बैलगाड़ी को भी सजाया जाता है। गांवों में ठाकुरदेव और दूसरे ग्राम देवताओं की पूजा भी होती है।
हरेली की बात हो और गेड़ी छूट जाए ऐसा कैसे हो सकता है। त्योहार आने से पहले ही घरों में बांस की गेड़ी बननी शुरू हो जाती है। बच्चे और युवा हरेली के दिन गेड़ी चढ़कर गांव की गलियों में घूमते हैं। इस तरह पूजा-पाठ के साथ पूरा गांव खेल, हंसी-मजाक और मेल-जोल में शामिल हो जाता है। यही हरेली को छत्तीसगढ़ के दूसरे त्योहारों से अलग और खास बनाता है।
छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है और यहां खेती लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा है। इसलिए हरेली भी सिर्फ पूजा का त्योहार नहीं ये किसान के पूरे जीवन से जुड़ा पर्व है। पहले के समय में हरेली आने तक किसान रोपाई, बियासी और निंदाई जैसे खेती के जरूरी काम काफी हद तक पूरा कर लेते थे। अब मौसम के बदलते मिजाज और बारिश के समय में बदलाव का असर खेती पर भी पड़ा है। कई जगह इन कामों का समय पहले जैसा तय नहीं रह गया है। इसके बावजूद हरेली की परंपरा आज भी उसी उत्साह के साथ निभाई जाती है।
अब जानते हैं कि हरेली के दिन क्या-क्या चीजें होती हैं जो बाकी त्योहारों से बिलकुल अलग और खास है।
घर के दरवाज़ों पर नीम के पत्ते
छत्तीसगढ़ के कई गांवों में हरेली के दिन सुबह होते ही लगभग हर घर के दरवाजे पर नीम की हरी टहनी लगी दिखाई देती है। गांव में एक व्यक्ति या किसी परिवार को इसकी जिम्मेदारी दी जाती है। वह सुबह से नीम की टहनियां लेकर एक-एक घर पहुंचता है और दरवाजे पर उसे इस तरह लगा देता है जैसे घर के बाहर कोई छोटा-सा निशान या झंडा लगाया गया हो। देखते ही देखते पूरे गांव के दरवाजे नीम की हरियाली से भर जाते हैं। इस परंपरा के पीछे एक पुरानी मान्यता भी है। बारिश के मौसम में नमी बढ़ने के साथ कई तरह की बीमारियों और कीड़ों का खतरा बढ़ जाता है। इसका असर इंसानों के साथ-साथ पशुओं पर भी पड़ता है। खासकर गाय और बैल जो खेती में किसान के सबसे बड़े साथी माने जाते हैं। बारिश के मौसम में कई तरह की परेशानियों का सामना करते हैं। ऐसे में नीम को पुराने समय से ही औषधीय गुणों वाला पेड़ माना जाता रहा है। इसलिए घर के दरवाजे पर नीम की टहनी लगाना बीमारी से बचाव और अच्छे स्वास्थ्य की कामना का प्रतीक माना जाता है।
इस परंपरा का एक और खूबसूरत पहलू है आपसी सहयोग और सामुदायिक जुड़ाव। नीम की टहनी घर-घर पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाने वाले यादव समुदाय के लोगों को गांव के परिवार अपनी क्षमता के अनुसार दाल, चावल, धान, हरी सब्जियां और घर में बनाए गए पकवान देते हैं। यानी एक तरफ वे गांव के हर घर तक हरेली की यह परंपरा पहुंचाते हैं तो दूसरी तरफ गांव के लोग भी उनके साथ अपनी उपज और घर का खाना साझा करते हैं। इस तरह नीम की एक छोटी-सी टहनी सिर्फ दरवाजे की सजावट नहीं होती। वह गांव की पुरानी सोच प्रकृति से जुड़े विश्वास, पशुधन की चिंता और एक-दूसरे के साथ मिलकर रहने की परंपरा को भी अपने साथ लेकर आती है। हरेली के दिन जब हर घर के दरवाजे पर नीम की डाल दिखाई देती है तो पूरा गांव जैसे एक ही परंपरा और एक ही भावना से जुड़ा नजर आता है।
खास पारंपरिक व्यंजन और पशुओं के लिए खास पकवान
ये भी एक अलग परंपरा है कि आज किसान किसी भगवान की मूर्ति की पूजा नहीं करते हैं बल्कि खेती किसानी से जुड़ी चीजों को पूजते हैं। हरेली में पूजा के साथ खाने-पीने की भी अपनी खास परंपरा है। इस दिन घरों में खास तौर पर गुड़ से बने पकवान तैयार किए जाते हैं। इनमें गुड़ का चीला और गुलगुल भजिया प्रमुख हैं। इन्हें गेहूं या चावल के आटे से बनाया जाता है और त्योहार के दिन परिवार के लोग मिल-बांटकर खाते हैं और अपने आस पड़ोस में एक दूसरे के घर व्यंजन पहुँचाने की भी सुंदर परंपरा है।
हरेली का रिश्ता इंसानों के खाने के साथ-साथ किसान के पशुधन से भी जुड़ा है। गाय और बैलों के लिए इस दिन खास पकवान लोंदी (लोई) बनाई जाती है। इसे गेहूं के आटे से गोल-गोल लड्डू की तरह तैयार किया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इसमें दशमूल और कुछ जड़ी-बूटियां मिलाई जाती हैं। फिर इसे धीमी आंच पर सेंका जाता है। हरेली के दिन किसान अपने गाय-बैलों को यह पकवान खिलाने के लिए गौठान तक ले जाते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि बारिश के मौसम में पशुओं को होने वाली बीमारियों से उन्हें बचाया जा सके। यानी जिस पशुधन के सहारे किसान खेती करता है हरेली में उसके स्वास्थ्य का भी उतना ही ध्यान रखा जाता है।
