छत्तीसगढ़ के पेंड्रा जिले के मरवाही वनमंडल के पिपरिया गांव से लगे जंगल में ग्रामीणों को एक मादा भालू का शव मिला। ग्रामीणों ने इसकी सूचना तुरंत वन विभाग को दी जिसके बाद विभाग की टीम मौके पर पहुंची और जांच शुरू की।क्षेत्र में पड़ रही भीषण गर्मी और लगातार चल रही तेज लू के कारण भालू की मौत हुई है।
इस साल की रिकॉर्ड तोड़ ने लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी मुश्किल बना दी है। लगातार बढ़ते तापमान और लू ने जनजीवन के साथ-साथ लोगों के सेहत पर भी असर डाला है। कहीं पानी की क़िल्लत कहीं बिजली की समस्या। बढ़ते तापमान का असर केवल इंसानो तक सीमित नहीं रह गया है अब इस तपती गर्मी का असर जंगलो में रहने वाले वन्यजीव भी इसके चपेट में आ रहे हैं।
छत्तीसगढ़ के पेंड्रा जिले के मरवाही वनमंडल के पिपरिया गांव से लगे जंगल में ग्रामीणों को एक मादा भालू का शव मिला। ग्रामीणों ने इसकी सूचना तुरंत वन विभाग को दी जिसके बाद विभाग की टीम मौके पर पहुंची और जांच शुरू की। जांच में पता चला कि मृत मादा भालू की ऊम्र पांच साल थी। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार क्षेत्र में पड़ रही भीषण गर्मी और लगातार चल रही तेज लू के कारण भालू की मौत हुई है। मरवाही वनमंडलाधिकारी ग्रीष्मी चांद ने भी पुष्टि की है कि शुरुआती जांच में हीट स्ट्रोक को मौत का कारण माना गया है। आवश्यक जांच प्रक्रिया के बाद अधिकारियों की मौजूदगी में भालू का अंतिम संस्कार किया गया।
500 से अधिक चमगादड़ों की मौत
वहीं इंडिया टुडे के खबर अनुसार छत्तीसगढ़ में बढ़े हुए तापमान के कारण कई जिलों में 500 से अधिक चमगादड़ों के साथ-साथ अन्य वन्यजीवों की भी मौत हो गई है। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में ग्रामीणों ने तीन से चार दिनों में बड़ी संख्या में चमगादडों को नीचे गिरते हुए देखा है। कुछ ही दिन पहले, कोरबा जिले में इसी तरह की परिस्थितियों में लगभग 200 चमगादड़ मृत पाए गए थे।
चमगादड़ दिन भर पेड़ों में उल्टा लटके होते हैं अपने शरीर का तापमान नियंत्रित करने के लिए पूरी तरह से छाया और ठंडी हवा पर निर्भर रहते हैं। अभी ऐसा नहीं हो पा रहा है क्योंकि छत्तीसगढ़ में गर्मी का तेज तापमान और धूप छाया हुआ है तो चमगादड़ कुछ घंटो में ही जानलेवा गर्मी के शिकार हो जाते हैं। वन अधिकारियों का मानना है कि भीषण गर्मी और गर्म, शुष्क हवाओं के लंबे समय तक संपर्क में रहने से गंभीर निर्जलीकरण हुआ, जिसके कारण सामूहिक मौतें हुईं।
इसी के साथ छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ जिले के दल्लीखोली-लछना वन क्षेत्र में मोर और ताड़ सिवेट सहित 15 से अधिक जंगली पक्षी और जानवर मृत पाए गए, जिनके शव उन वन क्षेत्रों में पाए गए जो अभी भी भीषण मौसम से जूझ रहे हैं। ये मौतें नौतपा के दौरान हुईं हैं। छत्तीसगढ़ में इस वर्ष यह बात दुखद रूप से सच साबित हुई है।वन अधिकारियों का कहना है कि वे स्थिति पर नजर रख रहे हैं और प्रभावित क्षेत्रों में हुए नुकसान का आकलन कर रहे हैं।
लगातार हो रही जंगलों की कटाई और बढ़ते पर्यावरणीय बदलावों का असर अब वन्यजीवों के व्यवहार में भी साफ दिखाई देने लगा है। जंगलों का दायरा लगातार सिमट रहा है जिससे जानवरों को पहले जैसे न तो घनी छाया मिल पा रही है और न ही पर्याप्त पानी की स्त्रोत। ऐसे में भीषण गर्मी और लू से बचना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है। जंगलों के कम होने के कारण कई वन्यजीव सुरक्षित ठिकाने और भोजन की तलाश में एक इलाके से दूसरे इलाके की ओर भटकने की मजबूर हैं। इसका असर वन्य जीवों के साथ-साथ आसपास के गांवों में रहने वाले पर भी पड़ रहा है।
दैनिक भास्कर में छपी खबर के अनुसार मरवाही वनमंडल के सिवनी वृत्त में मध्य प्रदेश की सीमा से चार हाथियों का एक दल देखा गया है। ये हाथी वर्तमान में घुसरिया बीट के कक्ष क्रमांक 2051 में विचरण कर रहे हैं। हाथियों के इस दल ने अब तक किसी प्रकार की जनहानि या मकानों को नुकसान नहीं पहुंचाया है। लेकिन कुम्हारी, चिचगोहना, घुसरिया और मजीतटोला के करीब 12 किसानों की फसलों को हाथियों ने काफी तहस-नहस कर दिया है। वन अधिकारियों के अनुसार ग्रामीणों को जंगल की तरफ न जाने की सख्त हिदायत दी जा रही है।
छत्तीसगढ़ में मादा भालू, चमगादड़ों और अन्य वन्यजीवों की मौतें केवल एक स्थानीय घटना नहीं हैं यह जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय असंतुलन की गंभीर चेतावनी हैं। यदि समय रहते वन संरक्षण, जल प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन के उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में वन्यजीवों के साथ-साथ मानव जीवन पर भी इसके और गंभीर प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।
भीषण गर्मी और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए कई ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
जंगलों में कृत्रिम जल स्रोतों की व्यवस्था: गर्मियों के दौरान वन क्षेत्रों में पानी के कुंड, टंकियां और सोलर पंप आधारित जल स्रोत विकसित किए जाएं ताकि जानवरों को पानी की तलाश में भटकना न पड़े।
वृक्षारोपण और वन संरक्षण: जंगलों की कटाई पर सख्ती से रोक लगाई जाए और बड़े पैमाने पर स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाए जाएं, जिससे वन्यजीवों को छाया और सुरक्षित आवास मिल सके।
हीट वेव मॉनिटरिंग सिस्टम: वन विभाग को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए जहां गर्मी का प्रभाव अधिक है और वहां नियमित निगरानी की व्यवस्था करनी चाहिए।
वन्यजीव राहत अभियान: अत्यधिक गर्मी के दौरान वन्यजीवों के लिए आपातकालीन राहत दल सक्रिय किए जाएं
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