खबर लहरिया Blog Bihar News: खराब सड़क के कारण गर्भवती को ट्रैक्टर से ले गए, रास्ते में मौत, खराब सड़क और स्वास्थ्य सुविधा के कारण कई ऐसे खबरें 

Bihar News: खराब सड़क के कारण गर्भवती को ट्रैक्टर से ले गए, रास्ते में मौत, खराब सड़क और स्वास्थ्य सुविधा के कारण कई ऐसे खबरें 

सरकारी स्वास्थ्य और सड़क सुविधा के कारण एक और महिला की जान चली गई। बिहार के बगहा के रामनगर इलाके से स्वास्थ्य और सड़क व्यवस्था की बदहाल तस्वीर सामने आई है। सिंगड़हवा दोन गांव की 22 वर्षीय सुमन देवी को 9 अगस्त 2026 शाम अचानक तेज प्रसव पीड़ा शुरू हो गई।

गर्भवती महिला, बिहार (फोटो साभार: इंडिया टीवी)

परिवार उसे अस्पताल ले जाना चाहते थे लेकिन गांव तक पक्की सड़क नहीं होने की वजह से एंबुलेंस नहीं पहुंच सकी। ऐसे में परिजनों ने महिला को ट्रैक्टर से उसे हरनाटांड़ पीएचसी स्वास्थ्य केंद्र ले जाने की कोशिश की। 

अस्पताल के रास्ते में ही हरदा नदी पड़ती है। नदी पार करते समय ट्रैक्टर वहीं फंस गया। काफी कोशिश के बाद भी उसे समय पर आगे नहीं ले जाय पाए। इस दौरान महिला की हालत लगातार बिगड़ती गई और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी मौत हो गई। इंडिया टीवी के रिपोर्ट अनुसार इस घटना के बाद सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर लोगों में नाराजगी है। गांव वालों का कहना है कि अगर गांव तक आने जाने का रास्ता बेहतर होता और समय पर एंबुलेंस मिल जाती तो शायद महिला की जान नहीं जाती। 

यह घटना केवल एक घटना नहीं 

देखा जाए तो ये बिहार के एक छोटे से गांव की एक घटना मात्र लग सकती है लेकिन उस गर्भवती महिला की मौत सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। पिछले कुछ महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे कई वीडियो और खबरें सामने आई हैं जिनमें मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस का इंतजार करना पड़ा या सड़क न होने की वजह से लोग खुद ही किसी तरह मरीज को अस्पताल ले जाते दिखे। 

कहीं मरीज को रिक्शे से ले जाना पड़ा तो कहीं ठेले पर लेटाकर अस्पताल पहुंचाया गया। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में हालात और भी मुश्किल हैं। जंगलों और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले कई गांव लंबे समय से सड़क की मांग कर रहे हैं जैसे छत्तीसगढ़, ओड़िसा। लेकिन वहां आज भी पक्की सड़क नहीं पहुंच पाई है। ऐसे में जब कोई बीमार पड़ता है तो परिवार के लोग बांस, कपड़े या दूसरी चीजों से (कपड़े की झोली बना कर उसमें मरीज को लिटाते हैं और फि लकड़ी के सहारे से दो लोग पकड़ कर कई किलो मीटर पैदल चल कर ले जाते हैं। वैसे ही बांस से भी एक खाट की तरह स्ट्रेक्चर बनाया जाता है) अस्थायी स्ट्रेचर बनाकर मरीज को कई किलोमीटर पैदल तय करने के बाद अस्पताल ले जाने को मजबूर होते हैं।

शहरों में सड़कें तो हैं लेकिन वहां भी हर मरीज तक एंबुलेंस समय पर पहुंच जाए यह जरूरी नहीं है। एंबुलेंस मरीज तक पहुंचने से पहले ही काफी समय बीत जाता है और मरीज का स्वास्थ्य और भी खराब होने लगता है। बीते कुछ महीनों में सामने आई ऐसी कई घटनाएं और वीडियो यह सवाल खड़ा करते हैं कि देश में स्वास्थ्य सुविधा सिर्फ अस्पताल बनाने तक सीमित है या फिर जरूरत पड़ने पर मरीज को समय पर अस्पताल तक पहुंचाना भी व्यवस्था की जिम्मेदारी है? 

बिहार का दरभंगा जिले के सुपौल बाजार से एक मार्मिक तस्वीर सामने आई थी यहां एक गरीब महिला अपने बच्चे के साथ एम्बुलेंस न मिलने पर अपने अधमरे पति को ठेले पर लादकर अस्पताल तक लेकर पहुंची। 

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के खालापुर तालुका के दूरदराज स्थित उमरनेवाड़ी गांव में सड़क न होने के कारण एक गर्भवती महिला को इलाज के लिए झोली में उठाकर कई किलोमीटर पैदल अस्पताल ले जाना पड़ा। जानकारी के अनुसार पहाड़ और नदी की घाटी में बसे इस इलाके के लोगों को आज भी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने के लिए कठिन रास्तों का सामना करना पड़ता है। 

