खबर लहरिया Blog लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ख़ारिज, विपक्ष सरकार में तीखी बहस 

लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ख़ारिज, विपक्ष सरकार में तीखी बहस 

 

लोकसभा ने 11 मार्च 2026 को अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने से जुड़े विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को मंज़ूर नहीं किया। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने पेश किया था जिसे 50 से ज़्यादा सांसदों का समर्थन मिला था। हलांकी पूरे दिन चली चर्चा के बाद इसे ख़ारिज कर दिया गया। 

ओम बिरला (फोटो साभार:PTI)

बता दें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष ने 10 फरवरी 2026 (और उससे पहले फरवरी के बजट सत्र में) अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था। यह कदम विपक्षी सांसदों द्वारा उन पर “एकपक्षिय तरीके से सदन चलाने” और राहुल गांधी सहित विपक्ष के नेताओं को बोलने से रोकने के आरोपों के बाद उठाया गया था।

अविश्वास प्रस्ताव खारिज होने के बाद लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि यह सदन देश के 140 करोड़ लोगों की इच्छा और भरोसे का प्रतिनिधित्व करता है। उनकी हमेशा कोशिश रही है कि हर सांसद को नियमों के अनुसार अपनी बात रखने का पूरा मौका मिले। उन्होंने यह भी कहा कि जो सदस्य झिझक की वजह से कम बोलते हैं उन्हें भी वे आगे आकर अपनी राय रखने के लिए प्रोत्साहित करते रहे हैं।

ओम बिरला ने कहा कि संसद हमेशा से विचारों के आदान-प्रदान का एक खुला मंच रही है जहां सहमति और असहमति दोनों का सम्मान किया जाता है। उन्होंने यह भी साफ किया कि सदन की कार्यवाही नियमों, अनुशासन और निष्पक्षता के आधार पर चलती है और सभी सदस्यों के लिए एक जैसे नियम लागू होते हैं।

गृह मंत्री अमित शाह ने क्या कहा? 

गृह मंत्री अमित शाह ने 11 मार्च 2026 को अविश्वास प्रस्ताव को लेकर कहा कि ये कोई सामान्य घटना नहीं। उन्होंने लोकसभा में कहा कि “स्पीकर ओम बिरला को नैतिकता न सिखाई जाए क्योंकि जब कांग्रेस पार्टी थी तो उनके स्पीकर के ख़िलाफ़ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के दौरान तत्कालीन स्पीकर सदन में बैठते थे जबकि ओम बिरला इस अविश्वास प्रस्ताव के आने के बाद से यहां नहीं आए हैं।”

उन्होंने लोकसभा में आगे कहा कि “क़रीब चार दशक के बाद एक बार फिर से लोकसभा अध्यक्ष के सामने अविश्वास प्रस्ताव आया है। एक तरह से मैं यह भी कहना चाहता हूं कि संसदीय राजनीति और सदन दोनों के लिए अफ़सोसजनक घटना है।” 

अविश्वास प्रस्ताव पर राहुल गांधी ने क्या कहा? 

लोकसभा में नेता राहुल गांधी ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कई बार उनका नाम लोकतांत्रिक प्रक्रिया और स्पीकर की भूमिका पर चर्चा किया गया है। “कई बार मेरा नाम लिया गया कैसे बार मेरे बारे में गंदी बातें की गाईं।” 

“यह सदन भारत की जनता की अभिव्यक्ति है। यह सदन किसी एक दल का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यह सदन पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता है। हर बार जब हम बोलने के लिए खड़े होते हैं तो हमें बोलने से रोक दिया जाता है। पिछली बार जब मैंने बोला था तो मैंने हमारे प्रधानमंत्री द्वारा किए गए समझौतों के बारे में एक मूलभूत प्रश्न उठाया था। कई बार मुझे बोलने से रोका गया है। भारत के इतिहास में पहली बार नेता विपक्ष को सदन में बोलने नहीं दिया गया। हमारे प्रधानमंत्री के साथ समझौता किया गया है और यह बात सभी जानते हैं।”

ओम बिरला की प्रतिक्रिया 

सदन में नियमों और मर्यादा की बात करते हुए ओम बिरला ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ा एक पुराना प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने बताया कि साल 1957 में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान वाजपेयी जी जम्मू-कश्मीर से जुड़े कुछ फोटो सदन में दिखाना चाहते थे। उस समय के स्पीकर ने उन्हें पहले तस्वीरें अध्यक्ष को दिखाने के लिए कहा।

इस पर अटल बिहारी वाजपेयी ने बिना किसी बहस के सदन की परंपरा का सम्मान किया और सभी दस्तावेज पहले स्पीकर को दिखाए। इसके बाद ही उन्होंने अपनी बात आगे रखी। इस उदाहरण के जरिए ओम बिरला ने समझाने की कोशिश की कि संसद में नियमों और मर्यादा का पालन करना कितना जरूरी होता है। 

इसके साथ ही ओम बिरला ने साल 1958 की एक और घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उस समय सांसद रेनू चक्रवर्ती सदन में एक गैर-सरकारी दस्तावेज पटल पर रखना चाहती थीं। लेकिन स्पीकर ने नियमों के तहत इसकी अनुमति नहीं दी और उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।

ओम बिरला ने इस उदाहरण के जरिए कहा कि संसद में सभी को नियमों का पालन करना पड़ता है और कोई भी सदस्य नियमों से ऊपर नहीं होता।

अविश्वास प्रस्ताव 

क्यों लाया गया – विपक्ष ने आरोप लगाया कि ओम बिरला ने सदन में निष्पक्ष भूमिका नहीं निभाई। विपक्ष के नेताओं को बोलने न देने, भारी संख्या में सांसदों को निलंबित करने और माइक बंद करने जैसे आरोप लगाए गए। विपक्ष का मानना था कि वे सरकार के प्रति पक्षपाती हैं।

प्रक्रिया – संवैधानिक प्रावधानों के तहत 50 से अधिक लोकसभा सदस्यों के समर्थन से यह अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस स्वीकार किया जाता है। प्रस्ताव के बाद सदन में लंबी बहस होती है और फिर वोटिंग (ध्वनि मत या अन्य) के माध्यम से परिणाम घोषित होता है। इस मामले में यह प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज कर दिया गया।

कब लाया जाता है – यह एक दुर्लभ संवैधानिक प्रक्रिया है जो मुख्य रूप से तब अपनाई जाती है जब विपक्ष को लगता है कि स्पीकर पद की गरिमा के अनुरूप निष्पक्षता से सदन का संचालन नहीं कर रहे हैं।

परिणाम – प्रस्ताव गिरने के बाद ओम बिरला ने सदन में निष्पक्षता से नियम-आधारित कार्यवाही का आश्वासन दिया। 

 

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