खबर लहरिया Blog Chhattisgarh: शादी से बचने के लिए पढ़ाई, पढ़ाई जारी रखने के लिए नौकरी, पिंकी, डिंपल, रवि की आज़ादी की कहानी 

Chhattisgarh: शादी से बचने के लिए पढ़ाई, पढ़ाई जारी रखने के लिए नौकरी, पिंकी, डिंपल, रवि की आज़ादी की कहानी 

छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों से आंखों में बड़े सपने लेकर शहर पहुंचने वाले कई छात्र पढ़ाई के साथ नौकरी, पार्ट टाइम काम या छोटे-मोटे रोजगार करते हैं। उनके लिए शहर सिर्फ शिक्षा और अवसरों की जगह नहीं होती रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने की एक नई चुनौती भी है। दिन में काम, उसके बाद पढ़ाई और फिर अगले दिन की तैयारी इस दिनचर्या के बीच वे अपने भविष्य के लिए लगातार मेहनत करते रहते हैं। 

रिपोर्ट – सोमा, लेखन – रचना

कक्षा में पढ़ते छात्रों की सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार:सोमा)                              

“मेरे लिए नौकरी और पढ़ाई दोनों आजादी का एक रास्ता हैं। अगर मैं घर पर रहूंगी तो घर वाले मेरी शादी करा देंगे। इसलिए मैं पढ़ाई कर रही हूं और अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए अपने खर्चे खुद उठाने के लिए नौकरी करती हूं जिससे घर और समाज के लोगों को लगे कि लड़की पढ़ रही है और नौकरी कर रही है।” ना ही ये किसी किताब की लाइन है और न ही किसी फिल्म का संवाद। ये पिंकी के अपने शब्द हैं और उसकी आजादी की कहानी भी। ऐसी आजादी जिसे वह पढ़ाई और नौकरी के सहारे हासिल करना चाहती है।

असल में शहर की भागती हुई जिंदगी में कुछ युवा ऐसे भी हैं जिनके एक हाथ में किताबें हैं और दूसरे हाथ में काम की जिम्मेदारियां। सुबह पढ़ाई के लिए निकलने वाले ये युवा दिन का एक हिस्सा कमाने में बिताते हैं ताकि अपनी पढ़ाई का खर्च उठा सकें और घर की जरूरतों में भी हाथ बंटा सकें। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के इन युवाओं के लिए पढ़ाई का सपना आसान नहीं होता। उन्हें अपनी जरूरतों को पीछे छोड़कर कई बार पढ़ाई के साथ काम करना पड़ता है। शिक्षा को बेहतर भविष्य की सबसे मजबूत नींव माना जाता है। हर विद्यार्थी चाहता है कि उसे सीखने, आगे बढ़ने और अपने भविष्य को बेहतर बनाने का समान अवसर मिले। पर आर्थिक स्थिति कमजोर होने पर यही सपना कई जिम्मेदारियों के बीच दबने लगता है। बढ़ती महंगाई के दौर में किराया, खाना, आने-जाने का खर्च, फीस, किताबें और दूसरी शैक्षणिक जरूरतें परिवारों पर अतिरिक्त बोझ डालती हैं। ऐसे में कई युवा अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए खुद कमाने का रास्ता चुनते हैं।

बड़े शहरों में आने वाले युवाओं की कहानी भी इससे अलग नहीं है। छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों से आंखों में बड़े सपने लेकर शहर पहुंचने वाले कई छात्र पढ़ाई के साथ नौकरी, पार्ट टाइम काम या छोटे-मोटे रोजगार करते हैं। उनके लिए शहर सिर्फ शिक्षा और अवसरों की जगह नहीं होती रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने की एक नई चुनौती भी है। दिन में काम, उसके बाद पढ़ाई और फिर अगले दिन की तैयारी इस दिनचर्या के बीच वे अपने भविष्य के लिए लगातार मेहनत करते रहते हैं। 

