स्थानीय मीडिया के नाम ख़बर लहरिया का खुला ख़त #MeToo

जब हमारा कोई व्यक्तित्व ही नहीं, तब हमें चुप कराने की ज़रूरत ही क्या?

 

 

हम जानते है कि यह जोखिम भरा व्यापार है, छाया से लेकर, कब्र तक। वास्तव में, हम यहां कहीं भी नहीं हैं । हमारे होने का कोई मतलब नहीं है। फिर भी, जब बाहर की दुनिया जल रही है, तो हम चुप कैसे रह सकते हैं? हम अपनी कहानियों को शामिल करने के लिए इन आग की सीमाओं को कैसे नहीं धकेल सकते? हम वो सभी कहानियां सुनाना चाहते हैं जिनमे हमने परेशानियों का सामना किया है।इसलिए हम आपके द्वारा अपनी हिंसा की कहानियों को – पत्रकारिता में हमारे साथियों, हमारे सहयोगियों, आकाओं और प्रतिद्वंद्वियों, सबको जोड़ना चाहते हैं – कहानियां जिनका प्रचार जारी और जिनसे बदलाव लाया जा सकता है। बिना किसी कानून या समितियों के, बिना किसी ऑनलाइन या ऑफलाइन मंच के, ना ही बिजली के कोई नेटवर्क से, और न ही विश्वसनीयता के,जब हम शुरुआत करेंगे, तो क्या आप अपनी गलतियों को स्वीकार करेंगे? या आप कहेंगे, जैसा की आप हमेशा कहते आए हैं  कि पहले तो हमें इस जगह पर ही नहीं होना चाहिए था, तो हम इसके बारे में क्यों शिकायत करें? जिस तरह आपने फेसबुक पर कहा, ‘ अगली बात आप कहेंगे कि ‘ सनी लियोनी का कहना है कि वो भी हमले का शिकार हुई।

 

हजारों बहादुर महिलाएँ, जिन्होंने अपनी कहानियों को साझते हुए हर रोज़ हमारी उत्पीड़न की शांत कहानियों को भी बढावा दिया है-ताकि आपको यह महसूस कराया जा सके कि यह जयादा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा?

 

मैंने आप पर भरोसा किया, अफवाहों के बावजूद भी जब हमे बाइक पर एक साथ देखा गया, जब हमारी सेल्फ़ी फेसबुक तक पहुंच गई लेकिन यह बहुत ज्यादा हो गया यौन उत्पीड़न के मामले को रिपोर्ट करने के बाद भी, तुम्हें कुछ समय के लिया जेल जाना पड़ा, लेकिन इसकी वजह से मेरा खुद का करियर बर्बाद हो गया। मेरे पास ऐसे कोई सहकर्मी, दोस्त या परिवार नहीं है जो मेरे साथ खड़ा रहे। तुम धूमिल हो, और मैं कुछ भी नहीं कर सकती। मैं अब तुम्हारे लिए  मजाक बनकर रह गई हूं, तुम मामले के बारे में अपनी बड़ाई करते रहते हो, जिसे मैंने तुम्हारे खिलाफ दर्ज किया था। मेरे साथ काम कर रही महिलाओं ने भी मुझसे कहा कि मुझे वही मिला जो सामने से आ रहा था।

 

हमारी कहानियां अलीगढ़, महोबा, बांदा, चित्रकूट, गुना, मेरठ, उदयपुर, भीलवाड़ा, समस्तीपुर, रीवा से आती हैं – और हमारी महिला पत्रकारों को ऐसी कहानियां इन छोटे शहरों से हर रोज़ मिलती हैं । हमें हर दिन अपने कार्यालयों में, जिला मुख्यालय के बाहर, पुलिस स्टेशन के बाहर, पुलिस स्टेशन के अंदर, इन सब जगाओं पर बोला जाता है कि हम ब्यूटी पार्लर जैसे व्यवसाय में क्यों नहीं जाते? कभी किराने की दुकान क्यों शुरू नहीं करते? क्या आप एक शिक्षक या नर्स के रूप में एक नौकरी नहीं ढूंड सकती? क्या आपको लगता है कि आप एक कलेक्टर बनने जा रही हैं? यह आप जैसी औरत के लिए अच्छा नहीं कि वे इतनी गर्मी में पूरा दिन बाहर न घूमें। आपको केवल अपनी सुन्दरता का ही ध्यान रखना चाहिए। बिंदी, और साड़ी पहना करें। तुम बिना सिन्दूर के हो? उफ़, क्या हमने तुम्हे गलती से एक ब्लू फिल्म ‘ तो नहीं  भेज दिया? हम नहीं जानते थे कि इस मीडिया ग्रुप में कोई महिला भी हैं। माफ़ करना, गलती से चला गया होगा।

