खबर लहरिया Blog Ground Report: सदर चुनाव छतरपुर, जिस चुनाव में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं

Ground Report: सदर चुनाव छतरपुर, जिस चुनाव में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं

मध्य प्रदेश के छतरपुर में मुस्लिम समाज के सदर चुनाव को लेकर लैंगिक समानता और महिलाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों पर एक बार फिर से बहस तेज हो गई है। 4 अगस्त 2026 को होने वाले मुस्लिम सदर चुनाव से पहले समुदाय की कई महिलाओं ने चुनाव का बहिष्कार करने का ऐलान किया है।

रिपोर्ट – अलीमा, लेखन – रचना 

फोटो साभार: अलीमा

मुस्लिम महिलाओं का कहना है कि उन्हें मतदान का अधिकार नहीं दिया गया है। इसे लेकर उन्होंने सोशल मीडिया पर एक बेबाक पोस्ट साझा करते हुए चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

फोटो साभार: अलीमा

महिलाओं को क्यों नहीं दिया जा रहा है वोट डालने का अधिकार

छतरपुर की निजामी कॉलोनी निवासी 36 वर्षीय अफसर जहां का कहना है कि चुनाव कोई भी हो, मतदान करना सभी का संवैधानिक अधिकार है और इस्लाम में भी महिलाओं को अपने सदर का चुनाव करने का पूरा अधिकार दिया गया है। पिछले दो कार्यकालों में महिलाएं लगातार मतदान करती रही हैं। हर बार यह कहा जाता था कि महिलाएं वोट नहीं डालेंगी।

उनका आरोप है कि इस बार चुनावी प्रक्रिया बेहद जल्दबाज़ी में पूरी की गई है। एक दिन मस्जिद में चुनाव की घोषणा की गई, अगले दिन कमेटी की बैठक हुई, तीसरे दिन नामांकन पत्र भरे गए और चौथे दिन मतदान की तारीख़ तय कर दी गई। उन्होंने बताया कि 31 जुलाई को नामांकन हुआ, 1 अगस्त को नामांकन पत्र भरे गए, 2 अगस्त को नाम वापस लेने की प्रक्रिया हुई, 3 अगस्त को प्रचार किया गया और 4 अगस्त को मतदान रखा गया।

फोटो साभार: अलीमा

अफसर जहां ने सवाल उठाया कि आखिर इतनी जल्दबाज़ी में चुनाव कराने की क्या वजह थी? सबसे गंभीर बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में महिलाओं को मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया गया। अफसर जहां को इस फैसले की जानकारी तब मिली जब उम्मीदवारों के समर्थक प्रचार के लिए उनके घर पहुंचे और बताया कि इस बार महिलाएं वोट नहीं डालेंगी। इसके बाद उन्होंने अन्य महिलाओं के साथ मिलकर चुनाव के बहिष्कार का ऐलान किया। उनका कहना था कि जो व्यक्ति महिलाओं के अधिकार और सम्मान का आदर नहीं करता उसे समाज का सदर नहीं बनाया जाना चाहिए।

खबर लहरिया की स्टिंगर अमरीन खान

खबर लहरिया की स्टिंगर अमरीन खान का कहना है कि वह 4 अगस्त 2026 को होने वाले मुस्लिम सदर चुनाव का खुलकर बहिष्कार करती हैं क्योंकि इस चुनाव में महिलाओं को मतदान के अधिकार से वंचित किया गया है। उनका सवाल है कि क्या समाज केवल पुरुषों से चलता है जो महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं दिया जा रहा है? उनके मुताबिक 21वीं सदी में भी महिलाओं को अपने बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। पितृसत्तात्मक सोच लंबे समय से समाज का हिस्सा रही है लेकिन आज भी उसी सोच का प्रभाव इस चुनाव में साफ दिखाई दे रहा है।

