तालाबों की सफाई को लेकर स्थानीय लोगों ने कई बार खुद पहल की है। लोगों द्वारा एक साथ मिलकर कीरत सागर से जलकुंभी निकालने के लिए कई बार श्रमदान अभियान चलाया। तालाब में जलकुंभी काफी फैल गई थी। लोगों के लगातार सफाई करने के बाद प्रशासन का भी ध्यान इस ओर गया और कीरत सागर से जलकुंभी हटाने का काम कराया गया।
रिपोर्ट – गीता, श्यामकली, लेखन – रचना
महोबा के तालाब सिर्फ पानी जमा करने की जगह नहीं हैं। ये बुंदेलखंड की उस पुरानी जल संस्कृति की कहानी बताते हैं जब सदियों पहले यहां के राजा पानी बचाने के लिए तालाब, बांध और जलाशय बनवाते थे। इन्हीं तालाबों के आसपास चंदेल राजाओं का इतिहास और आल्हा-ऊदल की वीर गाथाएं भी जुड़ी हैं। आज यही ऐतिहासिक तालाब गंदगी और जलकुंभी से भरे हुए हैं और धीरे-धीरे अपनी पहचान खोते जा रहे हैं।
मदन सागर तालाब का निर्माण चंदेल राजा मदन वर्मन ने 12वीं शताब्दी में 1129 से 1163 के बीच करवाया था। इसे बनने में करीब 34 साल लगे थे। महोबा के लंबे समय से रहे स्थानीय निवासी तारा पाटकर के अनुसार “हमारे यहां एक नदी थी जिसका सही नाम मकरंदध्वज नदी था। उसमें बहुत ज्यादा मगरमच्छ होते थे। इसी नदी पर राजा मदन वर्मन ने बांध बनवाया था। बांध बनने के बाद ही मदन सागर झील तैयार हुई।” बता दें महोबा में पांच बड़े ऐतिहासिक तालाब हैं। इनमें कीरत सागर, मदन सागर, कल्याण सागर, राहिल सागर और विजय सागर शामिल हैं।
तारा पाटकर से मिली जानकारी के अनुसार
तारा पाटकर के मुताबिक इस बांध को बनाने में शुरुआत में काफी परेशानी आई थी। नदी का बहाव तेज होने की वजह से बांध बनाने की दो कोशिशें नाकाम हो गई थीं और बांध टूट गया था। इसके बाद राजाओं ने उस समय के राजपुरोहितों और ऋषियों से सलाह ली। “तब सलाह दी गई कि महिषासुर मर्दिनी देवी का आह्वान किया जाए और उनसे प्रार्थना की जाए कि बांध का काम पूरा हो। इसके बाद वहां देवी की स्थापना कराई गई। आज जिसे छोटी चंद्रका देवी का मंदिर कहा जाता है वह इसी से जुड़ा हुआ है। इसके बाद बांध बन पाया और मदन सागर झील तैयार हुई।” उनके मुताबिक मझारी द्वीप के सामने ही खखरा मठ है। उस समय राजा और दूसरे लोग यहां बैठते थे। वह कहते हैं कि मझारी द्वीप पर उस दौर में कैबिनेट जैसी बैठकें भी हुआ करती थीं।
मदन सागर तालाब करीब 4 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। वहीं महोबा का कीरत सागर करीब 2 वर्ग किलोमीटर में बना है। तारा पटकर बताते हैं कि मदन सागर के किनारे चंदेल राजा परमाल का किला भी हुआ करता था। बाद में किला गिर गया और उस जगह जल संस्थान का कार्यालय बना दिया गया। वहीं पानी की टंकी भी बनी हुई है।
महोबा के ये तालाब पुराने जलाशय के साथ साथ इनके किनारे बने मंदिर, किले, द्वीप और उनसे जुड़ी कहानियां बताते हैं कि कभी यहां पानी के साथ इतिहास और संस्कृति भी बसती थी। आज जरूरत सिर्फ इन तालाबों में पानी बचाने की, की जा रही है। तालाब के आसपास रहने वाले लोगों का आरोप है कि इन एतिहासिक तालाबों का स्थिति खराब है क्योंकि की यहाँ इन तालाबों की सफाई नहीं की जाती है।
कई विभागों के बीच फंसा है मदन सागर
तारा पाटकर बताते हैं कि मदन सागर झील कई विभागों के बीच फंसी हुई है। यही वजह है कि इसकी सफाई और रख-रखाव को लेकर परेशानी बनी हुई है। उनका कहना है कि नगर पालिका, सिंचाई विभाग और पुरातत्व विभाग के बीच जिम्मेदारी साफ नहीं होने से तालाब की हालत बिगड़ती जा रही है। लंबे समय से तालाबों की साफ-सफाई नहीं की गई है। तारा पाटकर क के अनुसार पहले सिंचाई विभाग मदन सागर में सिंघाड़े लगाने और मछली पकड़ने का ठेका देता था। सिंघाड़े की खेती करने वाले धीमर समुदाय के लोगों से भी इसका पैसा सिंचाई विभाग लेता था। ऐसे में नगर पालिका का कहना था कि जब सिंचाई विभाग इससे कमाई करता है तो तालाब की सफाई का खर्च नगर पालिका क्यों उठाए। नगर पालिका चाहती है कि मदन सागर की जिम्मेदारी उसे दे दी जाए। नगर पालिका का कहना है कि अगर झील उसके जिम्मे होगी तो वह उसकी सफाई और देखरेख कर सकती है। इस मुद्दे को लेकर एक बार जिलाधिकारी से भी बात हुई थी और अभी तक कोई रास्ता नहीं निकला है। प्रशासन भी जिम्मेदारी नगर पालिका को देने के लिए तैयार नहीं है।