 

आपके तानों और हँसी की गूँज ने, आपकी मिलीभगत जिसने हमे यहाँ खड़ा किया है, एक ही जगह पर साथ रहना और जितने भी अल्प प्रयास आप लोगों ने हमारे लिए किए हैं – इन सबने हमें हमारी मौत में भी शर्म, संदेह और निराशा के भाव में धकेल दिया है।

 

एक बार में एक लड़की को जानती थी… उसे (एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक) में चुना गया था । उसका प्रभारी आगरा में थाअब मैं नहीं जानती  कि आगरा से उसका क्या सम्बन्ध था, न मुझे उनके रिश्ते के बारे में कुछ पता था, लेकिन प्रभार को कुछ समय बाद निकाल दिया गया । लड़की को रखा गया था, लेकिन वह इतनी ज्यादा परेशान हो गयी थी कि  उसे वहां से छोड़कर कहीं और जुड़ना पड़ा (एक और प्रमुख हिंदी दैनिक में )

उसी के चलते एक अफवाह फ़ैल गई कि उस प्रभारी ने उस लड़की के साथ गलत व्यवहार किया था- ‘ऐसा देख लिया था, वैसा देख लिया  था’। उसके नए प्रभारी तो उसके साथ और भी बुरी तरह पेश आए कि वह मानसिक रूप से परेशान हो गईवे लड़की हाथरस की रहने वाली थी हम एक साथ काम करते थे और वो मुझसे हर बार कहा करती थी कि ‘चलो आज कहीं साथ घूमने चलते हैं’। और आज वही लड़की घर पर बैठी है

 

यहाँ पर सत्ता, हर मोहल्ले और गली में अलग तरह से काम करती है । हम यहाँ समुदाय संरचनाओं के संग बंधकर रहा करते हैं- आप अक्सर हमे यहाँ दूर के रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ भी जुड़ा पाएंगे शहरों में रहने वाले पुरुषों को उनके वहां रह रही लड़कियों को रिपोर्टिंग करता देख कोई उत्सुकता नहीं जागती है। वे उन्हें हमेशा अपनी निगरानी में रखना पसंद करते हैं, जैसे वे अपनी बहु-बेटियों के साथ करते हैं। हैशटैग का सही इस्तेमाल कर के अन्य महिलाओं ने अपनी आवाज को कार्य का नाम देकर और उसका सही उपयोग करते हुए कई भारतीय कानून की सीमायों को टकर दी है। ये हमारे लिए बहुत ज़रूरी है कि हम आगे बड़ें और बोलें, नहीं तो हमे क्या ज़रूरत आन पड़ी कि हम बाधाओं को तोड़कर वो सब करेंगे जो हम करना चाहते हैं? अगर हम तुम्हे प्रेस के प्रतिनिधित्व का नाम सौंप देंगे तो ऐसे में हम किसी गलत इस्तेमाल हो रहे अधिकार को क्या नाम देंगे? तुमने हमे फ़ोन पर भी परेशान किया,हमे  हमारे ही शहरों की सड़कों पर, गाड़ी चलाते समय रोक कर खुदकी गाड़ी सामने खड़ी करते हुए, टपकती हुई अशिष्टता के साथ कहा ,आओ, चलो कुछ पत्रकारिता साथ में करते हैं अदालत में हमारे साथ रगड़ते हुए  या साइट पर जहां एक अपराध को कवर किया जा रहा था, और हमारे हाथ में पर्ची थमाते हुए , भड़काते, चिढ़ाते, हमें अपमानित करते हुए न जाने कैसे-कैसे खेल खेले तुमने। आपने हमारी सर्वश्रेष्ठ कहानियों पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया, यह दावा करते हुए कि वह कार्यालय में अव्यवसायिक व्यवहार माना जाएगा।

