केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर को मंगलवार यानी 12 मई 2026 को राजनगर कोर्ट से जमानत मिलने के बाद लापता होने की खबर आई। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर को लेकर विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है।
यह मामला अब सिर्फ उनकी हिरासत तक सीमित नहीं रह गया है अब यह मामला केन-बेतवा लिंक परियोजना, पन्ना टाइगर रिजर्व, आदिवासियों के विस्थापन, मुआवजे और उनके अधिकारों जैसे कई बड़े मुद्दे जुड़ गए हैं।
अमित भटनागर काफी समय से केन-बेतवा लिंक परियोजना और रुंझ डैम से प्रभावित आदिवासी परिवारों के समर्थन में आवाज उठा रहे थे। वे पुनर्वास, मुआवजा और वन अधिकारों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। 8 मई 2026 को प्रदर्शन के दौरान आंदोलन के नेता अमित भटनागर समेत 9 किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के विरोध में जिले के कई गांवों से हजारों किसान सड़कों पर उतर आए और पन्ना एसपी कार्यालय का घेराव कर रातभर धरना दिया। आंदोलन को राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है। इसी बीच सोमवार को जेल से बाहर आने के बाद उनके अचानक गायब होने की खबर सामने आई जिसके बाद पूरे मामले ने और ज्यादा तूल पकड़ लिया।
केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर को मंगलवार यानी 12 मई 2026 को राजनगर कोर्ट से जमानत मिल गई लेकिन जेल से बाहर आने के कुछ देर बाद ही उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई यानी गायब होने का शक जताया गया जिससे इलाके में हलचल मच गई। बाद में वन विभाग की टीम उन्हें कोर्ट लेकर पहुंची। देर रात तक में फिर उनको ढूंढ लिया गया और उन्होंने मीडिया से बात करते हुए बताया कि
अमित के भाई अंकित भटनागर ने प्रशासन पर सवाल खड़े किए हैं। अंकित ने एक वीडियो जारी कर कहा है कि जेल से बाहर आने के बाद वह अमित को लेने जेल गए थे लेकिन वहां उन्हें बताया गया कि पुलिस और वन विभाग के अधिकारी अमित को पहले ही अपने साथ ले गए हैं। अंकित का आरोप है कि पूरे मामले में प्रशासन का रवैया ठीक नहीं था और यह घटना किसी जबरन ले जाने जैसी लगती है। उन्होंने इसे एक तरह का अपहरण बताया था।
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गिरफ़्तारी का कारण
अमित भटनागर के वकील पवन मिश्रा का कहना है कि पन्ना टाइगर रिजर्व की टीम ने उन्हें वन्यजीव कानून के उल्लंघन के मामले में हिरासत में लिया था। टीम का आरोप था कि प्रदर्शन के दौरान अमित बिना अनुमति रिजर्व के प्रतिबंधित कोर एरिया में चले गए थे। वकील ने कोर्ट में कहा है कि एक तरफ अमित को जमानत देकर जेल से छोड़ा गया और दूसरी तरफ बाहर आते ही उन्हें फिर से अपने साथ ले जाना गलत और कानून के खिलाफ है। दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद कोर्ट ने अमित को 15 हजार रुपए के मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया।
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जेल से रिहा होने के बाद अमित भटनागर ने प्रशासन पर खुलकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई उन लोगों के खिलाफ है जो आदिवासियों के अधिकार दबाने का काम कर रहे हैं। अमित का आरोप है कि प्रशासन ने फर्जी ग्राम सभाएं करवाईं और आवाज उठाने पर उन पर झूठे मामले लगा दिए गए।
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उन्होंने यह भी कहा कि जंगलों में खुलेआम लकड़ी की तस्करी हो रही है पर जब वे इन मामलों को सामने लाने की कोशिश करते हैं तो उन्हें ही आरोपी बना दिया जाता है। अमित ने कहा कि वे आदिवासी समुदाय के हक की लड़ाई जारी रखेंगे और आने वाले समय में भ्रष्टाचार से जुड़े कई सबूत लोगों के सामने रखेंगे।
