खबर लहरिया Blog केन-बेतवा परियोजना के खिलाफ ‘चिता आंदोलन’ में उग्र हुए किसान, धूप में लेटकर विरोध कर रहे किसान

केन-बेतवा परियोजना के खिलाफ ‘चिता आंदोलन’ में उग्र हुए किसान, धूप में लेटकर विरोध कर रहे किसान

केन-बेतवा लिंक परियोजना और बांध के कारण जमीन जाने के विरोध में किसानों और आदिवासियों का आंदोलन अब बड़ा रूप ले चुका है जिसे उन्होंने ‘चिता आंदोलन’ नाम दिया है। दरअसल 23 मार्च 2026 से शुरू हुई पदयात्रा पन्ना से होते हुए छतरपुर के गांवों तक पहुंची।

रिपोर्ट – अलीमा, लेखन – रचना 

चिता आंदोलन’ की शुरुआत (फोटो साभार: अलीमा)

28 मार्च को प्रदर्शनकारियों ने खून से पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की। इसके बाद 5 अप्रैल को पन्ना के डायमंड चौराहे से दिल्ली तक जाने के लिए एक और यात्रा निकाली गई थी। हजारों की संख्या में आदिवासी और किसान अपनी मांगों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर आवाज उठाने जा रहे थे लेकिन रास्ते में ही प्रशासन ने उन्हें रोक दिया। प्रदर्शनकारी ग्रामीणों का आरोप है कि इस दौरान प्रदर्शनकारियों के साथ सख्ती की गई और उनका राशन-पानी तक छीन लिया गया जिससे आंदोलन और उग्र हो गया।

इस मामले से संबंधित कुछ जानकरियों का लिंक नीचे दे दिया गया है । 

केन बेतवा परियोजना: बांध और नहरों के बीच फंसे गांव, किसानों की जमीन गई मुआवजा अब भी अधूरा

इसके बाद दिल्ली नहीं जा पाने के बाद किसान सीधे पन्ना नेशनल पार्क के कोर इलाके में बने बांध स्थल पर पहुंच गए और वहीं प्रदर्शन शुरू कर दिया। जिससे परियोजना का काम भी रुक गया। हजारों की संख्या में किसान ‘चिता आंदोलन’ के तहत जमीन पर चिता बनाकर उस पर लेटकर तेज धूप में विरोध कर रहे हैं। इस दौरान कई लोगों की तबीयत भी खराब हो चुकी है लेकिन उनका कहना है कि जब तक उन्हें सही मुआवजा और बेहतर पुनर्वास नहीं मिलेगा वे पीछे नहीं हटेंगे। 

इस परियोजना की वजह से पन्ना और छतरपुर के करीब 24 गांवों के लगभग 6628 परिवार प्रभावित हो रहे हैं और करीब 9000 हेक्टेयर जमीन डूब क्षेत्र में आने वाली है जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व का हिस्सा भी शामिल है।

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लोगों से बात-चीत के दौरान – 

छतरपुर जिले के ढोढ़न गांव की रहने वाली 33 साल की कल्लू बाई आदिवासी के पास करीब 7 एकड़ रजिस्टर्ड जमीन है लेकिन उनका आरोप है कि उन्हें इसका पूरा मुआवजा नहीं मिल रहा। वे कहती हैं “जब हमारी जमीन ही चली जाएगी तो हम आखिर जाएंगे कहां?”                                       

कल्लू बाई (फोटो साभार:अलीमा)

कल्लू बाई बताती हैं कि 14 फरवरी को जब वे बिजावर तहसील जा रही थीं तो सलैया गांव के पास उन्हें रोक लिया गया। उनके साथ छोटे-छोटे बच्चे भी थे लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने लाठीचार्ज कर उन्हें वापस भेज दिया। उन्हें खाना नहीं खाने दिया और खाने में पानी डाल दिया गया। उनका कहना है कि मुआवजे के नाम पर सिर्फ करीब 5 लाख रुपये प्रति व्यक्ति दिए जा रहे हैं और महिलाओं को तो कई जगह मुआवजा भी नहीं मिल रहा। वे कहती हैं उन्हें पांच किलोमीटर तक पुलिस द्वारा दौड़ा कर पीटा गया। “इतनी कम रकम में न नई जमीन खरीदी जा सकती है और न ही घर बनाया जा सकता है।”

वे यह भी आरोप लगाती हैं कि जब भी वे अपनी मांगों को लेकर बाहर निकलते हैं प्रशासन उनकी गाड़ियों की चाबियां छीन लेता है, राशन खराब कर देता है और जबरदस्ती आगे बढ़ने पर लाठीचार्ज करता है। उनका साफ कहना है “अगर सरकार हमारी बात नहीं सुनेगी तो हम यहीं मर जाएंगे लेकिन अपनी जमीन छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे।”