पढ़ाई आज़ादी का एक मात्र सहारा 

कुछ ऐसी ही कहानी है पिंकी की जो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के भनपुरी में रहती है। 23 वर्षीय पिंकी साहू रायपुर के बिरगांव स्थित शहीद नंद कुमार पटेल कॉलेज में सेकेंड ईयर की छात्रा हैं। वह नॉन-कॉलेज से आर्ट्स की पढ़ाई कर रही हैं। पिंकी के दिन की शुरुआत सुबह छह बजे होती है। उठने के बाद वह घर के कामों में अपनी मां की मदद करती हैं। खाना बनाने, झाड़ू-पोछा और बर्तन धोने जैसे काम पूरे करने के बाद वह नौकरी के लिए निकलती हैं। पिंकी सुबह नौ बजे से शाम सात बजे तक LNDP नाम की कंपनी में कंप्यूटर ऑपरेटर के तौर पर काम करती हैं। इस नौकरी से उन्हें हर महीने छह हजार रुपये मिलते हैं। पिंकी बताती हैं कि उन्हें पढ़ने का बहुत मन है पर परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। इसलिए वह अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाने के लिए नौकरी के साथ-साथ पढ़ाई भी करती हैं।

दिनभर नौकरी करने के बाद जब पिंकी घर लौटती हैं तब भी उनकी जिम्मेदारियां खत्म नहीं होतीं। घर के काम पूरे करते-करते शाम कब रात में बदल जाता है पता ही नहीं लगता। पिंकी कहती हैं “जब दिनभर नौकरी करने के बाद घर आती हूं तो पूरी तरह थक जाती हूं। नौकरी से आने के बाद घर का काम करते-करते 10 बज जाते हैं। पढ़ने के लिए मेरे पास रात का समय तो होता है पर शरीर में हिम्मत नहीं बचती मन थकता है सो अलग। पढ़ाई के लिए भी शांत मन की जरूरत होती है जो बचती नहीं है। फिर भी एक-दो घंटे निकालकर मैं फोन में गूगल से पढ़ाई करती हूं क्योंकि मुझे अपनी पढ़ाई भी पूरी करनी है।” पिंकी की दिनचर्या में पढ़ाई के लिए कोई तय समय नहीं है। तमाम जिम्मेदारियाँ पूरा करने के बाद बाद जो एक-दो घंटे बचते हैं और वही उसके पढ़ने का समय होता है। 

पिंकी अगर वह चाहें तो सिर्फ पैसे कमा सकती हैं या फिर सिर्फ पढ़ाई कर सकती हैं पर पिंकी के लिए नौकरी और पढ़ाई दोनों अहम हैं और उससे बड़ी चीज़ है उसकी आज़ादी। “मेरे लिए नौकरी और पढ़ाई दोनों आजादी का एक रास्ता हैं। अगर मैं घर पर रहूंगी तो घर वाले मेरी शादी करा देंगे। इसलिए मैं पढ़ाई कर रही हूं और अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए अपने खर्चे खुद उठाने के लिए नौकरी करती हूं जिससे घर और समाज के लोगों को लगे कि लड़की पढ़ रही है और नौकरी कर रही है। मेरे लिए शिक्षा बहुत जरूरी है। अगर मैं कॉलेज पूरा कर लेती हूं तो भविष्य में मेरे पास कहीं भी नौकरी करने का मौका होगा। इसलिए मैं अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती हूं। नौकरी मुझे एक इंडिपेंडेंट लड़की होने का एहसास दिलाती है। इसलिए मैं इन सारी समस्याओं का सामना करते हुए पढ़ाई और नौकरी दोनों करूंगी।” 

ये तो रही पिंकी की कहानी। एक दूसरी पिंकी भी है जिसकी कहानी इस पिंकी से बहुत अलग नहीं है और उसका नाम है डिंपल। 

डिंपल की पढ़ाई और काम को लेकर अपनी एक अलग कहानी 

छत्तीसगढ़ के रायपुर के मोवा-सड्डू की रहने वाली 21 वर्षीय डिम्पल यादव की कहानी भी नई नहीं है जो पढ़ाई के साथ नौकरी करती हैं। वो सेकेंड ईयर की नॉन-कॉलेज (यानी ये पढ़ाई का वो तरीका है जिसमें विद्यार्थी को रेगुलर रूप से रोज कॉलेज जाने या कक्षाएं लेने की आवश्यकता नहीं होती। छात्र घर रहकर सीधे परीक्षा का फॉर्म भरकर यूनिवर्सिटी की मुख्य परीक्षाओं में शामिल होते हैं।) छात्रा हैं और आर्ट्स से पढ़ाई कर रही हैं इसके अलावा डिम्पल एक निजी स्कूल में छोटे बच्चों को पढ़ाती भी हैं। सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के बदले उन्हें हर महीने छह हजार रुपये मिलते हैं।