अमरीन खान का यह भी कहना है कि चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी महिलाओं के अधिकारों और लड़कियों की सुरक्षा की बात तो करते हैं लेकिन जब महिलाओं को मतदान का अधिकार ही नहीं दिया जा रहा तो ऐसे में उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ने के दावे कैसे सही माने जा सकते हैं। अमरीन खान कहती हैं कि यदि उन्हें मतदान करने का अधिकार नहीं दिया जाता तो एक महिला होने के नाते वह इस चुनाव में चुने गए किसी भी व्यक्ति को अपना सदर नहीं मानेंगी चाहे वह कोई भी हो।

सोशल मीडिया पर पोस्ट डालकर किया चुनाव का बहिष्कार

खबर लहरिया की पत्रकार अलीमा तरन्नुम ने भी इस चुनाव का बहिष्कार किया। उनका कहना है कि जिस चुनाव में समाज की आधी आबादी,यानी महिलाओं,को मतदान के बुनियादी अधिकार से ही वंचित कर दिया जाए उसे किसी भी सूरत में निष्पक्ष या पूरे समाज का चुनाव नहीं कहा जा सकता। इस मुद्दे पर उन्होंने सोशल मीडिया पर भी एक पोस्ट साझा कर अपना विरोध दर्ज कराया है।

फोटो साभार: अलीमा फेसबुक अकाउंट

अलीमा ने अपनी पोस्ट में लिखा कि “मैं कल यानी 4 अगस्त को होने वाले मुस्लिम सदर के चुनाव का खुलकर बहिष्कार करती हूँ। क्यों की इसमें महिलाओं को वोट के अधिकार से वंचित किया गया है जिस चुनाव में महिलाओं को वोट देने का अधिकार ही नहीं दिया जाता उस चुनाव को निष्पक्ष कैसे कहा जा सकता है अगर कोई सच में समाज का नेतृत्व करना चाहता है तो उसे सबसे पहले महिलाओं के अधिकार की बात करनी चाहिए। जो लोग चुपचाप यह मान लेते हैं कि महिलाएँ वोट न डालें वे पूरे समाज का प्रतिनिधित्व कैसे करेंगे? क्या हमारी कौम सिर्फ़ पुरुषों की है? क्या महिलाओं का इस समाज में कोई योगदान नहीं है जब महिलाएँ समाज के हर काम में बराबरी से साथ हैं, तो चुनाव में उन्हें पीछे क्यों रखा जा रहा है? महिलाओं को वोट देने से रोकना उनके अधिकार का सम्मान नहीं, बल्कि उनके साथ भेदभाव है। जब तक महिलाओं को पुरुषों के बराबर वोट देने का अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक ऐसा चुनाव पूरे समाज का चुनाव नहीं माना जा सकता।क्यों की वोट किसी भी कॉम का होहमारा वोट, हमारा अधिकार है।”

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या यह कौम सिर्फ पुरुषों की है? अलीमा का कहना है कि जब महिलाएं समाज की हर जिम्मेदारी में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं तो चुनाव के समय उन्हें मतदान के अधिकार से क्यों वंचित किया जा रहा है। आगे उनका कहना था कि वोट किसी भी समाज में नागरिक का अधिकार होता है और महिलाओं का यह अधिकार छीना नहीं जा सकता। जब तक महिलाओं को पुरुषों के बराबर मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा तब तक इस चुनाव को पूरे समाज का चुनाव नहीं माना जा सकता।

महिलाओं के अधिकारों का हनन

छतरपुर के वार्ड नंबर 22 की निवासी 30 वर्षीय जुबेर खान का इस विषय पर कहना है कि समाज में महिलाओं की हिस्सेदारी पुरुषों के बराबर है इसलिए उन्हें भी हर चुनावी प्रक्रिया में समान अधिकार मिलना चाहिए। वहीं जुबेर खान का मानना है कि महिलाओं को मतदान से बाहर रखने का फैसला समाज की पिछड़ी सोच को दर्शाता है। 21वीं सदी में भी इस तरह की मानसिकता का बने रहना चिंताजनक है। वह इस फैसले का विरोध करते हुए कहती हैं कि महिलाओं को हर अधिकार मिलना चाहिए चाहे चुनाव किसी भी समाज या कौम का क्यों न हो।

 

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