खबर लहरिया Blog Killings of Dalits: दलितों पर हमले जारी, जून में सामने आए तीन मामले, क्या आंकडे पूरी सच्चाई बताते हैं? 

Killings of Dalits: दलितों पर हमले जारी, जून में सामने आए तीन मामले, क्या आंकडे पूरी सच्चाई बताते हैं? 

इस जून के महीने के भीतर दलित युवकों के साथ हिंसा और मारपीट की तीन घटनाएँ सामने आईं हैं। इन घटनाओं में दलित युवकों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया, पीटा गया और जाति को लेकर निशाना बनाया गया। ये केवल वे मामले हैं जो कैमरे में रिकॉर्ड हुए या सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंच पाए। ऐसे कई मामले अक्सर सामने ही नहीं आ पाते हैं। 

सांकेतिक तस्वीर (तस्वीर साभार: एआई)

पहली घटना, उत्तरप्रदेश ललितपुर से 

पहला मामला उत्तरप्रदेश के ललितपुर जिले से है जहां 33 वर्ष के एक दलित व्यक्ति की कथित तौर पर पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। पीटीआई के रिपोर्ट अनुसार मृतक राजकुमार अपने कुछ दोस्तों के साथ पार्टी में शामिल होने गए हुए थे। मृतक के दो और सहयोगी सम्यक राजनायक, गजेंद्र नरवारिया और गौरव रैकवार भी वहां मौजूद थे। तीनों व्यक्ति नशे में डूबे हुए थे। इन तीनों व्यक्तियों द्वारा मृतक राजकुमार से अपने पैरा में मालिश करने के लिए कहा गया। जब राजकुमार द्वारा पैर मालिश करने पर इनकार किया गया तो तीनों लोगों ने उस पर बेल्ट और लोहे की रॉड से हमला किया गया जिसके बाद राजकुमार की मौत हो गई। बाद में आरोपियों द्वारा शव को सड़क पर फेंक दिया गया ताकि मौत को सड़क दुर्घटना बताया जा सके। राजकुमार के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है जिसकी जांच और आगे की क़ानूनी कार्यवाही चल रही है। वहीं आरोपियों को गिरफ़्तार कर लिया गया है और कथित तौर पर उन लोगों ने अपराध कबूल लिया है। 

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दूसरा मामला उत्तराखंड चंपावत जिले से 

उत्तराखंड के चंपावत जिले के लोहाघाट क्षेत्र में कम किराए पर सवारी ले जाने को लेकर हुए विवाद में टैक्सी चालक के साथ कथित तौर पर अमानवीय व्यवहार किया गया। आरोप है कि अन्य टैक्सी चालकों द्वारा दलित टैक्सी चालक के साथ मारपीट की गई और जूते चप्पल का माला पहनाकर दुर्व्यवहार किया गया। दरअसल प्रेम राम नाम के व्यक्ति लोहाघाट से दिल्ली जाने वाले यात्रियों को पुराने निर्धारित किराए पर ले जा रहे थे। आरोप है कि कुछ अन्य टैक्सी चालकों द्वारा उनके वाहन को रोक लिया गया। जिसके बाद जातिसूचक गाली देकर मारपीट की गई। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि आरोपियों द्वारा उनसे 50 हजार रुपए मांगे गए। साथ ही मोबाइल फ़ोन छिन लिया गया और वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाल दिया गया। 

मूकनायक के रिपोर्ट अनुसार घटना का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल होने के बाद पुलिस द्वारा संज्ञान लेते हुए कार्यवाही की गई और पुलिस द्वारा चार आरोपियों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई। वहीं प्रेम राम फिलहाल दिल्ली में हैं। 

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तीसरा मामला उत्तराखंड टिहरी गढ़वाल जिले से 

उत्तराखंड के टिहरी गड़वाल में एक दलित युवक की कथित तौर पर मारपीट कर हत्या कर दी गई जिसका मामला प्रेम प्रसंग बताया गया। बीबीसी के रिपोर्ट अनुसार मृतक केतन 17 साल का था जिसके एक नाबालिग लड़की के साथ दोस्ती थी। कथित तौर पर लड़की के फोन से केतन को बुलाया गया और केतन अपने दोस्त डिमरी के साथ वहां पहुंचा। यह बात लड़की के परिजन को पता लग गई। जिसके बाद मृतक के परिजनों का आरोप है कि दोनों युवकों को बंधक बना कर पीटा गया जिसके बाद युवक की मौत हो गई। इस मामले के बाद लड़की के पिता यशवीर सिंह पंवार और और लड़की के दादा विद्या सिंह पंवार को गिरफ़्तार किया जा चुका है दोनों को कोर्ट में पेश करने के बाद न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाएगा। परिवार वालों का आरोप है कि उनके बेटे को अनुसूचित जाति के होने के कारण निशाना बनाया गया। फिलहाल मामले की जांच जारी है, तथ्य सामने आने पर आगे की कानूनी कार्यवाही की जाएगी। 

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ये घटनाएं एक बार फिर याद दिलाती हैं कि देश में जातिगत भेदभाव की जड़ें आज भी बहुत मजबूत हैं। दलित, बहुजन और आदिवासी समुदाय के लोग रोजमर्रा की ज़िंदगी में भेदभाव, अपमान और हिंसा का सामना कर रहे हैं। आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं जो जातिगत प्रथाओं को आगे बढ़ाने में पूरी मदद देते हैं। 

हालाँकि हाल ही में जारी NCRB 2024 की रिपोर्ट के अनुसार जाति (एससी) समुदाय के खिलाफ दर्ज अपराधों में हल्की कमी दिखाई गई है। साल साल 2024 में ऐसे 55,698 मामले दर्ज हुए, जबकि 2023 में यह संख्या 57,789 थी। यानी करीब 3.6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। लेकिन अगर हालत बेहतर हो रहे हैं तो दलितों पर हमलों और उत्पीड़न की खबरें लगातार क्यों सामने आ रही हैं? अगर देखा जाए तो ये सरकारी रिपोर्ट 2024 की है यानी 2026 तक इस तरह के घटनाओं में बढ़ोत्तरी देखे जाने की संभावनाएँ हैं। 

वहीं यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सरकारी आँकड़ों में केवल वही मामले शामिल होते हैं जिनकी शिकायत दर्ज होती है। बड़ी संख्या में ऐसे मामले भी होते हैं जो डर, दाबव या सामाजिक प्रभाव के कारण कभी पुलिस रिकॉर्ड तक नहीं पहुंच पाते। इसलिए आकंडों में दिखाई देने वाली कमी को पूरी तरह स्वीकार नहीं माना जा सकता। 

देखा जाए तो 17 जनवरी 2016 को हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोधार्थी रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद देशभर में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव पर व्यापक बहस छिड़ी थी। लेकिन वर्षों बाद भी जमीनी स्थिति में बहुत बदलाव दिखाई नहीं देता। दलितों के खिलाफ सामाजिक भेदभाव और हिंसा आज भी समाज की एक गंभीर सच्चाई बनी हुई है। 

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