मदन सागर में जलकुंभी की समस्या भी काफी बढ़ गई है। इसकी सफाई के लिए करीब 1.30 करोड़ रुपये की जलकुंभी निकालने वाली मशीन भी लाई गई थी। मशीन बहुत ज्यादा जलकुंभी होने पर ठीक से काम नहीं कर पाती। हल्की-फुल्की जलकुंभी निकालने में ही यह मशीन कारगर है नहीं तो नहीं। अगर समय पर तालाब की सफाई होती रहती तो समस्या इतनी बड़ी नहीं होती। लंबे समय से जलकुंभी जमा होने के कारण अब इसे हटाना भी मुश्किल हो गया है।
घूमने के लिए बनाया गया पुल भी खराब
मदन सागर का नजारा बहुत खूबसूरत है। एक तरफ गोरखगिरी पर्वत दिखाई देता है और उसकी तलहटी के पास मदन सागर फैला हुआ है। तालाब के बीच बना खखरा मठ भी यहां आने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है। लोगों को तालाब के आसपास घूमने और खखरा मठ तक जाने की सुविधा देने के लिए एक पुल भी बनाया गया था और अब वह पुल भी खराब हो चुका है। प्रशासन की ओर से उसकी देखरेख नहीं होने के कारण उस पर खर्च किए गए लाखों रुपये भी बेकार हो गए। वह लंबे समय से मदन सागर समेत महोबा के ऐतिहासिक तालाबों की सफाई और रखरखाव की मांग उठा रहे हैं। उनके मुताबिक अगर प्रशासन समय रहते इन तालाबों की जिम्मेदारी तय कर दे और नियमित सफाई की व्यवस्था करे तो इन ऐतिहासिक जलाशयों को बचाया जा सकता है।
तालाबों का इतिहास
महोबा के पुराने तालाबों का इतिहास 10वीं और 11वीं शताब्दी तक जाता है। यहां के ज्यादातर बड़े तालाब चंदेल शासन काल में बनाए गए थे। उस समय महोबा में बड़ी नदियां नहीं थीं। छोटी नदियां गर्मियों में सूख जाती थीं इसलिए पानी की जरूरत पूरी करने के लिए राजाओं ने तालाब और बांध बनवाए।
महोबा के ऐतिहासिक तालाबों का निर्माण चंदेल शासन के दौरान हुआ था। महोबा जिला प्रशासन के मुताबिक, चंदेल राजा कीर्ति वर्मन ने 11वीं शताब्दी में कीरत सागर का निर्माण कराया था। राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के दस्तावेज में इसके निर्माण की अवधि 1063 से 1079 ई. के बीच बताई गई है। इसके बाद चंदेल राजा मदन वर्मन के समय मदन सागर का निर्माण हुआ, जिसका निर्माण 1129 से 1165 ई. के बीच बताया गया है। ये तालाब उस समय की जल व्यवस्था और स्थापत्य परंपरा का हिस्सा थे। महोबा में आज भी कीरत सागर और मदन सागर जैसे चंदेलकालीन जलाशय मौजूद हैं और दोनों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की संरक्षित स्मारकों की सूची में शामिल किया गया है।
लोगों द्वारा श्रम दान कर बनाई गई जलकुंभी
महोबा के तालाबों की सफाई को लेकर स्थानीय लोगों ने कई बार खुद पहल की है। लोगों द्वारा एक साथ मिलकर कीरत सागर से जलकुंभी निकालने के लिए कई बार श्रमदान अभियान चलाया। तालाब में जलकुंभी काफी फैल गई थी। लोगों के लगातार सफाई करने के बाद प्रशासन का भी ध्यान इस ओर गया और कीरत सागर से जलकुंभी हटाने का काम कराया गया। अब कीरत सागर की स्थिति पहले से कुछ बेहतर है पर मदन सागर और कल्याण सागर की हालत अभी भी खराब है।
इन पांच तालाबों में विजय सागर सबसे बड़ा है। यह करीब 5 से 6 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसे बीजानगर के नाम से भी जाना जाता है। विजय सागर में पक्षी विहार भी बनाया गया है और ये प्रदेश के प्रमुख पक्षी विहारों में शामिल है। फिलहाल विजय सागर की देखरेख वन विभाग के पास है। यह क्षेत्र कैमूर वन्यजीव विहार के अंतर्गत आता है जिसका मुख्यालय मिर्जापुर में है। वहां के डीएफओ भी मिर्जापुर में ही बैठते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अधिकारी का मुख्यालय महोबा से दूर होने के कारण विजय सागर की नियमित देखरेख नहीं हो पाती। अगर इसकी जिम्मेदारी स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों के पास होती और वे नियमित रूप से यहां आते-जाते तो शायद तालाब और पक्षी विहार की स्थिति बेहतर होती। महोबा के इन तालाबों की सफाई और देखरेख की जिम्मेदारी अलग-अलग विभागों के बीच बंटी हुई है। महोबा को अगर सिर्फ आल्हा-उदल की वीर भूमि चंदेलों की राजधानी या कजली मेले के शहर के रूप में देखा जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी। महोबा की असली पहचान उसके किलो मंदिरों और वीरगाथाओं के साथ-साथ उन तालाबों से भी बनी है जिन्हें चंदेल शासको ने सदियों पहले बनाया था। पर उसकी स्थिति का कोई देख-रेख नहीं।