डिम्पल की दिनचर्या में पढ़ाई और नौकरी के बीच कोई आसान रास्ता नहीं है। परीक्षा के दिनों में उन्हें नौकरी से कॉलेज जाना पड़ता है वहां परीक्षा देने के बाद वापस नौकरी पर लौटना होता है। जिस स्कूल में वह पढ़ाती हैं वहां परीक्षा के लिए उनके पैसे नहीं काटे जाते लेकिन उन्हें पूरे दिन की छुट्टी भी नहीं मिलती। इसलिए परीक्षा के दिन भी उन्हें पढ़ाई और नौकरी दोनों के बीच समय बांटना पड़ता है।

डिम्पल बताती हैं कि नॉन-कॉलेज छात्रों का हर जगह एडमिशन नहीं हो पाता। रायपुर में भी नॉन-कॉलेज से पढ़ाई करने का विकल्प सीमित है। इसलिए उन्हें बिरगांव स्थित कॉलेज आना पड़ता है। सड्डू से बिरगांव स्थित कॉलेज की दूरी करीब 18 किलोमीटर है। अब रोजमर्रा की नौकरी के साथ इतनी दूर कॉलेज आना-जाना उनके लिए आसान नहीं तो नहीं है पर पढ़ाई पूरी करने और आगे चलकर इंडिपेंडेंट बनने के लिए वह इन चुनौतियों का सामना कर रही हैं। डिम्पल नौकरी अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाने के लिए करती हैं। उनका कहना है कि घर में चार भाई-बहन हैं। अगर चारों बच्चे सिर्फ पढ़ाई करें तो परिवार के लिए सभी की पढ़ाई का खर्च उठाना मुश्किल हो जाएगा और माता-पिता पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। इसलिए 12वीं तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नौकरी के साथ अपनी पढ़ाई जारी रखने का रास्ता चुना।

डिम्पल चाहती हैं कि उनकी पढ़ाई बीच में न रुके और वह अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। देखा जाए तो एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में चार बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना माता-पिता के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में डिम्पल अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाकर परिवार की मुश्किलों को कम करने और अपने सपने को पूरा करने की कोशिश कर रही हैं।

पढ़ाई के साथ दूध का पैकेट बेचने का काम आसान तो नहीं 

रवी साहू जो भी रायपुर के रहने वाले हैं, 23 वर्ष के हैं और नॉन-कॉलेज के छात्र भी हैं। रवी आर्ट्स से पढ़ाई कर रहे हैं और उनका तीसरा साल पूरा होने वाला है। रवी अपनी पढ़ाई के साथ नौकरी भी करते हैं जिससे उन्हें हर महीने आठ हजार रुपये मिलते हैं। रवी बताते हैं कि पढ़ाई के लिए घर से उन्हें ज्यादा मदद नहीं मिल पाता। इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई छोड़ने का रास्ता नहीं चुना। उन्हें आगे पढ़ना है और अपने लिए कुछ बेहतर करना है। इसी सोच के साथ उन्होंने नौकरी शुरू की ताकि अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठा सकें और अपने सपनों को किसी के सहारे का मोहताज न बनाना पड़े। 

रवी वो काम करते हैं जिसे आज के समय में शायद कई लोग छोटा या मजाक की नजर से देखते हैं। रवी पैकेट वाला दूध बेचते हैं। सुबह जिन दुकानों से दूध का ऑर्डर होता है वहां वे दूध के पैकेट पहुंचाते हैं। काम पूरा करने के बाद अपनी कॉलेज की पढ़ाई के लिए समय भी निकालते हैं। अपनी नौकरी और पढ़ाई को साथ लेकर चलते हुए उन्होंने अपनी कॉलेज की पढ़ाई लगभग पूरी कर ली है। अब आने वाले साल में रवी आईटीआई में एडमिशन लेना चाहते हैं। उनका सपना है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद एक अच्छी नौकरी करें और अपने जीवन को बेहतर बनाएं। रास्ता आसान तो नहीं है उसने आगे बढ़ने का मन बना लिया है। 