वहीं सलैया गांव की रहने वाली 38 साल की गीता अहिरवार के पास करीब 11 एकड़ जमीन है लेकिन उनका कहना है कि सरकार ने जो चार गुना मुआवजा देने का वादा किया था वह अब तक पूरा नहीं हुआ। उनका आरोप है कि उन्हें पूरा मुआवजा तो दूर कई बार परिवार के बाकी सदस्यों को कोई मुआवजा ही नहीं दिया जा रहा। वे बताती हैं कि जब भी वे अपनी मांग उठाती हैं तो उन्हें दबाने के लिए बल (लाठीचार्ज) का प्रयोग किया जाता है। उनके साथ छोटे-छोटे बच्चे भी हैं जो भूखे-प्यासे बैठे हैं। गीता का कहना है “अगर हमारी मांगें पूरी नहीं हुईं तो हम इसी चिता पर लेटे-लेटे जान दे देंगे।”        

गीता अहिरवार (फोटो साभार: अलीमा)                            

वे यह भी आरोप लगाती हैं कि प्रशासन कभी मीडिया को आने से रोकता है और कभी प्रदर्शन कर रहे लोगों पर सख्ती करता है। आंदोलन स्थल पर हालात ऐसे हैं कि कई लोगों की तबीयत खराब हो चुकी है और खाने के लिए सिर्फ नमक-रोटी ही बची है।  

आंदोलन में छोटे बच्चों को लेकर बैठी महिलाएं (फोटो साभार: अलीमा)                                                      

लगातार आंदोलन से बिगड़ रही सेहत

लंबे समय से चल रहे इस आंदोलन का असर अब लोगों की सेहत पर भी दिखने लगा है। 55 साल के राजीव अहिरवार की तबीयत अचानक बिगड़ गई उनके पैरों और मुंह में छाले पड़ गए हैं। किसानों का कहना है कि वे मजबूरी में केन नदी का पानी पी रहे हैं उसी से नहा रहे हैं और खाना बना रहे हैं जिससे बीमारियां बढ़ रही हैं। उनका आरोप है कि अब तक कोई स्वास्थ्य कर्मचारी उनकी मदद के लिए नहीं पहुंचा और दवाइयां तक पहुंचने में भी बाधाएं डाली जा रही हैं।

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सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर की चेतावनी

सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने प्रशासन को लेकर कड़ी नाराज़गी जताई है। उन्होंने मांग की है कि कलेक्टर के साथ आमने-सामने प्रेस वार्ता कर सच्चाई सबके सामने लाई जाए। उनका कहना है कि अगर प्रशासन यह साबित कर दे कि ग्राम सभा और परियोजना से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया का 10% भी सही तरीके से पालन हुआ है तो वे आंदोलन खत्म करने के लिए तैयार हैं।

भटनागर ने आरोप लगाया कि कई जगह फर्जी ग्राम सभाएं कराई गईं और लोगों को सही जानकारी नहीं दी गई। साथ ही उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों को दिल्ली जाने से रोकना और शांतिपूर्ण आंदोलन पर धारा 163 लगाना आदिवासी समुदाय में भारी गुस्से की वजह बन रहा है। अमित भटनागर सामाजिक कार्यकर्ता हैं वे खेडुत मज़दूर चेतना संगठन में काम करते हैं। वे नर्मदा बचाओ आंदोलन में भी शामिल रहे। वर्तमान में केन बेतवा परियोजना के आंदोलन में लीडरशिप करते नज़र आते हैं। इसी आंदोलन के तहत पुलिस द्वारा उन्हें कुछ दिनों के लिए हिरासत में भी ले ज़ाया गया था।                                       

अमित भटनागर (फोटो साभार: अलीमा)

प्रशासन की सफाई और उठते सवाल

इस विषय पर छतरपुर कलेक्टर पार्थ जायसवाल से बात की गई उनका कहना है कि जिन किसानों को अब तक मुआवजा नहीं मिला है उनके लिए अलग टीम बनाई जाएगी और जल्द ही उन्हें उनका हक दिलाया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि पन्ना प्रशासन के साथ लगातार बातचीत चल रही है और सभी प्रभावित परिवारों को मुआवजा देने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी लेकिन दूसरी तरफ किसानों का आरोप है कि प्रशासन ने धारा 163 लगाकर उन्हें चारों ओर से घेर रखा है और यहां तक कि उनके खाने-पीने की व्यवस्था भी प्रभावित की जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब प्रशासन मुआवजा देने की बात कर रहा है तो आखिर किसान इतनी भीषण गर्मी में चिता पर बैठकर विरोध करने को क्यों मजबूर हैं?

छतरपुर कलेक्टर पार्थ जायसवाल (फोटो साभार: अलीमा)                               

आगे की चेतावनी

अभी हालत बेहद खराब हो चुके हैं। आंदोलन में बैठे लोगों के पास खाने-पीने की ठीक से व्यवस्था नहीं है। जो थोड़ा बहुत आटा है उसी से वे नमक के साथ रोटी खाकर गुजारा कर रहे हैं। इसके बावजूद ‘चिता आंदोलन’ लगातार जारी है और लोग उसी पर डटे हुए हैं।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो वे यहां से हटने वाले नहीं हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि इस बार फैसला “हां या ना” में चाहिए। उनका कहना है कि अगर उनकी बात नहीं मानी गई तो वे यहीं अपनी जान देने तक को तैयार हैं। उन्होंने प्रशासन के सामने “करो या मरो” जैसी सख्त चेतावनी भी रखी है।

 

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