कुछ छोटे तालाब तो विलुप्त हो गए यहां
महोबा के स्थानीय निवासी इंदल रैकवार के मुताबिक चंदन तालाब पूरी तरह खत्म हो चुकी है जबकि छत्तल तालाब भी धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो रही है। उनका कहना है कि छत्तल तलैया में जो रास्ता बचा हुआ है वह बरसात के दिनों में पानी में डूब जाता है। मेले के समय यहां लोगों की भीड़ बढ़ जाती है जिससे आने-जाने में और परेशानी होती है। नगर पालिका के कुछ कर्मचारी वहां आए थे। उन्होंने बताया था कि इस काम के लिए 50 लाख रुपये से ज्यादा की राशि आई है। इंदल का कहना है कि मौके पर सड़क बनाने के लिए करीब 10 डंपर मिट्टी ही डाली गई होगी। जितना काम जमीन पर दिखाई देता है उससे लगता है कि पूरी मंजूर राशि खर्च नहीं हुई है। “जब तालाबों और उनसे जुड़े कामों के लिए पैसा आता है तो उसका असर जमीन पर क्यों नहीं दिखाई देता।”
पानी इतना गंदा की नहाना मुश्किल
स्थानीय निवासी मुन्ना से जानकारी मिली कि इसी तालाब से आसपास के घरों में पानी की सप्लाई होती है। पाइपलाइन से जब पानी घरों तक पहुंचता है तो उसमें बदबू आती है। इसलिए लोग इस पानी का इस्तेमाल कपड़े धोने, बर्तन साफ करने और घर के दूसरे कामों के लिए करते हैं। पीने के लिए लोगों को करीब 10 रुपये में पानी का डिब्बा खरीदना पड़ता है। जो लोग रोज तालाब में नहाते हैं उन्हें शायद इसकी आदत हो गई है। लेकिन कभी-कभार नहाने वाले लोगों को पानी से परेशानी होती है। तालाब के पानी से नहाने पर शरीर में दाने निकल आते हैं इसलिए कई लोग नहाने से बचते हैं। किसी की मृत्यु होने पर दाह संस्कार के बाद नहाना जरूरी होता है ऐसे समय में लोगों को मजबूरी में इसी पानी का इस्तेमाल करना पड़ता है।
नगर पालिका भी झाड़ रहा अपना पल्ला
महोबा नगर पालिका अध्यक्ष संतोष चौरसिया इस विषय में बात करने पर कहती हैं कि तालाब के रखरखाव और मेंटेनेंस की जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग की है। नगर पालिका अपने स्तर पर इसमें कोई बड़ा काम नहीं कर सकती। हालांकि साफ-सफाई का काम हर साल कराया जाता है। “जलकुंभी ऐसी चीज है कि एक पौधा भी बच जाए तो वह धीरे-धीरे पूरे तालाब में फैल जाता है। इसलिए हर साल इसकी सफाई करानी पड़ती है।”
संतोष चौरसिया के मुताबिक इस साल भी तालाब की सफाई कराई गई है। इसके लिए मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है और जरूरत के हिसाब से कर्मचारियों की मदद से भी जलकुंभी हटाई जाती है। सफाई का काम समय-समय पर चलता रहता है।
मदन सागर के पास रहने वाली राजा बाई बताती हैं कि तालाब का नाम भले ही मदन सागर है पर आज इसकी हालत उसके नाम जैसी नहीं दिखती। “हमारा बचपन यहीं बीता है। पहले सहेलियों के साथ तालाब में नहाने और कपड़े धोने आती थीं। दो-दो घंटे पानी में डूबी रहती थीं। अब समय बदल गया है। आज वह तालाब पर सिर्फ कपड़े धोने के लिए आती हैं। चाहते हैं कि तालाब की सफाई हो पर नगर पालिका की ओर से इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है।” शादी-विवाह या दूसरे जरूरी कामों के समय तालाब से अनाज और पानी लाने के लिए लोगों को यहां आना ही पड़ता है। जलकुंभी इतनी बढ़ गई है कि लोग उसे हाथ से हटाकर किसी तरह पानी तक पहुंचते हैं और कपड़े धोते हैं और बस इसी तरह से तालाब और जीवन चल रहा है।
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