मध्य प्रदेश सरकार ने रीवा, देवास और गुना के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को PPP मॉडल पर निजी संस्थाओं के जरिए संचालित करने की मंजूरी दी है। सरकार इसे डॉक्टरों की कमी दूर करने और स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर बनाने का उपाय बता रही है।
मंगलवार, 16 जून को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में रीवा, देवास और गुना जिलों के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर संचालित करने की मंजूरी दे दी गई। यह एक पायलट प्रोजेक्ट है, जिसके बारे में सरकार का कहना है कि इससे आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकेंगी और छोटी बीमारियों के लिए जिला अस्पताल जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
यदि यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो इसका विस्तार प्रदेश के दूसरे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक भी किया जा सकता है। फिलहाल इस मॉडल का पांच सालों तक मूल्यांकन किया जाएगा।
यह फैसला क्यों लिया गया?
सरकार का यह निर्णय स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद कमियों के बीच आया है। कैबिनेट मंत्री चेतन्य काश्यप ने बताया कि 20 बिस्तरों से अधिक क्षमता वाले कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है। खासकर विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता नहीं है। इसी वजह से रीवा, देवास और गुना के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी संचालन के लिए चुना गया है।
इन 18 केंद्रों में से 5 ऐसे हैं जहां एक भी डॉक्टर तैनात नहीं है।
यह केवल पहला चरण है। इस परियोजना में निजी संस्था डॉक्टरों और स्टाफ की नियुक्ति करेगी। स्वास्थ्य केंद्रों की इमारत और अन्य संपत्ति राज्य सरकार की ही रहेगी। दवाइयों की उपलब्धता भी सरकार ही सुनिश्चित करेगी, लेकिन डॉक्टरों और स्टाफ की भर्ती तथा प्रशिक्षण की जिम्मेदारी निजी संस्था की होगी।
जो निजी संस्था सबसे कम लागत में इस मॉडल को संचालित करने का प्रस्ताव देगी, उसे यह ठेका दिया जाएगा।
डॉक्टरों की भारी कमी
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये केंद्र प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से रेफर मरीजों का इलाज करते हैं और उन इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं, जहां निजी अस्पतालों की कमी है। लेकिन मध्य प्रदेश में दूरदराज के जिलों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों के लगभग हर चार में से तीन पद खाली हैं। कुल 5,443 स्वीकृत विशेषज्ञ पदों में से केवल 1,495 पर ही डॉक्टर कार्यरत हैं, जबकि 3,948 पद खाली पड़े हैं।
डॉक्टरों की कमी ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक है। नतीजा यह है कि गांवों के मरीजों को अक्सर सैकड़ों किलोमीटर दूर जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों तक जाना पड़ता है, जबकि ऐसे कई उपचार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर ही उपलब्ध होने चाहिए।
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PPP मॉडल से चिंताएँ
हालांकि स्वास्थ्य क्षेत्र में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है और सरकारें इसे डॉक्टरों और संसाधनों की कमी दूर करने के एक उपाय के रूप में देख रही हैं, लेकिन इसके साथ कई सवाल भी जुड़े हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जब सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ती है, तो इलाज की समान पहुंच, लागत, गुणवत्ता और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर सवाल उठते हैं।
इसके अलावा, पीपीपी मॉडल में काम करने वाले डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को अक्सर ठेके पर नियुक्त किया जाता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि ऐसे कर्मचारियों को कम वेतन और खराब परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। वहीं, निजी संस्थाओं के अधीन काम करने वाले कर्मचारियों की निगरानी और उनके कामकाजी अधिकारों की जिम्मेदारी भी स्पष्ट नहीं होती। आलोचकों का मानना है कि यदि निगरानी और जवाबदेही की मजबूत व्यवस्था न हो, तो इसका असर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है।
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