तुमने उस अव्यवसायिक व्यवहार और समुदाय संस्कृति के बारे में तब क्यों नहीं सोचा जब तुम आधी रात में whatsapp पर हमारी तस्वीरों पर टिप्पणी करते हुए हमें मिलने के लिए उकसाते रहे और ऐसा काम करते रहे जो तुमने कभी अपनी बहु-बेटियों के लिए सपने में भी नहीं सोचा होगा। हमने शिकायत दर्ज की और हमारे प्रयासों के लिए, तुमने हमे बदले में एफआइआर भेजी, प्रतिबंधित जुर्माना के साथ, तुम हमेशा हमे वेश्या के नाम से बुलाते रहे।

 

राज्य की राजधानी में मैं अपने नियुक्ति पत्र के साथ अखबार के दफ्तर में एचआर विभाग में गई। अखबार के दफ्तर में मौजूदा व्यक्ति ने बताया कि वो हमे रात को एक होटल के कमरे में लेकर जाएगा और वहां हमसे सारी बात करेगा। जब मैंने उसे मना किया तो उसने मुझसे कहा, ‘ सूनो मैडम, पत्रकारिता करनी है ना तो सब कुछ करना पड़ेगा,होटल भी जाना पड़ेगा और वहां उठना-बैठना भी पड़ेगा (सुनो, मैडम, अगर आप पत्रकारिता में काम करना चाहती हैं तो आपको सब कुछ करना होगा और होटलों में भी जाना पड़ेगा). मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने उसी समय नियुक्ति पत्र को फाड़कर उसके चेहरे पर फेंक दिया। मुझे पता था कि मैं मालिक के पास नहीं जा सकती थीउस कार्यालय में शायद ही कभी लोग इस तरह से एक दूसरे के खिलाफ खड़े हुए होंगे। मैं कब तक अकेले किसी दुसरे शेहर में उससे लड़ती रहती?

 

हम राहत महसूस करते है कि हमे एक मंच और एक आंदोलन मिल गया है जिसके द्वारा हम हमारे साथ हो रहे दुरुपयोग का पर्दाफाश कर सकते हैं लेकिन हमारे मन में एक अंधेरी जगह अब भी मौजूद है जहां अब तक राहत नहीं पहुंची है क्योकि कहीं लोग अब भी संघर्ष कर रहे हैं, जिनमे से कही हार भी चुके हैं। एक दोस्त और सहयोगी, एक औरत जो इस छोटे शहर को पत्रकारिता की दुनिया में बदलने की कोशिश कर रही थी और जिसे निराशा और अकेलेपन में धकेल दिया गया था, जिसे न तो वो किसी के सामने बयान कर सकती थी और न ही उनकी पुकार किसी ऑनलाइन मंच द्वारा लोगों तक पहुँच रही थी । क्या ऐसे हालातों में कभी कुछ बदल सकता है, जब उस महिला के अधिकारों का उसी के समुदाय और व्यवसाय द्वारा बेहूदा मजाक बना दिया जाता है? अंत में  हम बिना किसी के साथ के, अकेले ही संघर्ष करने पर मजबूर हो जाते हैं। जितने भी सुरक्षा के साधन हमारे पास हैं,  वो हमारी खुद की प्रवृत्ति और प्रयासों से हमारे पास आएं हैं,  पुरुष अफसरों के साथ मिलते समय किसी को हर बार साथ ले जाना , एक से ज़्यादा सिम कार्ड रखना, मदद के समय खुद ही से बनाए अनौपचारिक नेटवर्क का उपयोग करना।

 

हम #metoo ज़रूर कह रहे हैं, लेकिन हमें डर है कि सत्ता और पात्रता के लिए इसे सुखद प्राप्ति का स्थान नहीं समझा जा सकता और न ही इस खुद से बनाए स्थान पर हम मुश्किल के दौरान बहार निकलने के बारे में सोच सकते हैं

 

इस ख़त में प्रकाशित इंटरव्यूज स्थानीय ग्रामीण और छोटे शहरों में स्थित महिला रिपोर्टर्स के हैं, और जिले की हलचल पुस्तक से लिए गए हैं