इन तीनों कहानियों को जोड़ने वाला हिस्सा पता है क्या है पढ़ाई, शिक्षा और महंगाई। इन युवाओं की जिंदगी में पढ़ाई और काम दो अलग-अलग हिस्से नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। काम इसलिए जरूरी है क्योंकि उससे पढ़ाई जारी रखने का खर्च निकलता है और पढ़ाई इसलिए जरूरी है क्योंकि उसी से बेहतर भविष्य की उम्मीद जुड़ी है और आगे इतनी मेहनत न करने पड़े। कई बार काम के लंबे घंटे पढ़ाई के लिए मिलने वाले समय को कम कर देते हैं इसके बावजूद ये युवा अपने सपनों को छोड़ने के बजाय रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं।

महंगाई और पढ़ाई का रिश्ता

महंगाई और पढ़ाई का रिश्ता साफ दिखाई देता है। स्कूलों कॉलेजों में देखें तो एक वर्ग के युवा के पास घर से आर्थिक मदद है इसलिए उसके पास पढ़ने के लिए पूरा दिन और पूरा व्यवस्था है। दूसरा युवा सुबह काम करता है फिर कॉलेज जाता है और रात में पढ़ता है। दोनों के हाथ में किताब एक जैसी है, दोनों की मंजिल भी पढ़ाई पूरी करना है पर पढ़ने का समय और परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। कॉलेज में सेमेस्टर एग्जाम, इंटरनल, प्रैक्टिकल, प्रोजेक्ट और असाइनमेंट होते हैं, तो उन्हें नौकरी से समय निकालना पड़ता है। इंटरनल एग्जाम के लिए कोई छात्र ऑफिस से छुट्टी लेकर दोपहर में कॉलेज जाता है और परीक्षा देने के बाद वापस नौकरी पर लौटता है। कई बार इन कुछ घंटों की छुट्टी का असर उसकी सैलरी पर भी पड़ता है। असाइनमेंट और प्रोजेक्ट जमा करने के लिए लंच के समय कॉलेज जाना पड़ता है और मुख्य परीक्षा के दिन नौकरी से छुट्टी लेनी पड़ती है। यानी पढ़ाई के लिए निकाला गया हर घंटा कहीं न कहीं उसकी कमाई से भी जुड़ा है। एक वर्ग के लिए किताब खरीदना कोई बड़ी बात नहीं दूसरे वर्ग के लिए किताब, फीस देना, प्रैक्टिकल करना, यानी एक महीने की मेहनताना। 

नॉन-कॉलेज छात्रों के लिए सुविधाओं की कमी

नॉन-कॉलेज जहां पिंकी, रवी और डिंपल तीनों पढ़ाई करते हैं और उनका कहना है कि पढ़ाई जारी रखने के बावजूद उन्हें कॉलेज में रेगुलर छात्रों जैसी सुविधाएं नहीं मिलती हैं। नॉन-कॉलेज छात्रों की हर दिन क्लास नहीं लगती। कॉलेज की तरफ से सभी छात्रों का एक ग्रुप बनाया जाता है जिसमें उनके मोबाइल नंबर जोड़े जाते हैं और इसी ग्रुप के जरिए कॉलेज से जुड़ी जानकारी और जरूरी संदेश भेजे जाते हैं। उन्हें कॉलेज की तरफ से नियमित नोट्स भी नहीं मिलते। वहीं रेगुलर छात्रों की हर दिन क्लास लगती है जिससे उन्हें विषय समझने और नोट्स बनाने में शिक्षकों की मदद मिलती रहती है। नॉन-कॉलेज छात्रों को अपनी पढ़ाई ज्यादातर खुद ही करनी पड़ती है। वे गूगल के माध्यम से विषयों से जुड़ी जानकारी खोजकर पढ़ते हैं। बिना शिक्षक के किसी विषय को समझने में ज्यादा समय लगता है और इसके लिए उन्हें रेगुलर छात्रों की तुलना में ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है। यही अंतर नॉन-कॉलेज छात्रों के लिए पढ़ाई को और चुनौतीपूर्ण बना देता है।

इसमें स्कॉलरशिप का ऑप्शन तो होता है लेकिन नॉन कॉलेज छात्रों के लिए ये ऑप्शन नहीं होता हैं। साथ ही सरकारी कॉलेज में एडमिशन इसलिए भी नहीं होता है क्योंकि हर कॉलेज में नॉन कॉलेज छात्रों की एडमिशन के लिए शीट नहीं दिया जाता है नॉन कॉलेज प्राइवेट छात्रों की एडमिशन के लिए हर कॉलेज में सीट नहीं होती है। किसी किसी कॉलेज को नॉन कॉलेज छात्रों के लिए सेंटर के रूप में दिया जाता है। 