वहीं घर में बनाए गए दूसरे पकवानों को खेती के औजारों के पास रखकर पूजा की जाती है। पूजा के बाद गुड़ और पकवानों का प्रसाद परिवार और आसपास के लोगों में बांटा जाता है।
गेड़ी चढ़ने का आनंद
बारिश के दिनों में जब गांव की गलियां और खेत कीचड़ से भर जाते थे तब बांस की गेड़ी ग्रामीण जीवन का एक आसान सहारा हुआ करती थी। माना जाता है कि ऊंची गेड़ी पर चलने से लोग पानी और कीचड़ से बचकर आगे बढ़ पाते थे। धीरे-धीरे यही जरूरत एक परंपरा और फिर हरेली के सबसे खास खेलों में बदल गई।
आज हरेली के दिन बच्चे और युवा घर पर ही बांस की गेड़ी बनाते हैं और उस पर चढ़कर गांव की गलियों में घूमते हैं। कई जगह गेड़ी चलाने की प्रतियोगिताएं भी होती हैं जहां बच्चे और युवा एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। गेड़ी सिर्फ त्योहार के एक दिन तक सीमित नहीं रहती। कई बच्चे हरेली के बाद भी महीनों तक इसे संभालकर रखते हैं और खाली समय में इसी पर खेलते हैं। इस तरह बांस की यह साधारण-सी गेड़ी छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन और पुरानी संस्कृति की पहचान बन गई है।
बता दें गेड़ी बांस या लकड़ी से बनी एक प्रकार की स्टाल्ट या लंबी छड़ें होती हैं। जिन पर पैर रखकर बच्चे और युवा जमीन से ऊपर खड़े होकर चलते हैं। इसे बनाने के लिए बांस में कुछ ऊंचाई पर पैर रखने के लिए छोटा सा टुकड़ा (पउआ) बांधा जाता है और फिर उसी के सहारे चलते हैं।
हरेली में महिलाओं के भी होते हैं खेल और गीत
हरेली में सिर्फ बच्चे और युवा ही नहीं महिलाएं भी पूरे उत्साह के साथ शामिल होती हैं। अच्छी फसल और गांव की खुशहाली की कामना के साथ महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और मिलकर नाचती हैं। गांव की बुजुर्ग महिलाएं भी इन आयोजनों का हिस्सा बनती हैं और नई पीढ़ी को लोकगीत और परंपराएं आगे बढ़ाने का मौका मिलता है। शाम होते ही गांव का माहौल और भी जीवंत हो जाता है। महिलाएं और लड़कियां समूह बनाकर खो-खो, कबड्डी और दूसरे पारंपरिक खेल खेलती हैं। इसे भी कई जगह इन खेलों को प्रतियोगिता के रूप में भी कराया जाता है। खेल के मैदान में उम्र की सीमाएं जैसे पीछे छूट जाती हैं और गांव की महिलाएं एक साथ हंसती, खेलती और एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाती नजर आती हैं। हां ये कहने में कोई हर्ज नहीं है कि महिलाएं आज के दिन खुल कर हंस सकती है नाच सकती है खेल सकती है और बोल भी सकती है। हरेली की यही खासियत है कि इसमें पूजा के साथ पूरा गांव शामिल होता है। खेत और पशुधन से लेकर गेड़ी, लोकगीत और खेल तक हर चीज लोगों को एक-दूसरे से जोड़ती है।
हरेली के दिन छत्तीसगढ़ के गांवों में खेत, पशु, पेड़-पौधे और पूरा गांव जैसे एक साथ त्योहार मनाता नजर आता है। यह दिन इंसान और प्रकृति के उस रिश्ते को भी सामने लाता है जिस पर गांव और किसान का जीवन टिका है। आज के समय में भी हरेली की इस परंपरा को बचाए रखने की कोशिश हो रही है। छत्तीसगढ़ सरकार ने इस दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है और गेड़ी दौड़ जैसे पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देने के लिए आयोजन भी किए जाते रहे हैं। इसके जरिए नई पीढ़ी को अपनी लोक संस्कृति और पुरानी परंपराओं से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
हरेली की असली रौनक गांव में दिखाई देती है। इन छोटी-छोटी परंपराओं में प्रकृति के साथ सदियों पुराना रिश्ता दिखाई देता है। शायद यही वजह है कि पीढ़ियां बदलने के बावजूद हरेली आज भी छत्तीसगढ़ के गांवों में उसी अपनापन और खुशी के साथ मनाई जाती है।
यदि आप हमको सपोर्ट करना चाहते है तो हमारी ग्रामीण नारीवादी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करें और हमारे प्रोडक्ट KL हटके का सब्सक्रिप्शन लें’