मध्य प्रदेश के इंदौर के महाराजा यशवंतराव से भी एक वीडियो वायरल हुआ। जहां एक 11 साल के बीमार बच्चे को उसके माता-पिता द्वारा तेज धूप में स्ट्रेचर पर खींचकर ले जाने का मामला सामने आया। वीडियो सामने आने के बाद भारी जन-आक्रोश फैला और संबंधित अस्पताल के लापरवाह स्टाफ पर कार्रवाई की गई।

बिहार के सहरसा जिले से भी एक वीडियो सामने आई थी वीडियो सौरबाजार प्रखंड क्षेत्र का बताया गया जिसमें एक गर्भवती महिला को उसके परिजन ठेले पर बैठाकर सौरबाजार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाते दिखाई दे रहे थे। महिला को प्रसव के लिए अस्पताल ले जाना था लेकिन उसे समय पर एंबुलेंस की सुविधा नहीं मिल सकी। इसके बाद परिवार को ठेले का सहारा लेना पड़ा। 

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा से स्वास्थ्य व्यवस्था को शर्मसार करने वाली एक तस्वीर सामने आई है जहाँ समय पर एम्बुलेंस न मिलने के कारण एक गर्भवती महिला को खटिया (चारपाई) पर ले जाना पड़ा। जानकारी के अनुसार एम्बुलेंस नहीं पहुँचने की वजह से महिला की डिलीवरी (प्रसव) घर पर ही हो गई। इसके बाद जच्चा-बच्चा (माँ और नवजात) की हालत बिगड़ती देख,परिजनों को मजबूरी में उन्हें खटिया पर लिटाकर अस्पताल ले जाना पड़ा।

झारखंड के पीरटांड़ में एक गर्भवती आदिवासी महिला को प्रसव पीड़ा के दौरान 4 किमी तक खाट पर ढोना पड़ा और रास्ते में ही बच्चे को जन्म देना पड़ा क्योंकि गांव तक सड़क नहीं है।

ओडिशा के कंधमाल में सड़क नहीं होने की वजह से ग्रामीणों को एक बुजुर्ग आदिवासी महिला के शव को लकड़ी के पलंग पर रखकर करीब 4 किलोमीटर तक पैदल ले जाना पड़ा। गांव तक सड़क नहीं होने से लोगों को शव को मुख्य सड़क तक पहुंचाने के लिए यह रास्ता अपनाना पड़ा। 

बिहार की राजधानी पटना में एक मृतक को एंबुलेंस या शव वाहन तक नसीब नहीं हुआ। लाचार पुलिस तंत्र को आखिरकार कचरा चुनने वाले एक युवक के शव को ठेले पर लादकर अस्पताल भेजना पड़ा। पुलिस को बेसमेंट में एक युवक का शव मिलने की सूचना प्राप्त हुई थी। जिसके बाद वे वहां पहुंचे थे। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के लिए पुलिस अधिकारियों ने लगातार आपातकालीन एंबुलेंस सेवा को फोन किया। काफी समय बीत जाने और बार-बार संपर्क साधने के बाद भी जब एंबुलेंस मौके पर नहीं पहुंची तो स्थिति काफी चिंताजनक हो गई।

विकास के दावे के बीच सच की तस्वीर 

इन सभी घटनाओं में एक बात एक जैसी है जरूरत के समय सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था तक लोगों की पहुंच नहीं बन पा रही है। देश में सड़कें बन रही हैं बड़े-बड़े हाईवे और एक्सप्रेसवे तैयार हो रहे हैं पर विकास की ये सड़कें उन गांवों तक क्यों नहीं पहुंच पा रही हैं जहां एक मरीज को अस्पताल ले जाने के लिए परिवार को खाट, ठेला, ट्रैक्टर या बांस के सहारे का इस्तेमाल करना पड़ता है? और जहां सड़क है वहां समय पर एंबुलेंस क्यों नहीं पहुंच पाती?

स्वास्थ्य व्यवस्था का मतलब सिर्फ अस्पताल में डॉक्टर, दवा और बेड उपलब्ध होना नहीं है। इसका मतलब यह भी है कि जब किसी व्यक्ति की जान खतरे में हो तो उसे समय पर अस्पताल तक पहुंचाया जा सके। प्रसव पीड़ा में महिला हो घायल व्यक्ति हो या कोई गंभीर रूप से बीमार मरीज हर मिनट उसके लिए अहम होता है। ऐसे में सड़क की कमी या एंबुलेंस की देरी सिर्फ असुविधा नहीं रह जाती कई बार जिंदगी और मौत के बीच का फर्क बन जाती है।

आखिर किसी इंसान को इलाज तक पहुंचने के लिए अपनी जान जोखिम में क्यों डालनी पड़े? विकास तभी मायने रखता है जब उसकी सड़क, एंबुलेंस और स्वास्थ्य सुविधा आखिरी गांव और आखिरी व्यक्ति तक पहुंचे। अगर आज भी सड़क और एंबुलेंस की कमी के कारण लोगों को अस्पताल पहुंचने में घंटों लग रहे हैं और इसी देरी में किसी की जान चली जा रही है तो विश्वगुरु और अच्छे दिन के दावों के बीच इन तस्वीरों को भी देखना जरूरी है। 

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