जंतर-मंतर पर छात्र पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। इसी दौरान सोशल मीडिया पर “आरक्षण हटाओ” की बहस तेज़ हो गई। क्या यह सिर्फ़ एक संयोग था या लोगों का ध्यान असली मुद्दों से हटाने की कोशिश? 25 जुलाई को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा। ये सफलता देश के युवाओं को एक महीने नहीं, बल्कि सालों के संघर्ष के बाद मिली है। ज़रूर, एक मंत्री के इस्तीफ़े से कल से सारे स्कूलों में पंखे नहीं लग जाएँगे, स्कूलों के टॉयलेट साफ़ नहीं हो जाएँगे या बारिश में वहाँ पानी टपकना बंद नहीं हो जाएगा। लेकिन इससे इन मुद्दों पर सवाल पूछने की हिम्मत बनी है। जैसे फतेहपुर में बच्चों ने अपने स्कूल के बाहर प्रदर्शन कर क्लास में 4 पंखे, बिजली की वायरिंग की मरम्मत, डेस्क और बेंच उपलब्ध कराने और आरओ वॉटर कूलर लगाने की माँग की। उनकी बात सुननी पड़ी और अब बच्चों को लिखित आश्वासन मिला है कि उनकी माँगें पूरी होंगी। मगर ज़रूरी नहीं है कि फतेहपुर के स्कूल के बच्चों की तरह हर माँग समझदार माँग हो। उच्च जातियों के कुछ लोगों ने “आरक्षण हटाओ आंदोलन” की माँग शुरू कर दी है। इस वीडियो में कविता बुंदेलखंडी बात कर रही हैं कि कैसे शिक्षा व्यवस्था की बदहाली, छात्रों के आंदोलन और आरक्षण विरोधी अभियान एक ही समय में सामने आए। साथ ही, “मेरिट” की बहस, जाति से मिलने वाले सामाजिक विशेषाधिकार, IIT-IIM और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रतिनिधित्व, मीडिया में दलितों की हिस्सेदारी और आरक्षण के उद्देश्य पर भी विस्तार से चर्चा की गई है।
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