महोबा के लाडपुर गांव में हरछठ के दिन महिलाओं ने खेत-किसानी से दूरी बनाकर परंपरा निभाई। इस दिन खेत की मेड़ तक न जाने और हल से जुड़ी फसलों से परहेज करने के साथ महुआ, पसहर चावल जैसे स्थानीय भोजन बनाए गए।
रिपोर्ट – श्यामकली, लेखन – रचना
बारिश की हल्की फुहार के बीच खेत हरे दिखाई दे रहे हैं। कहीं धान की फसल है तो कहीं खेत की मेड़ों पर घास उग आई है। आम दिनों में इन्हीं खेतों में महिलाएं घास काटती, निराई-गुड़ाई करते हुए दिखती हैं। आज का नजारा कुछ और ही है। जिसका कारण है हरछठ त्योहार। महोबा के गांव लाडपुर की महिलाएं खेत की ओर नहीं गईं।
वैसे तो ये हरछठ का त्योहार मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी ऊम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए मनाती हैं। इसमें माताएँ एक दिन का व्रत रखती हैं और शाम में पूजा आरती कर के व्रत तोड़ती हैं। नई फसल की बोआई से पहले अनाज की पूजा की जाती है। महिलाएं व्रत रखकर अन्नदेव की आराधना करती हैं। समाज में मान्यता है कि इस पूजा और व्रत से पूरे साल खेतों में अच्छी फसल होती है। किसानों के लिए अनाज भोजन के साथ-साथ जीवन का आधार और देवता के समान पूजनीय भी है।
बुंदेलखंड खंड में इसकी परंपरा थोड़ी से अलग है। हरछठ के दिन महिलाएं खेत की मेंड़ तक नहीं जातीं और हल से जुड़ी फसल से बनी चीजें भी नहीं खातीं हैं। बुंदेलखंड के कई गांवों में आज भी महिलाएं इसे अपने तरीके से निभाती हैं। हरछठ उनके लिए बस पूजा-पाठ मात्र का दिन नहीं होता है ये दिन खेती-किसानी के लगातार काम से एक दिन की दूरी बनाने का मौका भी है। इस दिन कोई भी महिला खेत नहीं जाती हैं और न ही उससे जुड़ी कुछ काम करती हैं।
महोबा के जैतपुर ब्लॉक के लाडपुर गांव की रामकली बताती हैं कि ये परंपरा उन्होंने अपनी मां और सास से सीखी है। वह कहती हैं कि पहले घर की बड़ी महिलाएं जिस तरह हरछठ मनाती थीं वही तरीका अब उनकी पीढ़ी भी निभा रही है। उनके मुताबिक इस दिन आम दिनों की तरह रोटी, सब्जी या पूरी नहीं बनातीं। हल से जुती जमीन में उगी फसल से बनी चीजें खाने से भी बचती हैं। खेती के काम से भी आज के दिन दूरी रहती है।
रामकली कहती हैं “हर समय तो हम खेती-किसानी का काम करते हैं। आज घर में ही रहेंगे खेत नहीं जाएंगे। कितना भी जरूरी काम हो आज खेत की तरफ नहीं जाते।”
उनका कहना है कि गांव में ये बात सब जानते हैं कि हरछठ के दिन महिलाओं का खेत जाना अच्छा नहीं माना जाता। अगर कोई महिला खेत चली जाए तो लोग उसे टोकते भी हैं कि आज तो खेत जाने का दिन नहीं है। ये इस त्योहार का एक परंपरा और नियम है।
लाडपुर के मुरली बाई पकवान बनाते हुए रिपोर्टर श्यामकली को बताते हुए कहती हैं कि इस दिन घर में ऐसे पकवान बनाए जाते हैं जो महुआ से बनी चीजें और दूसरी स्थानीय सामग्री इस दिन के खान-पान का हिस्सा होती हैं। “आज पूरा दिन खाना नहीं खाएंगे। रात में पसहर के चावल बनाकर खाएंगे। घर में महुआ की बाहरी भी बनेगी।”
हरछठ के दिन खान-पान में भी खेती से जुड़ा एक अलग नियम दिखाई देता है। इस दिन हल से जोती जमीन में पैदा होने वाले अनाज और सब्जियों को खाने से बचा जाता है। इसके बजाय ऐसी चीजों को प्राथमिकता दी जाती है जो बिना हल चलाए या प्राकृतिक रूप से उगी हों। महुआ, भैंस का दूध-दही और पसहर चावल जैसी चीजें इस दिन के भोजन का हिस्सा बनती हैं। बुंदेलखंड में हरछठ की परंपरा को खेती और प्रकृति से जोड़कर भी देखा जाता सकता है।
हरछठ को लेकर गांवों में अलग-अलग लोककथाएं भी सुनाई जाती हैं। लाडपुर की महिलाओं के बीच सुनाई जाने वाली एक कहानी भादो की छठ और एक ग्वालिन से जुड़ी है।
हरछठ के आसपास गांव और कस्बों के बाजारों में भी अलग तरह की रौनक दिखाई देती है। मिट्टी से बने छोटे-छोटे बर्तन, खिलौने, अनाज की आकृतियां और सिंगार का सामान दुकानों पर दिखाई देता है।
इन छोटी चीजों का बाजार भले ही बड़ा न हो पर त्योहार की पहचान इन्हीं से बनती है। मिट्टी के बर्तनों और स्थानीय चीजों की मौजूदगी त्योहार को गांव की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़े रखती है।
ये हरछठ सिर्फ महोबा या बुंदेलखंड तक बस नहीं है। उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, राजस्थान और गुजरात के कई हिस्सों में भी अलग-अलग स्थानीय तौर-तरीकों के साथ इसे मनाया जाता है। इसे सिर्फ धार्मिक नियम मानकर देखने के बजाय महिलाओं के रोजमर्रा के काम और ग्रामीण जीवन के संदर्भ में भी समझा जा सकता है। सालभर खेत में काम करने वाली महिलाओं के लिए आज का दिन घर और अपने लोगों के साथ रहने का दिन है।
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