जीतु पटवारी के खिलाफ भी मामला दर्ज
अमित भटनागर के अचानक लापता होने और आदिवासियों पर कार्रवाई की खबर फैलने के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतु पटवारी पन्ना पहुंचे। रास्ते में प्रशासन ने उनके काफिले को भूसौर नाका पर रोक दिया। इसके बाद वे दूसरे रास्ते से आंदोलन स्थल तक पहुंचने की कोशिश करते नजर आए। जानकारी के मुताबिक जीतू पटवारी, यूथ कांग्रेस के उपाध्यक्ष अभिषेक परमार और कुछ समर्थक बाइक से जंगल के रास्ते ढोढन बांध इलाके तक पहुंचे जहां उन्होंने आदिवासी परिवारों से बात की।
आदिवासियों से मुलाकात के दौरान जीतू पटवारी ने सरकार और वन विभाग पर कई सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास परियोजनाओं के नाम पर आदिवासियों की जमीन और जंगल छीने जा रहे हैं जबकि विरोध करने वालों पर कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने अमित भटनागर को हिरासत में लेने को गलत बताते हुए उनकी तुरंत रिहाई की मांग की। वहीं इस पूरे घटनाक्रम के बाद पन्ना टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने जीतू पटवारी, अभिषेक परमार और अन्य लोगों के खिलाफ वन्यजीव कानून के तहत मामला दर्ज कर लिया। इसके बाद यह मामला राजनीतिक रूप से और ज्यादा गरमा गया।
क्या है इस गिरफ़्तारी और आंदोलन का पूरा इतिहास
असल में यह पूरा मामला केन-बेतवा लिंक परियोजना और उससे होने वाले विस्थापन को लेकर चल रहे विवाद से जुड़ा है। परियोजना से प्रभावित मध्य प्रदेश छतरपुर के आदिवासी और किसान लंबे समय से आरोप लगा रहे हैं कि जमीन का सर्वे और मुआवजा तय करने की प्रक्रिया साफ और निष्पक्ष नहीं है। लोगों का कहना है कि उनकी जमीन और जंगलों की सही कीमत नहीं लगाई जा रही जबकि इन्हीं संसाधनों के सहारे उनका परिवार पीढ़ियों से जीवन चला रहा है। उन्हें अभी तक कोई मुआवजा या स्थाई जगह नहीं दिया गया है।
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पन्ना गांव वालों का यह भी कहना है कि अब तक उन्हें ठीक से नहीं बताया गया कि विस्थापन के बाद उन्हें कहां बसाया जाएगा। खेती या रोजगार का क्या इंतजाम होगा और जंगल से जुड़ी उनकी जिंदगी खत्म होने के बाद आगे कैसे गुजारा होगा। आंदोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि आदिवासी समुदाय की सहमति के बिना उन्हें हटाने की कोशिश की जा रही है जो उनके अधिकारों के खिलाफ है। इसी कारण से वहां के किसान और आदिवासी पिछले दो सालों से लगातार आंदोलन में इसका विरोध करते डटे हुए हैं। उन्होंने अपने आंदोलन के दौरान खून से पत्र लिखा, चिता पर लेते, पानी के अंदर जाकर विरोध प्रदर्शन किया गया इसके साथ ही पिछले दो सालों में कई तरीक़ों से अपना विरोध जताया और आंदोलन को जारी रखा। कुछ प्रदर्शनकारी महिलाओं ने बताया कि इस आंदोलन के दौरान पुलिस द्वारा उनके साथ मारपीट की गई उनका खाना छिना गया फिर भी वे अपने छोटे मासूम बच्चों को लेकर आंदोलन में बैठे रहे।
इधर अमित भटनागर की गिरफ्तारी और लगातार हो रहे प्रदर्शन के बाद यह मुद्दा अब सिर्फ स्थानीय नहीं रहा यह आंदोलन पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है। अमित की रिहाई और प्रभावित परिवारों को सही मुआवजा देने की मांग को लेकर एसपी ऑफिस का घेराव भी किया जा चुका है। वहीं वन विभाग प्रदर्शन में शामिल अन्य लोगों की पहचान करने में लगा है जबकि आदिवासी और किसान संगठनों ने आंदोलन को और तेज करने की बात कही है।
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