नॉन-कॉलेज (प्राइवेट) एडमिशन लेने की वजह

छत्तीसगढ़ के रायपुर और बिरगांव के आसपास बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है। यहां अलग-अलग राज्यों, जिलों और गांवों से लोग रोजगार की तलाश में प्रवासी मजदूर के रूप में आते हैं और आसपास की फैक्ट्रियों और कंपनियों में काम करते हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की भी है जो नौकरी के साथ अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहते हैं। यही वजह है कि इन नॉन-कॉलेज कॉलेज में हर साल करीब 1,500 से 2,000 छात्र नॉन-कॉलेज यानी प्राइवेट छात्र के तौर पर दाखिला लेते हैं। इनमें बीए, बीकॉम, बीएससी सहित अलग-अलग पाठ्यक्रमों के विद्यार्थी शामिल हैं।

इतना ही नहीं कॉलेज में रेगुलर छात्रों के लिए सीटें सीमित हैं जबकि नॉन-कॉलेज छात्रों के लिए आवेदन करने की अनुमति अपेक्षाकृत ज्यादा है। इसका एक कारण यह भी है कि यह कॉलेज नॉन-कॉलेज छात्रों की मुख्य परीक्षाओं के लिए प्रमुख केंद्रों में से एक है। ऐसे में यहां पढ़ने वाले छात्रों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जो नियमित रूप से कॉलेज नहीं आ सकती पर पढ़ाई छोड़ना भी नहीं चाहती। जिन प्राइवेट छात्रों से बातचीत हुई उनकी परिस्थितियां एक-दूसरे से अलग थीं। कोई नौकरी के साथ पढ़ाई कर रहा है कोई परिवार की जिम्मेदारियां संभाल रहा है तो कोई आर्थिक मजबूरियों के बावजूद अपनी पढ़ाई जारी रखने की कोशिश कर रहा है। इन सभी में एक बात समान थी वो है अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ना नहीं चाहते।

जब किसी छात्र-छात्राओं को किताब खोलने से पहले यह सोचना पड़े कि महीने का किराया कैसे निकलेगा, कॉलेज की फीस कहां से आएगी या घर पैसे कैसे भेजने हैं तब पढ़ाई उसके लिए केवल सीखने की प्रक्रिया नहीं रह जाती संघर्ष का हिस्सा बन जाती है। क्या उच्च शिक्षा व्यवस्था ऐसे छात्रों की जरूरतों को समझ पा रही है? क्या काम करने वाले, प्रवासी परिवारों से आने वाले या आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए ऐसी व्यवस्था है जिससे वे नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों के साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रख सकें?

देश में शिक्षा की मौजूदा स्थिति को देखें तो गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के युवाओं के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंचना आज भी आसान नहीं है। कई बार घर की आर्थिक स्थिति और रोजगार की जरूरत उन्हें पढ़ाई बीच में छोड़ने के लिए मजबूर कर देती है। यही युवा बाद में रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों की ओर पलायन करते हैं और उपलब्ध काम के आधार पर अपनी जिंदगी आगे बढ़ाते हैं। इसका असर अगली पीढ़ी पर भी पड़ता है। जो माता-पिता खुद पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते या कम आय वाली मजदूरी पर निर्भर रहते हैं उनके लिए अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना भी मुश्किल हो जाता है। इस तरह आर्थिक मजबूरी और शिक्षा से दूर होने का यह चक्र एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता रहता है।

पिंकी और डिम्पल जैसे युवा इस चक्र को तोड़ने की कोशिश करते हैं। उनकी कहानियां दिखाती हैं कि मेहनत और पढ़ने की इच्छा की कमी नहीं है कमी कई बार उन सुविधाओं की होती है जो इन छात्रों को आगे बढ़ने में मदद कर सकें। जब ये युवा अपने भविष्य के लिए इतना संघर्ष करने को तैयार हैं तो पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें हर कदम पर इतनी मुश्किलों का सामना क्यों करना पड़ रहा है? क्या शिक्षा व्यवस्था ऐसी हो सकती है जहां आर्थिक मजबूरी किसी युवा के सपने और पढ़ाई के बीच दीवार न बने? 

 

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